समझौता एक्सप्रेस कांड में सभी रिहा : न्याय की विंडबना

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स्वामी असीमानंद और तीन अन्य लोगों की रिहाई को न्याय की विडंबना ही कहा जाना चाहिए। यह कांड फरवरी 2007 का है। दिल्ली-लाहौर जा रही समझौता एक्सप्रेस विस्फोट में कुल 68 लोग पानीपत मेें मारे गए थे। मरने वालों में हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही देशों के लोग थे। हालांकि मरने वालों में पाकिस्तान के लोगों की तादाद कहीं ज्य़ादा थी। अब नेशनल इन्विेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) की साख पर प्रश्नचिहन लग गए हैं।

स्पेशल कोर्ट ने इस अप्रिय हादसे पर व्यथित होकर कहा कि ‘भरोसे लायक और स्वीकार करने लायक साक्ष्यों के अभाव में किसी को भी सजा नहीं दी जा सकती। रोचक बात तो यह है कि बारह साल तक इस मामले की सुनवाई होती रही लेकिन न्याय नहीं हुआ। स्पेशल जज ने एनआईए को लापरवाही से जांच करने पर खासा लताड़ा। इस जांच-पड़ताल की अब कोई साख भी नहीं।

अदालत के फैसले से समझौता एक्सप्रेस विस्फोट में मारे गए लोगों के परिवारों की उम्मीदें अब धराशायी हो गई हैं। इस मामले में आए नतीजे से वह पुराना मुहावरा ज्य़ादा सही जान पड़ता है कि ‘न्याय में अगर देर हुई तो वह फिर न्याय नहीं रहता।’

एनआईए के वरिष्ठ अधिकारियों को सजा देने की बजाए फैसले का अब राजनीतिकरण किया जा रहा है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और किसी भी आतंकवादी को सिर्फ इस आधार पर रिहा नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी खास जाति विशेष का है। यह विस्फोट कांड इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया था क्योंकि इसके पीछे मकसद था, भारत-पाक संबंधों के सुधरने के प्रयासों को कामयाब न होने देना। एनआईए ने फरवरी 2014 में अपनी ओर से इस मामले पर साल भर चली सुनवाई के दौरान यह भी कोशिश नहीं की कि कोई गवाह अपने बयान से न पलटे।

साफ कहें तो सरकार को फिर से इस मामले की सुनवाई शुरू करनी चाहिए जिससे इससे बच निकलने की तमाम राहों पर बाड़ लगाई जा सके। ऐसे महत्वपूर्ण मामले की छानबीन ठीक से होनी चाहिए जिसे हरियाणा पुलिस ने जुलाई 2010 में एनआईए के सुपुर्द किया था।

सुनवाई का काम इसलिए दुबारा होना चाहिए जिससे देश की जनता का भरोसा फौजदारी न्यायप्रणाली और राष्ट्रीय जांच एजंसियों में बढ़े। अभी हाल देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई एक झमेले में आ गई थी जिस पर एपेक्स कोर्ट को दखल देना पड़ा।

समझौता एक्सप्रेस विस्फोट कांड के मामले में आए फैसले से भारत के उस संकल्प पर आंच आती है जिसमें भारत ने यह निश्चय किया था कि भारत जांच कराएगा और आतंकवाद की बड़ी घटनाओं पर सजा भी दिलवाएगा।

फिर, असीमानंद का यह तीसरा मामला है। जिसमें वह अपराधी साबित नहीं हुआ और रिहा हो गया। इसके पहले अक्तूबर 2007 में अजमेर शरीफ में हुए धमाके में तीन लोग मारे गए। इसके बाद हैदराबाद में मक्का मस्जिद में मई 2007 में विस्फोट हुआ। इसमें नौ लोग मारे गए।

सरकारी वकील के अनुसार इस सभी मामलों में असीमानंद ऊर्फ नब कुमार सरकार का एक मुख्य अभियुक्त रहा है। वह 2002 में अक्षरधाम मंदिर में हुए गोली कांड का बदला लेने का इच्छुक खुद को बताता रहा है। लेकिन जांच एजेंसियों ने सारा मामला ही गड्ड-मड्ड कर दिया। इससे इस एजेंसी के नाम को धब्बा लगा और भारत सरकार का वह संकल्प भी पीछे छूट गया। जिसमें भारत सरकार ने देश के आतंकवादियों को सजा दिलाने को कहा था।