संवैधानिक अधिकारों एवं कर्तव्यों के असन्तुलन से उपजा संघर्ष

Thane: Women from the Muslim community shout slogans during their protest against BJP spokesperson Nupur Sharma over her alleged remarks on Prophet Mohammad, in Thane, Tuesday, May 31, 2022. (PTI Photo)(PTI05_31_2022_000211B) *** Local Caption ***

देश संकट में है। यह संकट धार्मिक टकराव का है, जो तत्क्षण पैदा नहीं हुआ, बल्कि एक लम्बी विवादास्पद ऐतिहासिकता की उपज है। विवादित बयान, उकसाऊ जुमले, उन्मादी जुलूस, क्रूर हत्याएँ, राजनीतिक हस्तक्षेप आदि इस इस संघर्ष प्रक्रिया के अंग बन चुके हैं। नूपुर शर्मा के बयान से उपजा विवाद अभी तक देश के जनजीवन को दिक़्क़त में डाले हुए है। इससे भड़काऊ बयानबाज़ी का दौर प्रारम्भ हो गया है।

अजमेर दरगाह के ख़ादिम सलमान चिश्ती ने नूपुर शर्मा को गोली मारने की धमकी देते हुए ऐसा करने वाले को इनाम और मकान देने की घोषणा की है। राजस्थान के एक मौलाना मुफ़्ती नदीम अ$ख्तर ने एक जुलुस में सार्वजनिक रूप से नूपुर शर्मा मामले में क़ानून के ख़िलाफ़ भी जाने की धमकी दी। वहीं अजमेर के चिश्ती सरवर ने 800 साल की इस्लामिक हुकूमत की याद दिलाते हुए फिर से हुकूमत क़ायम करने के लिए धमकाया। दूसरी ओर उदयपुर और अमरावती की निर्मम हत्याओं के विरोध में हिन्दू संगठनों ने 9 जुलाई को दिल्ली में ‘हिन्दू संकल्प मार्च’ नामक विशाल रैली निकाली। ऐसी रैलियों का आयोजन जयपुर एवं अजमेर में भी किया गया।

अभी बदज़ुबानी से उत्पन्न विवाद थमे नहीं थे कि इसी बीच लीना मणिमेकलई नामक एक अनाम निर्देशक ने अपनी फ़िल्म ‘काली’ का विवादित पोस्टर जारी कर दिया। पोस्टर में माँ काली की भेषभूषा धारण किये एक महिला को धूम्रपान करते हुए प्रदर्शित किया गया है। पाश्र्व में एलजीबीटीक्यू समुदाय का झण्डा दिखाया गया है। हिन्दू संगठनों इसका विरोध करते हुए उक्त महिला के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की, तो इस विवाद में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा भी कूद पड़ी और देवी काली पर अभद्र टिप्पणी करने लगी। इस विवाद को और आगे बढ़ाते हुए उस महिला ने शिव-पार्वती का सिगरेट पीते हुए एक दूसरा पोस्टर ट्वीट किया। उसका मानना है कि वह अपनी आवाज़ उठा रही है। संविधान अपनी बात कहने का अधिकार देता है; लेकिन किसी पर कींचड़ उछालने की अनुमति नहीं? वर्तमान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं समीक्षा के अधिकार का प्रयोग सामाजिक-सांस्कृतिक उन्नति के बजाय विवाद पैदा करने में अधिक किया जाने लगा है। जहाँ एक तरफ़ धार्मिक टकराव से पहले ही जनतंत्र त्रस्त है, वहीं नूपुर विवाद के बीच ये विवादास्पद और भद्दे पोस्टर जारी करने का कोई औचित्य नहीं था कि भाजपा नेता अरुण यादव को पैग में पैगम्बर नज़र आ रहे हैं।

ऐसा लगता है कि इस देश को धार्मिक हिंसा की आग में झोंक देने की होड़-सी लग गयी है। चंद लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं स्वधर्म पालन के संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का प्रयोग देश को धार्मिक उन्माद और धार्मिक संघर्षों की ओर धकेलने में कर रहे हैं; और आश्चर्यजनक रूप से उन अधिकारों का हवाला भी दे रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हम मध्ययुग में लौट गये हैं, जहाँ धर्म राष्ट्र के जीवन में एक अंग होने के बजाय धर्म ही राष्ट्र का पर्याय हो गया है।

विचारणीय मसला यह है कि आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा यह राष्ट्र मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों को किस दृष्टि से देखता है? देश का संविधान कुछ बुनियादी मूल्यों की नींव पर प्रतिष्ठित है। संविधान में शामिल मूल अधिकार (भाग-3 में अनुच्छेद-12 से 35 तक) इस अवधारणा पर आधारित हैं कि किसी भी राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति में नागरिकों के कुछ अनिवार्य अधिकार अनुल्लंघनीय बने रहें। संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों में समता का अधिकार (अनुच्छेद-14 से 18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-19 से 22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद-22 से 24), धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-29 से 30), संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद-32) आदि हैं। इन मूल अधिकारों का रक्षक भारत का सर्वोच्च न्यायालय है। हालाँकि मूल अधिकारों के बहुत-से पहलू हैं, जिनकी संविधान में व्याख्या नहीं की गयी है। लेकिन वे मानवीय गरिमा के लिए अनिवार्य हैं; जैसे- पुलिस कार्रवाई करने में विफलता, ग़ैर-क़ानूनी तौर पर हिरासत में रखना, झूठे मामलों में फँसाना, मुक़दमे की त्वरित सुनवाई का अधिकार, हिरासत में हिंसा के विरुद्ध अधिकार, निजता का अधिकार आदि। समय-समय पर उच्चतम एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अपने निर्णयों में मौलिक एवं मानवाधिकारों की व्याख्या की है और उसके फ़लक को विस्तृत किया है। उदाहरणस्वरूप रणजीत सिंह ब्रह्मजीत सिंह शर्मा बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि महिलाओं के साथ अन्याय, प्रदूषण, दलितों का सामाजिक बहिष्कार मानव अधिकार के उल्लंघन के विविध स्वरूप हैं।