श्वेत क्रान्ति का स्याह पक्ष!

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इस बार तहलका की आवरण कथा मिलावटी दूध पर है। इसमें हम खुलासा कर रहे हैं कि जो दूध हम पी रहे हैं, वह कैसे हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक है। कुछ समय पहले, जब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भारत को एक सलाह जारी की कि अगर दूध में मिलावट पर रोक नहीं लगायी गयी, तो 2025 के अंत तक भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कैंसर जैसी गम्भीर और घातक बीमारियों की चपेट में होगा। उस समय यह उम्मीद की गयी थी कि देश में व्यापक पैमाने पर मिलावटी दूध की जाँच करके मिलावट रोकने हेतु कड़े कदम उठाये जाएँगे। लेकिन नतीजा- कुछ भी नहीं बदला, सब कुछ वैसे ही चल रहा है। आप चौंक जाएँगे कि जो दूध हम लोग पीते हैं, उसमें डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, हाइड्रो पेरॉक्साइड जैसे खतरनाक पदार्थ मिले होते हैं, जो ब्लीचिंग के अलावा यूरिया आदि में इस्तेमाल होते हैं। बताना चाहेंगे कि यह पदार्थ आमतौर पर उर्वरक, एलाटॉक्सिन और पेंट में उपयोग किये जाते हैं।

भारत के खाद्य नियामक, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने हाल में अभी भारतीय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कवर करते हुए एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया है। यह सर्वेक्षण बताता है कि लगभग 41 फीसदी नमूने, एक या ज्यादा गुणवत्ता पैमाने पर विफल रहे हैं। फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गेनाइजेशन (एफआईएपीओ) की तरफ से जारी किया गया डाटा बहुत चिन्ताजनक है। जाँच रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत भर में डेयरियों में पायी जाने वाली गाय-भैंसों को दुग्ध उत्पादन करने के लिए एंटीबायोटिक्स और हार्मोन के टीके लगाये जाते हैं। नतीजतन लोग जो दूध पीते हैं, उनमें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और कई अन्य बीमारियों के होने की सम्भावना अधिक हो जाती है। सन् 1975 में शुरू की गयी श्वेत क्रान्ति ने भारत में श्वेत क्रान्ति की शुरुआत की। इसने भारत को दूध का सबसे बड़ा उत्पादक बना दिया और इससे भारत का दूध उत्पादन 22 मिलियन टन से बढ़ाकर वर्तमान में 176.3 मिलियन टन हो गया। यह अच्छा लगता है कि भारत में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 300 ग्राम है, जो विश्व औसत के मुकाबले 294 ग्राम दैनिक से अधिक है। हालाँकि, दुर्भाग्य से लालच के चलते कुछ दुग्ध व्यापारी मिलावट का खेल करके जनता के स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं। वैसे अच्छी खबर यह है कि लम्बे समय बाद एफएसएसएआई ने खतरे को समझते हुए खाद्य मिलावट पर अंकुश लगाने के लिए मिलावटखोरों के िखलाफ कड़े दंड की सिफारिश की है। इसमें आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये तक का ज़ुर्माना शामिल है। खाद्य नियामक ने खाद्य सुरक्षा और मानक (एफएसएस) अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव भी किया है।

एफएसएसएआई ने प्रस्ताव किया है कि कोई भी व्यक्ति, जो खाद्य पदार्थों में मिलावट का दोषी पाया जाता है और उसके कारण पदार्थ मानव उपभोग के लिए हानिकारक बन गया है, तो उसे ऐसा दंड दिया जाए, जो 7 साल से कम नहीं हो या आजीवन कारावास तक हो;  साथ ही उस पर ज़ुर्माना भी किया जाए, जो 10 लाख रुपये से कम नहीं हो। वर्तमान में इस ज़ुर्म के लिए कारावास सिर्फ तीन महीने का है और ज़ुर्माना भी एक लाख रुपये तक है। हालाँकि, इस मामले में आम नागरिकों को भी जागरूक होना होगा और दूध और खाद्य तेलों के लिए तुरन्त नतीजे वाले, लेकिन सस्ते स्वदेशी निर्मित खाद्य परीक्षण उपकरणों से मिलावट को जाँचने की कला सीखनी होगी। इस तरह के उपकरणों को हाल में एफएसएसएआई ने पेश किया है। निश्चित ही अब स्वास्थ्य के बारे में हमें अपनी सोच बदलने का समय आ गया है।