शीतयुद्ध का पुनर्जन्म !

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राष्ट्रपति विक्तोर यानुकोविच पहले भूमिगत, फिर बर्खास्त, और उसके बाद वांछित होने के बाद अब रूस में प्रकट हो गए हैं. सत्ता एक कार्यवाहक सरकार ने संभाल ली है. 25 मई को नए चुनाव होंगे. यूलिया तिमोशेंको जेल से छूट गई  हैं. 2004 वाली पहली ‘नारंगी क्रांति’ की वही नेत्री थीं. जर्मनी चहक रहा है. अमेरिका बहक रहा है. रूस दहक रहा है.

उधर, जो यूक्रेन इन घटनाओं के केंद्र में है उसकी हालत बिलखने जैसी है. वह दिवालिया हो जाने के कगार पर है. दो टुकड़ों में टूट भी सकता है. वह तत्काल 35 अरब डॉलर की सहायता मांग रहा है. अमेरिका, यूरोपीय संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष–सभी उसे सहायता देने के लिए उद्यत दिख रहे हैं.

गृहयुद्ध की चपेट में आने से बाल-बाल बच गए यूक्रेन में घटनाक्रम पिछले दिनों तूफानी गति से घूमा.10 वर्षों में तीन सत्तापलट और तीन-तीन सरकारों का अधूरा कार्यकाल देख चुके इस देश में हुई हालिया हिंसा में 83 लोगों की जान चली गई. वहां हिंसा का जो उबाल सारी दुनिया ने देखा, उसकी आग में घी वास्तव में एक ऐसी घटना से पड़ा, जो हुई ही नहीं. भूतपूर्व सोवियत गणतंत्र और अब यूरोपीय संघ में शामिल लिथुआनिया की राजधानी विल्नियस में 28-29 नवंबर 2013 को एक शिखर सम्मेलन हुआ था. यूक्रेनी राष्ट्रपति विक्तोर यानुकोविच को वहां एक ‘साझेदारी समझौते’ पर हस्ताक्षर करना था.यह समझौता यूरोपीय संघ में उनके देश की पूर्ण सदस्यता का मार्ग प्रशस्त कर देता. लेकिन, यानुकोविच शिखर सम्मेलन में पहुंचे ही नहीं.

1200 पृष्ठों वाला यह समझौता, यूरोपीय संघ के अनुसार, किसी देश के सामने रखा गया अब तक का ‘सबसे व्यापक’ एवं उदार साझेदारी समझौता है. इसमें यूरोपीय संघ और यूक्रेन के बीच ‘मुक्त व्यापार क्षेत्र’ के निर्माण से लेकर हर तरह के आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी एवं कानूनी सहयोग के वे सारे प्रावधान हैं, जो किसी देश को यूरोपीय संघ की दुर्लभ पूर्ण सदस्यता पाने के सुयोग्य बनाते हैं. यूरोपीय संघ यूक्रेन को निकट भविष्य में ही अपनी पूर्ण सदस्यता का न केवल वचन दे रहा था, उसे अगले सात वर्षों में सवा अरब यूरो के बराबर सहायता का अलग से प्रलोभन भी दे रहा था. ऐसा विशिष्ट सम्मान पहले शायद ही किसी देश को मिला है. कारण यही हो सकता था कि भू-राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक और प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से रूस के इस दक्षिणी पड़ोसी का यूरोप के लिए इस समय जो महत्व है, वह किसी और देश का नहीं. ललचा-फुसला कर उसे रूसी छत्रछाया से बाहर निकालना और अमेरिकी प्रभुत्व वाले पश्चिमी खेमे का अभिन्न अंग बनाना सुखद भविष्य के बीमे के समान है.

पूतिन का माथा ठनका
समझौते की शर्तों पर वार्ताएं 2007 से ही चल रही थीं. नौ दिसंबर 2011 को हुए 15वें यूक्रेनी-यूरोपीय शिखर सम्मेलन में यूक्रेनी राष्ट्रपति यानुकोविच ने स्वयं मान लिया था कि समझौते की शर्तों और शब्दावली पर अब कोई मतभेद नहीं रहा. तब भी, दो वर्ष बाद अंतिम क्षण में वे मुकर गए!  मुकर इसलिए गए, क्योंकि इस बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पूतिन का माथा ठनकने लगा था. लंबे समय तक शांत रहने के बाद उन्हें लगने लगा था कि यूक्रेन को यूरोपीय संघ का हिस्सा बनने से यदि अब न रोका गया, तो शायद कभी न रोका जा सकेगा. उन्होंने यूक्रेन को कुछ धमकियां दीं और साथ ही कुछ ऐसे प्रलोभन भी दिए, जो यूरोपीय संघ के प्रलोभनों से भी बढ़-चढ़ कर थे.

राष्ट्रपति पूतिन इस बात की अनदेखी नहीं कर सकते थे कि यूरोपीय संघ की सदस्यता केवल यूरोपीय संघ तक ही सीमित नहीं रहती. संघ का लगभग हर देश या तो अमेरिकी नेतृत्व वाले ‘उत्तर एटलांटिक संधि संगठन’ नाटो का भी सदस्य है या फिर देर-सवेर नाटो का भी सदस्य बन कर अपने यहां अमेरिकी सैनिकों और प्रक्षेपास्त्रों की तैनाती को स्वीकार करता है. ढाई दशक पूर्व बर्लिन दीवार गिरने के बाद विभाजित जर्मनी का एकीकरण होते ही उस समय के सोवियत संघ ने तो अपने नेतृत्व वाले ‘वार्सा सैन्य संगठन’ का तुरंत विघटन कर दिया, जबकि अमेरिका ने नाटो का विघटन करने से साफ मना कर दिया. विघटन तो क्या, इस बीच उत्तरी अमेरिका व यूरोप ही नहीं, सारे विश्व को नाटो का कार्यक्षेत्र बना दिया गया है. उस के सैनिक अफगानिस्तान तक में लड़ रहे हैं.

किएव के मैदान चौक पर जमा प्रदर्शनकारी और हिंसा
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रूस की घेरेबंदी
रूस तभी से भन्नाया हुआ था, जब 19 नवंबर 2010 को नाटो ने एक ऐसी नई रणनीति पारित की जिसका उद्देश्य रूस के पड़ोसी पूर्वी यूरोप के देशों में प्रक्षेपास्त्र-भेदी रक्षाकवच के तौर नए किस्म के रॉकेट तैनात करना है. कहा यह गया कि ये रॉकेट तीन हजार किलोमीटर दूर तक के ईरान जैसे देशों द्वारा चलाए गए प्रक्षेपास्त्रों को आकाश में ही नष्ट कर दिया करेंगे. रूस का कहना था कि यह रक्षाकवच हमारी घेरेबंदी के समान है. यदि उद्देश्य यूरोप को रक्षाकवच प्रदान करना ही है, तो एक यूरेशियाई देश होने के नाते हमें भी इस योजना में शामिल किया जाए. हम सब मिल कर यह कवच बनाएं. लेकिन, अमेरिका और उसके पिछलग्गू नाटो देशों ने रूस को इसमें शामिल करना उचित नहीं समझा.

फरवरी 2012 से नाटो की इस योजना पर काम शुरू हो गया है. 2020 तक पोलैंड, चेक गणराज्य और बाल्टिक देशों सहित कई देशों में दर्जनों अमेरिकी रॉकेट तैनात किये जाएंगे. अमेरिका और यूरोपीय संघ उन्हें यूक्रेन में भी देखना चाहेंगे. नाटो के इस रक्षाकवच का कमान केंद्र जर्मनी में रामश्टाइन स्थित अमेरिकी वायुसैनिक अड्डे को बनाया गया है. अमेरिका और रोमानिया ने 31 जनवरी 2012 को एक अलग समझौता किया है. इसके अंतर्गत अमेरिका 2015 से रोमानिया के देवेशेल्यू वायुसैनिक अड्डे पर 24 ‘एसएम-3’ प्रक्षेपास्त्र-भेदी रॉकेट तैनात करना शुरू कर देगा.

कल्पना करें कि यदि चीन नेपाल में इसी तरह का कोई रक्षाकवच बनाने लगे, तो भारत क्या उसे बधाई देगा?  साफ है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पूतिन भी भूल नहीं सकते थे कि 1962 में जब ख्रुश्चेव ने क्यूबा में सोवियत परमाणु राकेट भेजे, तो अमेरिका ने किस तरह आसमान सिर पर उठा लिया था. इसलिए रूस ने पिछले वर्ष ‘इस्कांदर एम’ नाम की अपनी 10 रॉकेट प्रणालियां– जिन्हें नाटो की शब्दावली में ‘एसएस-26 स्टोन’ कहा जाता है– यूरोपीय संघ वाले पूर्वी यूरोपीय देशों के निकट तैनात कर दीं. 280 किलोमीटर मारकदूरी वाले ये रॉकेट परमाणु और पारंपरिक, दोनों तरह के अस्त्र ले जा सकते हैं, हालांकि वे सही मायने में प्रक्षेपास्त्रभेदी नहीं हैं. उन्हें चलायमान प्रक्षेपण-वाहनों पर से दागा जाता है.

ukशीतयुद्ध की वापसी
इस तरह देखें तो बर्लिन दीवार गिरने के पहले का पूर्व-पश्चिम शीतयुद्ध एक बार फिर लौट आया है. एक बार फिर अमेरिका और उसके पिछलग्गू रूस को नीचा दिखाने के लिए उसकी घेरेबंदी करने लगे हैं. रूस को वे तौर-तरीके अपनाने पर पुनः मजबूर होना पड़ रहा है, जिनसे उसका सोवियत-काल कलंकित हुआ था. यूक्रेन भूतपूर्व सोवियत संघ का एक ऐसा बहुत ही महत्वपूर्ण अंग रहा है, जिसके खेत न केवल अन्न के अंबार और कारखाने शस्त्र-भंडार रहे हैं, बल्कि जिसने सोवियत-काल में लेओनिद ब्रेज़नेव जैसे कई चोटी के नेता भी दिए थे. रूस और यूक्रेन का सदियों लंबा साझा इतिहास है. 1654 में यूक्रेन स्वेच्छा से जारशाही रूस का हिस्सा बना था. उस समय बोखदान ख्मेल्नित्स्की नाम के एक यूक्रेनी राष्ट्रनायक ने तत्कालीन पोलिश राजशाही के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठा कर यूक्रेन का जारशाही रूस में विलय कराया था. इसी कारण पूर्वी यूक्रेन में आज भी रूसी भाषा की प्रधानता और रूस के साथ निकटता के प्रति व्यापक समर्थन है. पूर्वी यूक्रेन का ओदेसा शहर रूसी जलसेना के काला सागर बेड़े का आज भी मुख्यालय है.

यूक्रेन को रूस से अलग करने का पहला प्रयास प्रथम विश्वयुद्ध के अंतिम वर्ष, 1918 में, उसके तब के और अब के भी प्रतिद्वंद्वी जर्मनी ने ही किया था. इस वर्ष, यानी जुलाई-अगस्त 1914 में, प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने की शतवार्षिकी पड़ रही है. जर्मनी की ही सहायता और संभवतः उसी के पैसे से रूसी समाजवादी क्रांति के महानायक व्लादीमीर लेनिन स्विट्जरलैंड में अपने निर्वासन को त्याग कर 1917 में रूस लौटे थे. युद्ध का अंतिम वर्ष आने तक जर्मनी उत्तर में बाल्टिक सागर से लेकर दक्षिण में काला सागर तक के अपने कब्जे वाले भूभाग पर अपनी पसंद के कई पिछलग्गू देश बना चुका था. यूक्रेन उनमें सबसे प्रमुख था.

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