सनेह को मारग

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हिंदी के दृश्य-पटल पर एक दौर वह भी था जब घरेलू पाठक लाइब्रेरी योजना के तहत महिला कथाकारों की ढेरों कहानियां, उपन्यसिकाएं एवं उपन्यास घर-घर महिलाओं के भीतर प्रचलित हो गए थे. यह साठ से अस्सी के बीच बीस वर्षों का वह समय था जब शिवानी जैसी कथाकार घर-घर आदर के साथ पढ़ी जाती थीं. उनके उपन्यासों का कथानक अक्सर प्रेम में चोट खाई हुई नायिका के साथ उसके प्रेमी या पति को लेकर संबंधों के इर्द-गिर्द बुना जाता था, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण विषय प्रेम ही होता था. इस प्रेम की अभिव्यक्ति में विरह और उसके संत्रास से उपजी हुई नायिका की संघर्ष भरी जिंदगी ही खूब चाव से पढ़ी जाती थी. एक पूरी लंबी फेहरिस्त है शिवानी के उपन्यासों की, जिसमें प्रेम अपने मोहक, उदात्त, रचनात्मक और यातना भरे सभी तरह के रूपों में प्रकट हुआ है. ‘अतिथि’, ‘चौदह फेरे’, ‘कृष्णवेणी’, ‘करिए छिमा’, ‘चिर स्वयंवरा’, ‘जालक’ जैसी पुस्तकें आज भी लोकप्रिय हैं और आसानी से किसी भी पुस्तक मेले में खरीददारों को आकर्षित करती रहती हैं.

हाल के वर्षों में प्रेम का स्वरूप बदला है. प्रेम भी कई बार अपने चेहरे बदलकर कविता, कहानी, उपन्यास आदि में व्यक्त होता रहा है. प्रेम कविताओं को व्यापक स्तर पर विमर्श और कविता के परिसर का जरूरी प्रत्यय बनाने वाले कवियों में अशोक वाजपेयी का नाम पूरे आदर के साथ लिया जा सकता है. उनके अब तक प्रकाशित चौदह कविता-संग्रहों में पहले संग्रह ‘शहर अब भी संभावना है’ से लेकर बिल्कुल नव्यतम संग्रह ‘दुःख चिट्ठीरसा है’ में प्रेम की दुनिया आकाश तक फैली हुई नजर आती है. इसी तरह उन्हीं के समकालीन कवि-कथाकार विनाेद कुमार शुक्ल ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास में निम्न मध्यमवर्गीय परिवेश में स्त्री-पुरुष के दांपत्य प्रेम का सर्वथा मनोहारी अंकन करते हैं. पवन करण जैसे युवा कवि का अत्यंत संवेदनशील कविता-संग्रह ‘स्त्री मेरे भीतर’ में स्त्री के कई आयाम बिल्कुल नये संदर्भों में व्यक्त हुए हैं, जहां प्रेम की परिभाषा भी बिल्कुल बेबाकी व साहस के साथ अभिव्यक्ति पा सकी है.

कहने का आशय यह है कि रीतिकाल से शुरू होने वाली प्रेम की अजस्र धारा इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक बारह वर्षों तक आकर बारहों तरीके से अपनी अभिव्यक्ति की राह तलाशती नजर आती है. इसमें कहीं कथ्य का बांकपन है, तो कहीं चित्रण की सलोनी आभा. कहीं प्रेम का उदात्त रूप मौजूद है, तो कहीं उसका अत्यंत दैहिक पक्ष भी उसे कई कोणों से घेरे रहता है. फिर भी घनानंद के शब्दों में यदि कहें तो, साहित्य में प्रेम ‘अति सूधो सनेह को मारग’, जैसा स्नेहिल प्रेम भी है और कामुकता के आवरण में लिपटा हुआ अत्यंत झीने किस्म का प्रणय भी.

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