शिवराज सिंह चौहान

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बात कोई बीस बरस पहले की है. अयोध्या के विवादित ढांचे पर राम मंदिर बनाने के लिए चलाए गए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आंदोलन से देश भर में एक नई सियासी लहर चल रही थी. इन दिनों आंदोलन में अग्रणी रहने की वजह से साध्वी उमा भारती एक जाना-पहचाना नाम बन गई थीं. ठीक उन्हीं दिनों कुर्ता- पाजामा और चप्पल पहनने वाला एक दुबला-पतला युवक भाजपा के भीतर अपना राजनीतिक मुकाम तलाश रहा था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवतावाद’ का समर्थक और भाजपा में युवा नेतृत्व की बागडोर थामने वाले इस युवक के लिए साध्वी से मिलना-जुलना कोई विशेष बात नहीं रह गई थी. बताते हैं कि एक दिन युवक ने बातों ही बातों में साध्वी से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठने के लिए आशीर्वाद मांगा. साध्वी पीछे हट गईं. उसी दिन उन्होंने जान लिया था कि इस युवक की नजर भी मुख्यमंत्री की गद्दी पर है.

जैत (सीहोर) गांव से राजनीति की लंबी परिक्रमा करने के बाद यही युवक आज मप्र में मुख्यमंत्री की गद्दी पर आसीन है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बारे में यह कहानी प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में खूब कही-सुनी गई है लेकिन कितनी सच है, कितनी झूठ यह कहना मुश्किल है. फिर भी इसमें कोई संशय नहीं कि भाजपा के भीतर उमा भारती से उनकी अदावत एक खुली किताब की तरह है.

उस वक्त राजनीति में शिवराज चौहान के आगे बढ़ने की एक वजह यह बताई जाती है कि 1992 के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में कांशीराम, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता दलित और पिछड़े समुदाय को गोलबंद करने में सफल हो रहे थे. राजनीति में जातिवादी ध्रुवीकरण से भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति पिछड़ रही थी. ऐसी स्थिति से निपटने के लिए भाजपा ने भी पिछड़े तबकों से नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई. और इसी के तहत मप्र में जब पिछड़े तबके से उमा भारती (लोधी) को आगे बढ़ाया गया तो उनके पीछे शिवराज सिंह चौहान का नाम भी आगे बढ़ा. बाद में राजनीति के इतिहास का भी यह अहम तथ्य बना कि मुख्यमंत्री की गद्दी पर उमा भारती चौहान से पहले ही पहुंचीं. यह ठीक एक दशक पहले की बात है जब दस साल पुरानी दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार को ऐतिहासिक पटखनी देने के बाद उमा भारती मुख्यमंत्री बनी थीं. मुख्यमंत्री बने अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था कि उनके खिलाफ 1994 के हुबली (कर्नाटक) दंगों के संबंध में गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ. दिल्ली में बैठे भाजपा नेताओं के चौतरफा दबाव के बाद अगस्त, 2004 में उन्हें अपनी गद्दी से उतरना पड़ा. बताते हैं कि तब मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में चौहान का नाम सबसे आगे था. तब वे सांसद थे और उमा भारती विधायकों में से ही किसी को मुख्यमंत्री बनाने की बात पर अड़ गईं. इसीलिए बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन इसके एक साल बाद गौर एक महिला के साथ यौन शोषण के आरोप में ऐसे फंसे कि उन्हें भी मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी. इस बीच चौहान दिल्ली की सियासत में वरिष्ठजनों पर भरोसा जमाते हुए पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके थे. लेकिन गौर के हटते ही उमा ने एक बार फिर मुख्यमंत्री की गद्दी पर अपना दावा ठोकते हुए चौहान को पीछे धकेलना चाहा. किंतु इस बार पार्टी ने उनकी एक नहीं सुनी. और उसके बाद उन्हें पार्टी ने किनारे कर दिया. नवंबर, 2005 में चौहान ने मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठने के साथ ही उमा से पुराना हिसाब चुकता कर लिया. यह प्रसंग हमें चौहान की राजनीतिक शैली का दर्शन कराता है. जिसका लब्बोलुआब यह है कि वे अपने विरोधियों से पहले विनम्रता से निपटना चाहते हैं. लेकिन जब बात नहीं बनती तो विरोधी होकर भी बिना विरोध दिखाए एक दिन अपनी मंजिल पहुंचते हैं. और देर तक ठहरते हैं.

मॉडल स्कूल (भोपाल) के दिनों के साथी रहे उनके कई मित्र बताते हैं कि कबड्डी के खेल में माहिर चौहान ने मैदान में जमकर उठापटक की है. यह और बात है कि किसी साथी के गुस्सा होने पर वे उसे मनाने में भी देर नहीं लगाते थे. ‘समन्वय की राजनीति’ का ही ताबीज पहने हुए 1975 को वे मॉडल स्कूल छात्र संघ के अध्यक्ष बन गए. आज इसी मंत्र का उच्चारण करते हुए उनकी राजनीतिक यात्रा अपने 37वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है. इस दौरान ‘सबको साथ लेकर चलने’ के रास्ते पर चलते हुए  वे विधायक (1990), सांसद (1991-2004) और भारतीय राष्ट्रीय युवा मोर्चा के अध्यक्ष (2000-2003) पद तक पहुंचे. जहां तक उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद की बात है तो प्रदेश की भाजपा में कई ऐसे नेता हैं जो मौका मिलने पर शिवराज पर भारी पड़ सकते हैं. इनमें एक नाम राज्य के कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का है. लेकिन बुजुर्गों के पेंशन घोटाले में नाम आने के बाद से वे शिवराज पर हावी नहीं हो पाए. इसी कड़ी में रहली विधानसभा क्षेत्र से लगातार छह बार विधायक बनने वाले गोपाल भार्गव में बुंदेलखंड (सागर) का बड़ा नेता बनने की संभावना है. लेकिन चौहान ने उसी इलाके से दमोह विधायक जयंत मलैया का अपनी सरकार में कद बढ़ाकर भार्गव के पंख कतर दिए. इसी तरह, ग्वालियर से अनूप मिश्रा की चुनौती से निजात पाने के लिए चौहान ने उसी इलाके से विधायक नरोत्तम मिश्रा को राज्य सरकार का प्रवक्ता बनाया और रिश्ते में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा को घुटने के बल बैठा दिया. यह चौहान की सियासी सूझ-बूझ का ही नतीजा है कि आज मप्र में भाजपा पूरी तरह से उनके कंधों पर निर्भर हो चुकी है.

mpशिवराज ही भाजपा, भाजपा ही शिवराज
मध्य प्रदेश में बीते कुछ सालों से हालात ऐसे बने हुए हैं कि थोड़ी देर के लिए भी शिवराज को यदि नजरअंदाज कर दिया जाए तो यहां भाजपा शून्य नजर आने लगती है.

इसके पीछे चौहान के बीते आठ साल का कामकाज और उससे ज्यादा अपने कामकाज को जनता के सामने लाने के तरीके रहे हैं. इस दौरान मुख्यमंत्री ने ‘शिवराज’ को एक ‘ब्रांड’ बनाया और मप्र में होने वाले हर विकास कार्य का श्रेय केवल अपनी झोली में डालते हुए खुद को विकास पुरुष के तौर पर प्रचारित किया. इससे मप्र की राजनीति में चौहान का कद इतना ऊंचा होता गया कि भाजपा के बाकी नेता उनके सामने बौने दिखाई देने लगे. वरिष्ठ पत्रकार विनय दीक्षित के मुताबिक, ‘सरकार में रहते हुए शिवराज ने जिस आत्मकेंद्रित तरीके से अपने ब्रांड का प्रचार किया उससे उन्होंने प्रदेश में खुद को भाजपा का पर्याय बना लिया है.’

चौहान के विकास कार्यों को यदि बारीकी से देखें तो उन्होंने व्यक्तिगत लाभ से जुड़ी योजनाओं के जरिए अपनी व्यक्तिगत छवि बनाई है. उदाहरण के लिए, तीर्थ दर्शन योजना है तो बुजुर्गों के लिए लेकिन उसके मार्फत उन्होंने बुर्जुगों के परिवारों तक पैठ बना ली. इन्हीं योजनाओं के जरिए वे अपने लिए समाज में मामा, भाई, बेटा और साथी जैसे रिश्ते भी गढ़ते चले गए.

चौहान की एक पहचान ऐसे मुख्यमंत्री की भी है जिन्होंने सूबे के हर वर्ग पर लक्ष्य साधते हुए राजनीति की है. दीक्षित बताते हैं, ‘मुख्यमंत्री आवास पर चौहान ने विभिन्न वर्गों की जिन पंचायतों का आयोजन किया उससे उनका हर वर्ग तक सीधा जुड़ाव ही नहीं हुआ, अच्छी पकड़ भी बनी है.’ वहीं चौहान ने अपने कार्यकाल में लोगों को जनता दरबार में कभी नहीं बुलाया. इसके स्थान पर लोगों तक सीधे पहुंचने के लिए उन्होंने मप्र के कोने-कोने तक दौरे किए. शिवराज भाजपा की मजबूरी भी हैं. कहा जाता है कि पार्टी की आंतरिक सर्वेक्षण रिपोर्ट से यह तस्वीर साफ हुई है कि मुख्यमंत्री तो सूबे के लोकप्रिय नेता हैं लेकिन उनके मंत्रियों की बदनामी पार्टी के लिए बड़ा खतरा बन गई है. यही वजह है कि पार्टी अब अपने मंत्रियों के खिलाफ भड़की नाराजगी को शांत करने के लिए शिवराज की लोकप्रियता भुनाना चाहती है.

चौहान को भी अपने मंत्रिमंडल के कुछ सहयोगियों और कई विधायकों की कारगुजारियों के चलते बने सत्ता विरोधी रुख का अंदाजा है. उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए जुलाई से अक्टूबर तक तकरीबन 7 हजार किलोमीटर यात्रा की है. इस दौरान उन्होंने 185 विधानसभा क्षेत्रों में करीब साढ़े पांच सौ सभाओं को संबोधित भी किया. इस पूरी प्रचार यात्रा का सबसे दिलचस्प पक्ष  है कि इसमें उन्होंने अपने मंत्रियों से दूरी बनाए रखी. दरअसल वे जानते हैं कि भाजपा का पूरा चुनाव अभियान उनकी साख पर लड़ा जा रहा है. उन्हें डर है कि यदि मंत्रियों को अपने साथ रखा तो सत्ता विरोधी रुख बढ़ न जाए. यात्रा के दौरान चौहान ने अपने मंत्रियों के खिलाफ भड़की नाराजगी से ध्यान हटाने की भी कोशिशें की हैं. इसके लिए उन्होंने यात्रा के हर पड़ाव में जहां मौका मिला वहीं कहा, ‘केवल मुझे देखो..कमल देखो…और वोट दे दो.’

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