शेर के दांत दिखाने के

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दरअसल चुनाव सुधार कोई आज का मुद्दा नहीं है. सामाजिक और राजनीतिक मोर्चों पर चुनाव सुधार की मांगें वर्षों से उठती आई हैं. 90 के दशक के बाद आयोग ने इस दिशा में गंभीरता से विचार करना शुरू किया हालांकि चुनाव सुधारों को लेकर आयोग ने कानून मंत्रालय के सामने पहला प्रस्ताव 1970 में ही रख दिया था. इसके बाद 1975 में आठ राजनीतिक दलों ने भी मिल कर एक साझा प्रस्ताव सरकार के सामने रखा था. इसके बाद 1977 और 1982 में फिर से चुनाव आयोग ने सरकारों को चुनाव सुधारों से संबंधित प्रस्ताव भेजे.

इस तरह देखा जाए तो चुनाव आयोग लगातार सरकार को अपनी तरफ से चुनाव सुधारों की याद दिला रहा था, लेकिन सरकार इन पर आंखें मूंदे रही. 1990 में चुनाव आयोग ने इस मसले पर अपने तेवरों में कड़कपन लाना शुरू कर दिया. इसका असर यह हुआ कि सरकार ने पहली बार तब के कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में एक समिति बना दी. समिति के गठन के दो साल बाद 1992 में तब के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव को एक पत्र लिखकर गोस्वामी समिति की रिपोर्ट लागू करने की सिफारिश की. ऐसा करने के बजाय सरकार ने अगले साल वोहरा समिति और फिर 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति बना दी. इन दोनों समितियों ने भी चुनाव व्यवस्था में सुधार के लिए कई महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की जिन पर धूल की मोटी परत जम चुकी है.

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एक ही पाले में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी

वैसे भले ही वे विपरीत ध्रुवों पर हों, लेकिन आचार संहिता के उल्लंघन की बात हो तो भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस की नैय्या के खिवैय्या राहुल गांधी एक ही पाले में खड़े नजर आते हैं. दोनों के खिलाफ आयोग की कवायद भी एक जैसी ही रस्मअदायगी वाली रही है.

बात पिछले साल छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान की है. एक चुनावी रैली में पहुंचे नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कांग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए ‘खूनी पंजा’ शब्द का प्रयोग किया. इसे आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस थमा दिया. आयोग के नोटिस के जवाब में मोदी की सफाई थी कि उन्होंने प्रचलित मुहावरे के अनुरूप इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया था. मोदी के इस जवाब के बाद आयोग ने उन्हें दुबारा ऐसा न करने की सलाह देकर इस मामले को निपटा दिया.

फोटो: शैलेंद्र पाण्डेय
फोटो: शैलेंद्र पाण्डेय

इसी दौरान मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी एक चुनावी रैली में इंदौर पहुंचे. अपने भाषण में मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन दंगों से प्रभावित कुछ मुस्लिम युवाओं को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी बरगलाने की कोशिश कर रही हैं. इस बयान से पूरे देश में बवाल मच गया. भाजपा ने राहुल गांधी पर धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग से शिकायत की. आयोग ने उन्हें नोटिस भेज जवाब मांगा. जवाब में राहुल ने कहा कि उन्होंने जो कुछ बातें कहीं वे धार्मिक आधार पर बंटवारे के लिए नहीं बल्कि आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिए थी. उनके इस जवाब से चुनाव आयोग संतुष्ठ नहीं हुआ और उसने उन्हें आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी मानते हुए भविष्य में संयत रहने की चेतावनी दी.

इन दोनों ही मामलों में एक बात बेहद महत्वपूर्ण यह है कि दोनों ही नेताओं को आयोग ने अपना जवाब सौंपने के लिए पहले तय किए गए वक्त से ज्यादा मोहलत दी थी. मोदी ने चुनाव प्रचार में व्यस्त होने की दलील दी थी तो वहीं राहुल गांधी का तर्क था कि छुट्टियों के चलते वे जवाब देने के विए और वक्त चाहते हैं. जिस उदारता की बात उपर की गई है ये घटनाएं उसकी तरफ साफ इशारा करती हैं.

इससे पहले 2012 में भी राहुल गांधी कानपुर में आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन कर चुके थे. तब उन्होंने प्रशासन द्वारा तय की गई दूरी से बहुत आगे तक रोड शो किया था. चुनाव आयोग तक शिकायत पहुंचने के बाद कानपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी हरिओम ने राहुल गांधी के अलावा इस रोड शो के आयोजक कांग्रेसी नेता महेश दीक्षित पर भी धारा 144 का उलंलंघन करने के चलते मामला दर्ज किया. लेकिन ऐसा होते ही पूरी कांग्रेस आयोग के खिलाफ जहर उगलने लगी थी. पार्टीनेता और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने तब आयोग को सीधी चुनौती देते हुए यहां तक कह दिया कि, ‘आयोग में अगर हिम्मत है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई करके दिखाए, क्योंकि राहुल गांधी को इस रोड शो में मैं ही लेकर गया था.’ चुनाव आयोग को खुलेआम चेतावनी देने वाले वे अकेले नेता नहीं हैं. उनसे पहले भी दो और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद तथा बेनी प्रसाद वर्मा इसी तरह आयोग को ललकार चुके थे. 2007 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी आचार संहिता उल्लंघन के दोषी करार दिए जाने के बावजूद आयोग ने चेतावनी देकर छोड़ दिया था. सवाल स्वाभाविक है कि आयोग को इस कदर खुले आम आंख दिखाने वालों के खिलाफ वह कुछ करता क्यों नहीं.

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अप्रैल 2012 में तत्कालीन सीईसी एसवाई कुरैशी ने चुनाव सुधारों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक कड़ा पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने और चुनाव में धनबल की भूमिका पर डंडा चलाने का खास तौर पर जिक्र किया गया था. उन्होंने पत्र में एक समाचार पत्रिका में छपी रिपोर्ट का हवाला भी दिया जिसके मुताबिक 2004 से 2009 के दौरान लोकसभा की चर्चा में शरीक होने वाले सांसदों की संख्या मात्र 174 थी. कुरैशी ने पत्र में लिखा कि, ‘हमें कुछ जिम्मेदार प्रतिनिधि चाहिए जिसके लिए चुनाव सुधार बेहद जरूरी हैं.’ उन्होंने पत्र में यह भी लिखा कि आयोग द्वारा भेजे गए बहुत से सुझावों को बिना संविधान संशोधन के ही लागू किया जा सकता है.

इस सबके बाद भी हुआ कुछ नहीं. यहां पर एक और गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि चुनाव आयोग इससे पहले 1998 से लेकर 2006 तक चार बार सरकार से इसी तरह की मांग कर चुका है. सरकार के रवैये से दुखी कुरैशी कहते हैं, ‘बहुत हैरानी की बात है कि चुनाव सुधारों को लेकर इतनी उदासीनता क्यों है. दो दशक से सरकार के पास दो दर्जन से अधिक सुझाव पड़े हैं, लेकिन इनको लागू करने के बजाय सरकार आम सहमति नहीं बन पाने का बहाना बना कर हर बार चुनाव सुधारों से भाग रही है.’

राजनीतिक दलों के बीच रायशुमारी नहीं होने की जिस बात को सरकार कह रही है, क्या वाकई में चुनाव सुधारों में हो रही देरी का असली कारण यही है. यह जानने के लिए इस कथा को एक दूसरे घटना क्रम की तरफ मोड़ते हैं.

बात पिछले साल मई की है. चुनाव सुधार को लेकर राजनीतिक दलों की राय जानने के लिए विधि आयोग ने देश की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को पत्र भेज कर उनके सुझाव मांगे थे. लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कर्नाटक के एक राजनीतिक दल वेल्फेयर पार्टी ऑफ इंडिया के अलावा किसी भी पार्टी ने कोई सुझाव देने की जहमत नहीं उठाई. हैरानी की एक बात और भी यह थी कि संसद के सभी सांसदों में से सिर्फ आठ ने ही सुधारों को लेकर अपने सुझाव आयोग को भेजे. राजनीतिक दलों के इस उदासीन रवैये पर बीते दिनों विधि आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश अजित प्रकाश शाह ने भारी निराशा भी जताई थी.

तो क्या अब भी यह माना जाना चीहिए कि चुनाव सुधारों को लेकर राजनीतिक दलों में आम राय नहीं है? इस पर चुटकी लेते हुए कुरैशी का कहना था, ‘चुनाव सुधारों को लेकर भले ही इनके बीच आम राय न बन रही हो, लेकिन इस बात पर तो सभी पार्टियां एक मत हैं कि किसी भी सूरत में चुनाव सुधार के लिए सुझाव नहीं सौंपेंगे.’

चुनाव आयोग द्वारा सरकार को सौंपे गए चुनाव सुधारों की सूची देखे जाने पर मालूम पड़ता है कि इनमें से बहुत सारे सुधार वर्तमान परिस्थितियों में सख्त जरूरत बनते जा रहे हैं. जानकारों का मानना है कि इन सुधारों के जरिये देश में साफसुथरी राजनीति की स्थापना करने में बड़ी मदद मिल सकती है. पॉलिटिकल फंडिंग में पारदर्शिता के सुझाव का जिक्र किया जाना यहां पर बेहद प्रासंगिक है. आयोग का मानना है कि राजनीतिक पार्टियों को मिल रहे धन के स्रोत सार्वजनिक होने चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि उन्हें मिलने वाला पैसा काला धन तो नहीं. लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने के बजाय सभी राजनीतिक दल इस बात के जिक्र तक से नाराज दिखते हैं.

केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने के फैसले पर उनकी नाराजगी इसका सटीक प्रमाण है. पिछले साल सूचना आयोग ने एक अपील पर सुनवाई करते हुए फैसला दिया कि छह राष्ट्रीय पार्टियां – कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, एनसीपी और बसपा – आरटीआई एक्ट की धारा 2 के तहत सार्वजनिक इकाइयां हैं. इस आदेश का उद्देश्य राजनीतिक दलों को मिलने वाले अनुदान के स्रोतों का पता लगाना था. लेकिन इस आदेश के आते ही ज्यादातर पार्टियां नाराज हो गई और एकजुट होकर इसकी जबर्दस्त मुखालफत करने लगीं. इस फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने संसद में एक संशोधन प्रस्ताव भी पेश किया. हालांकि यह बिल संसद की स्थायी समिति को भेज दिया गया है, लेकिन इसने राजनीतिक दलों की मंशा की ओर तो इशारा किया ही है. प्रोफेसर त्रिलोचन शास्त्री कहते हैं ‘राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे कि उनके आय के स्रोत सार्वजनिक हों.’

लेकिन यहां पर यह सवाल तब भी उठता है कि अगर राजनीतिक दल चुनाव सुधारों को लेकर आगे भी गंभीर नहीं होते हैं, तो क्या चुनाव आयोग को भी हाथ-पैर चलाना बंद कर देना चाहिए?

‘बेशक चुनाव सुधारों को लेकर कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन वहां ऐसे लोगों और दलों की अधिकता है जो चुनाव प्रक्रिया की खामियों को लेकर ही आगे बढ रहे हैं. ऐसे में आयोग को इस लिए दोष दिया जाना चाहिए कि उसने इन खामियों को दूर करने के लिए सुझाव तो दिए लेकिन उन सुझावों को लागू करवाने के लिए जिद नहीं पकड़ी. ‘ समाजशास्त्री तथा अब आम आदमी पार्टी के नेता प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं, ‘चुनाव आयुक्तों को चाहिए कि वे इस संस्था को और मजबूती देने वाले अधिकारों की मांग को लेकर और गंभीरता दिखाएं वरना लोग सीबीआई की तरह चुनाव आयोग को भी सरकार का टूल कहने लगेंगे.’ आजम खान द्वारा आयोग पर लगाये हालिया आरोप के संदर्भ में देखा जाए तो इन आशंकाओं का ट्रेलर अभी से दिखाने लगा है.

हालांकि आईआईएम के पूर्व प्रोफेसर तथा एडीआर के सदस्य जगदीप छोकर इसके लिए चुनाव आयोग को पूरी तरह दोष देने से इनकार करते हैं. आयोग के अब तक के रवैये को सकारात्मक बताते हुए वे कहते हैं कि, ‘वर्तमान परिस्थियों में जिस तरह सीमित अधिकारों के सहारे चुनाव आयोग अपना काम कर रहा है वह सराहनीय है. लेकिन यह बात भी उतनी ही जरूरी है कि अगर वह अपनी तरफ से अतिरिक्त प्रयास ना करे तो सरकार से सुधारों की उम्मीद करना दिवास्वप्न देखने जैसा ही होगा.’ वे आगे कहते हैं, ‘ऐसी सूरत में न्यायपालिका का विकल्प भी है लेकिन उसपर निर्भरता बढने से आयोग की खुद की क्षमताओं पर गंभीर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे.’

प्रोफेसर छोकर की कही बात के उदाहरण हम हाल ही में देख चुके हैं. पिछले साल चुनाव सुधारों के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्रत्याशियों को खारिज करने (‘इनमें से कोई नहीं’) और सजायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी दो महत्वपूर्ण फैसले सुनाए. इन दोनों ही मुद्दों को बहुत पहले से ही चुनाव सुधारों की सूची में डाल कर आयोग सरकार की हां की बाट जोहता आ रहा था. दागी नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का सुझाव उसने 1989 में ही दे दिया था जबकि नकारात्मक मतदान के अधिकार का सुझाव उसने 2001 में सरकार को सुझाया था. लेकिन सरकार ने इन्हें कभी कोल्ड स्टोर से बाहर ही नहीं निकाला. चुनाव आयोग इसके बाद चुप बैठ गया. बाद में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाने वाले कुछ सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों फैसले सुनाए.

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धूल फांकते सुझाव

  • राजनीति का अपराधीकरण रोकना- 15 जुलाई 1998 को चुनाव आयोग द्वारा सरकार को एक प्रस्ताव भेजा गया जिसके तहत ऐसे लोगों पर चुनाव लड़ने से रोक का प्रस्ताव दिया गया था जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हों.1999, 2004 और 2006 में आयोग ने सरकार को इस बाबत फिर से याद दिलाई.
  • राजनीतिक दलों के लिए पारदर्शी कार्यप्रणाली – राजनीतिक दलों के कामकाज पर निगरानी रखने के लिए आयोग ने एक प्रस्ताव दिया जिसके मुताबिक उनकी आय के सभी स्रोतों के साथ ही सभी खर्चों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
  • चुनावी लाभ के लिए धर्म का दुरुपयोग रोकना -1994 में लोकसभा में एक विधेयक पेश किया गया था. जिसके तहत राजनीतिक दलों द्वारा धर्म के दुरुपयोग रोकने को रोके जाने के प्रावधानों को विकसित किए जाने की बात की गई. लेकिन 1996 में लोकसभा के भंग हो जाने के बाद से इस पर कोई पहल नहीं हुई. आयोग ने 2010 में प्रस्ताव दिया कि इस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए.
  • ‘पेड न्यूज’ को चुनावी अपराध घोषित करने के लिए कानून में संशोधन  (2011)
  • कार्यकाल समाप्त होने से छह माह पहले से ही सरकारी विज्ञापनों पर रोक (2004)
  • उम्मीदवारों द्वारा झूठे शपथ पत्र के लिए सजा (2011)
  • भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहने वाले हारे हुए उम्मीदवारों के खिलाफ भी याचिका दाखिल करने का अधिकार (2009)
  • चुनाव से ठीक पहले आयोग की सहमति के बिना चुनाव अधिकारियों के स्थानांतरण पर प्रतिबंध (1998) जुलाई, 2004 में आयोग ने इस बात को दोहराया.
  • आरपी अधिनियम के तहत आयोग को नियम बनाने की शक्ति (1998)
  • पंजीकरण रद्द करने का अधिकार- 1998 में चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से  दलों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार मांगा. मामला अब तक लंबित है.
  •  जनमत सर्वेक्षणों पर पाबंदी – इस बार लोक सभा चुनावों की घोषणा के मौके पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त वीएस संपत का कहना था कि उन्होंने जनमत सर्वेक्षणों पर पाबंदी के अपने प्रस्ताव को एक बार फिर से कानून मंत्रालय को भेजा है. गौरतलब  है कि चुनाव आयोग ने 2004 में ही जनमत सर्वेक्षणों और मतदान के बाद होने वाले सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश कर दी थी, लेकिन सरकार ने सिर्फ एग्जिट पोल पर रोक लगाना ही उचित समझा.

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इस तरह जो श्रेय आयोग के हिस्से आ सकता था वह सुप्रीम कोर्ट के खाते में जुड गया. हालांकि दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार ने अध्यादेशी गिद्ध-दृष्टि डाल दी थी, लेकिन जन-दबाव के चलते वह इस कदम से पीछे हट गई. कई लोगों का यह भी मानना है कि राहुल गांधी के हस्तक्षेप की वजह से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने वाला अध्यादेश नहीं आया. लेकिन उनके हस्तक्षेप के पीछे भी जनता का दबाव ही तो था.

इस आदेश के खिलाफ अध्यादेश नहीं ला पाने के जो भी कारण रहे हों, लेकिन यह साफ है कि चुनाव सुधारों को लेकर वर्तमान सरकार का रुख कतई सकारात्मक नहीं रहा.

देश की मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक चुनाव संबंधी नियमों में सुधार अथवा संशोधन की जिम्मेदारी कानून मंत्रालय की होती है. चुनाव संचालन नियमन 1961 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में फेरबदल की पहल भी कानून मंत्रालय द्वारा ही की जा सकती है. इसे लेकर चुनाव आयोग केवल अपने सुझाव ही दे सकता हैं जिसे मानना या न मानना पूरी तरह सरकार पर निर्भर करता है. लेकिन चुनाव सुधारों को लेकर सरकार द्वारा उठाए गये कदमों की पड़ताल करने पर हालिया सरकार की कुल जमा उपलब्धि इतनी ही रही है कि उसने चुनाव आयोग द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों में हर बार ‘पाक साफ’ काम करने का बयान दिया है. असलियत में उसका व्यवहार हमेशा इसके उलट रहा है. पिछले बीस सालों में चुनाव सुधारों को लेकर आयोग द्वारा भेजे गये सुझावों पर अमल करने के बजाय सरकार उन पर कुंडली मार कर ही बैठी है. अनिश्चतता के भंवर में हिचकोले खा रहे इन सुझावों की संख्या दो दर्जन से अधिक हो चुकी है (देखें बाक्स). लेकिन इससे भी चिंताजनक बात यह है कि सरकार ने ऐसे उपक्रम भी किये हैं जिनमें चुनाव आयोग की बची-खुची शक्तियों को पूरी तरह खत्म कर देने की साजिश भी नजर आती है. आगे बताई जा रही घटना इस का जीता जागता प्रमाण है.

2012 में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों के दौरान सियासी गलियारों से एक खबर निकली. खबर का मजमून यह था कि केंद्र सरकार आचार संहिता को कुछ इस तरह की वैधानिक शक्ल दे रही है कि इससे चुनाव आयोग के अधिकार काफी सीमित हो जाएंगे. इस पर बवाल होते ही सरकार के तीन मंत्री इसका खंडन करने में जुट गए. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी इस जमात में शामिल थे. इस बीच सितंबर 2011 का एक कैबिनेट नोट मीडिया में लीक हो गया. इस दस्तावेज ने मंत्रियों का झूठ सामने ला कर रख दिया. दस्तावेज की भाषा साफ तौर पर चुनाव आयोग के खिलाफ थी. इसके मुताबिक चुनाव आचार संहिता को विकास कार्यों की राह का स्पीड ब्रेकर बताते हुए उसे वैधानिक शक्ल देने की जरूरत पर बल दिया गया था. सरकार की इस मंशा से आगबबूला हो कर चुनाव आयोग ने तुरंत अपनी नाराजगी जाहिर की थी. तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी का कहना था कि आयोग सरकार के इन मंसूबों को किसी भी हाल में कामयाब नहीं होने देगा. आखिरकार आयोग के तेवरों और विपक्ष के दबाव के बाद सरकार को इस योजना को टालना पड़ा.

एक और उदाहरण है जो यह दिखाता है कि आयोग अगर अपने रवैये को लेकर सख्ती अपना ले तो वह सरकारों को अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर कर सकता है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उसका टकराव इसकी ताजा मिसाल है. चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान कुछ अधिकारियों के तबादलों के निर्देश दिए थे. लेकिन ममता ने ऐसा करने से इंकार करते हुए आयोग को सीधी चुनौती दे दी. गुस्साए आयोग ने जब समूचे पश्चिम बंगाल में चुनाव रद्द करने की धमकी दी तो ममता को बैक फुट पर आना पड़ा.

जानकारों की मानें तो अतीत में आयोग द्वारा जिस तरह से चुप्पीनुमा कार्यप्रणाली को अंजाम दिया जाता रहा है उससे सत्ता में बैठे लोगों को हिम्मत मिलती रही है. आयोग को चाहिए कि चुनाव सुधारों को लेकर वह अब अपनी पूरी ताकत झोंक दे. इतना साफ है कि चुनाव सुधारों को लेकर सरकार समेत राजनीतिक दल समय-समय पर भले ही अपनी प्रतिबद्धता जताते रहे हों लेकिन असलियत में चुनाव आयोग की सेंसरशिप उन्हें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है. ऐसे में यदि चुनाव आयोग भी इसे अपनी नियति मान लेता है तो वक्त आ गया है कि उससे भी कुछ कड़े सवाल पूछ लिए जाएं.

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