श्रीलंका में आतंक की दोबारा दस्तक

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दक्षिण एशिया का एक छोटा और प्यारा द्वीप श्रीलंका एक नए आतंकवाद का सामना कर रहा है। अपनी प्रासंगिकता स्थापित करने के उद्देश्य से इस्लामवादियों ने उस देश को चुना है जिसने दशकों पहले जातीय आतंकवाद को देखा और भुगता है। कोलंबो सरकार ने आतंकी तत्वों का मुकाबला करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं, और इसमें कुछ हद तक सरकार सफल भी हुई है। लेकिन श्रीलंका के लोगों के डर को जड़ से खत्म करने में सालों लग सकते हैं।

आतंकवाद एक नए रूप में श्रीलंका में लौट आया है और लगातार हुए आतंकी हमलों में 250 से अधिक लोग मारे गए और सैकड़ों गंभीर रूप से घायल हो गए। वास्तव में यह जातीय विद्रोह से धार्मिक आतंकवाद में बदल कर भारतीय उप महाद्वीप के दक्षिण में समुद्र पर तैरता हुआ यह इस देश मेें आया है।

ईस्टर के दिन (21 अपै्रल 2019) को कोलंबो में और उसके आसपास गिरजाघरों, होटलों और अन्य इलाकों में हुए हिंसक हमले नौ आत्मघाती हमलावरों से कम नहीं थे। यह हमले श्रीलंका सरकार की पूरी विफलता थी जबकि इन आतंकी वारदातों की जानकारी विदेशी खुफिया एजेंसियों से भी सरकार को पहले मिल चुकी थी। लेकिन ड्रेमोक्रेटिक सोशलिस्ट गणराज्य श्रीलंका के शासन ने इसे अनदेखा कर दिया।

श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के बीच की लड़ाई और आपसी समझ की कमी ने स्थिति को अधिक खराब किया जिससे वे इस आपदा को रोकने में विफल रहे और इसमें शंगरी-ला, किग्ंसबरी होटलों में रुके 40 से अधिक पर्यटकों को अपना जीवन गंवाना पड़ा।

आतंकी हमले के लिए पूरी तैयारी न होने के कारण इस देश की छवि धूमिल हुई है। जिसमें तीन कैथोलिक गिरजाघरों ने त्रासदी का सामना किया जब हजारों लोग रविवार की प्रार्थना सभा में भाग ले रहे थे। आमतौर पर देश में मस्जिदों और मंदिरों के साथ चर्च भी असुरक्षित हैें, इस्लामिक स्टेट (आईएस) जिसने रविवार के हमलों की जिम्मेवारी का दावा किया है उसने केवल गिरजाघरों को नष्ट किया है।

विभिन्न एशियाई देशों सहित दुनिया भर में गिरजाघरों को इस आतंकवादी संगठन ने अपना निशाना बनाया है। लेकिन श्रीलंका में मुसलमानों और ईसाइयों, के बीच किसी भी प्रकार के संघर्ष की कोई खबर नहीं है। इन दोनों धार्मिक समूहों ने कई अवसरों पर बहुसंख्यक सिहंल-बौद्धों और अब निष्क्रिय लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के एक वर्ग की आक्रामता का मिलकर सामना किया था।

”श्रीलंका के मुसलमानों ने कभी भी लिट्टे के प्राथमिक लक्ष्य छोटे से देश के उत्तरी भाग मे तमिल लोगों के लिए एक अलग मातृभूमि स्थापित करनेे का समर्थन नहीं किया था। वे तमिल भाषा बोल सकते हैं, और कई मुस्लिम परिवार लिट्टे द्वारा नियंत्रित इलाके के पास रहते हैं। सिंहल बौद्धों के वर्चस्व वाले कोलंबो में कई मुस्लिम परिवारों पर जासूसी करने का शक किया गया था’’ बताते हैं डब्ल्यू चामिंडा जो कि एक राजनीतिक विश्लेषक हैं। कोलंबों के एक राजनीतिक पर्यवेक्षक ने बताया कि इस कारण लिट्टे का नेतृत्व स्थानीय मुसलमानों के साथ सहज नहीं था और इसने कई असवरों पर उन्हें निशाना भी बनाया था।

दक्षिण एशिया के प्राचीन जातीय समूहों में से एक तमिल लोग भारत के दक्षिणी हिस्सों और श्रीलंका के पूर्वोत्तर क्षेत्रों में रहते हैं। वास्तव में यह द्वीप राज्य किसी समय (10वीं और 11वी शताब्दी) तमिल शासकों द्वारा शासित था। 1970 में वेलुपिल्लई प्रभाकरन के नेतृत्व में लिट्टे ने श्रीलंका के बाहर एक स्वतंत्र तमिल भूमि के लिए सशस्त्र संघर्ष शुरू किया। चामिंडा ने दावा किया है कि हाल के सालों में उनके देश का जनसंख्या पैटर्न बदल गया है। मुस्लिमों ने तेजी से अपनी संख्या बढ़ाई और आज वे सिहंल-बौद्धों (लगभग 70 फीसद) के बाद एक और सबसे बड़ा समुदाय बनने के लिए हिंदू आबादी (लगभग 11 फीसद) की संख्या को छू सकते हैं। श्रीलंका की कुल 210 लाख आबादी में ईसाई आबादी लगभग सात फीसद है।

मुस्लिम आबादी के निरंतर विकास के साथ सिहंल -बौद्ध राष्ट्रवादियों ने हाल ही में देश के दूरदराज के हिस्सों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में तेजी से हो रही वृद्धि को भी देखा। उन्होंने यह भी देखा कि स्थानीय मुसलमानों ने ठेठ मध्यपूर्वी पोशाक को पहनना शुरू कर दिया और धार्मिक प्रायोजनों के लिए अरबी भाषा को अपनाना शुरू कर दिया। प्राधिकरण को या तो इसके विकास के बारे में बहुत कम जानकारी थी या बस इसे नजऱअंदाज कर दिया गया था।कुछ कारणों से जनवरी 2015 में सत्ता में आई वर्तमान सरकार ने खुफिया सेवाओं के साथ सशस्त्र बलों को भी व्यवस्थित रूप से अनदेखा किया। रिकार्डस के अनुसार 40 गुप्तचर अधिकारी जो लिटृटे विरोधी युद्ध में शामिल थे वे अब जेल में हैं। शायद विभिन्न सुरक्षा संबंधी मुद्दों को हल करने के लिए सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है बताते है चामिंडा।

उदाहरण के लिए श्रीलंका का कानून एक ऐसे नागरिक को सजा नहीं देता जो देश के बाहर एक आतंकी संगठन में शामिल होने के बाद वापिस लौटा हो। हो सकता है कि वह विदेशी धरती पर कट्टरपंथी हो और आतंकी गतिविधियों में जुडऩे के एकमात्र उद्देश्य के साथ वापस आया हो और इस्लाम की रक्षा के लिए आतंकी गतिविधियों और जेहाद में शामिल करने के लिए स्थानीय युवाओं को प्रेरित करने के उद्देश्य से वापिस आया हो। प्रेरणा इतनी मज़बूत है कि अमीर पृष्ठभूमि के शिक्षित युवा भी अक्सर हिंसक रास्ते को चुनते हैं।

श्रीलंका के इस्लामी बमवर्षक उच्च शिक्षित थे और उनमें से कुछ ने विदेशों में अपनी शिक्षा पूरी की थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से आत्मघाती दस्ते के सदस्यों को सावधानी पूर्वक शहदत के लिए प्रेरित किया जाता है। दुनिया भर में शरीयत कानूनों के तहत खलीफा शासन स्थापित करने के लिए युवा दिमाग को इस एकमात्र विचार के साथ बड़ा किया जाता है कि अगर वे शरीय कानून स्थापित करने के लिए खुद को मारते हंै, तो उन्हें स्वर्ग प्राप्त होगा।

”विदेशी धरती में आतंकवादी समूहों द्वारा प्रशिक्षित युवाओं से निपटने के लिए विशेष कानून न होने के बावजूद, सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। श्रीलंका में हथियारों और गोला बारूद की खरीद से संबंधित और आतंकी गतिविधियों में स्थानीय निवासियों के प्रशिक्षण से संबंधित बहुत से कानून हैं। 2009 में लिट्टे पर जीत के बाद सरकार लगभग सो रही थी ‘‘ यह कहना है युवा विश्लेषक का।

राष्ट्रपति सिरीसेना जो संवैधानिक रूप से देश की रक्षा, और अतंरराष्ट्रीय कानून और व्यवस्था के लिए जिम्मेवार हैं, उन्होंने हाल ही में यह टिप्पणी की है कि अधिकांश सक्रिय इस्लामी कट्टरपंथी समूहों को सरकारी बलों द्वारा समाप्त कर दिया गया है या गिरफ्तार कर लिया गया है। बाकी अगर कुछ सक्रिय हैं तो इस साल नवंबर-दिसंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों से पहले वे भी बेअसर हो जाएंगे।

 स्थिति का लाभ उठाते हुए विपक्षी नेता और पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा ने फिर से शक्ति के गलियारे में आने की कोशिश की है। कट्टर राष्ट्रवादी को नवंबर 2018 में प्रधानमंत्री के रूप में (पीएम विक्रमसिंघे को र्बखास्त करने के बाद) राष्ट्रपति सिरीसेना ने चुना था। लेकिन विभिन्न कोणों से विरोध के कारण राजपक्षे इस अवसर से चूक गए।

 राजपक्षे जिन्होंने सशस्त्र संगठन एलटीटीई को कुचलने के लिए सशस्त्र बलों का नेतृत्व किया उन्होंने सिहंल लोगों के बीच भारी लोकप्रियता पाई और देश के राष्ट्रपति के रूप में दो बार कार्यकाल पूरा किया। इसलिए जब तक संविधान में संशोधन नहीं हो जाता तब तक वह उस पद पर वापिस नहीं आ सकते। अन्यथा राजपक्षे 2020 के राष्ट्रीय (संसदीय) चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव लड़ सकते हैं।

अब तक लंका सरकार ने दो इस्लामवादी संगठनों जैसे कि राष्ट्रीय तौहीद जमात (एनटीजे) और जमथेई मिलथु इब्राहिम (जेएमआई) पर प्रतिबंध लगा दिया है जो कुछ सालों से देश में सक्रिय थे और रविवार को हुए बम विस्फोटों में संदेह में थे। आतंक की पुनरावृति के साथ सक्रिय प्राधिकरण ने पहले ही देश में लगाए गए आपातकालीन नियमों की पृष्ठभूमि में बढ़े पैमाने पर अभियान शुरू किया है। इस प्रकार जो उथल-पुथल श्रीलंका में वापिस आई है और यह अभी कई महीनों तक जारी रह सकती हैं।

लेखक पूर्वोत्तर भारत के गुवाहाटी में स्थित पत्रकार हैं।