शिरोमणि अकाली दल से अलग हुए गुट ने बनाया राजनीतिक दल

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जो नहीं होना था वह हो गया। ‘तहलका’ (अंक 1-15 दिसंबर) के अंक की अवारण कथा थी- सौ वें साल की ओर शिरोमणि अकाली दल: संकट और चुनौतियां। इसमें यह भी अंदेशा जताया गया था कि क्या देश के सबसे पुराने क्षेत्रीय दल में विभाजन हो सकता है। अकाली दल का ही नाम बाद में शिरोमणि अकाली दल हो गया था। इस पार्टी की नींव पड़ी थी 14 दिसंबर 1920 को। अब इसका दो फाड़ होना तय है।

नए राजनीतिक दल की घोषणा शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के रंजीत सिंह ब्रहमपुरा, सेवा सिंह सेखवां और डा. रतन सिंह अजनाला ने की। इसके बाद तो पूरे राज्य में राजनीतिक उठापटक तेज हो गई है। इससे शिरोमणि अकाली दल को भी खासा झटका लगा है।

बादल परिवार इस विभाजन से खासा सकते में है। इस परिवार में प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल, हरसिमरत कौर बादल, बिक्रम सिंह मजीठिया और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता हैं। इन्होंने स्वर्ण मंदिर में अपनी गलतियों पर ‘सेवा’ भी शुरू कर दी है। इन लोगों पर पंजाब में दस साल के अपने राज में ढेरों अपराध करने के आरोप हैं। बादल का ‘सेवा’ करते हुए वीडियो तब जारी हुआ जब पांचों राज्यों से चुनावी नतीजे आ गए और उन पर बहस हो रही है। इन नतीजों को 2019 के आम चुनाव के पहले की सुगबुगाहट कह सकते हैं। इन पर आरोप है कि उन्होंने गुरू गं्रथ साहिब को ‘अपवित्र’ किया। उसके अपराधियों को पनाह दी और सिखों के प्रमुख गुरू पर दबाव डालकर डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को क्षमा दान दिया। सोशल मीडिया में जो फोटो प्रकाश सिंह बादल की जारी हुई है उनमें बादल परिवार को ‘स्पोट्र्स शूज’ साफ करते दिखाया गया है।

विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक -‘ड्रामा’ बताया है। राजनीतिक विरोधियों ने कहा है कि माफी सिर्फ गलतियों पर दी जा सकती है। उन पर पापों की नहीं जो बादल परिवार ने किए। खडूर साहिब से सांसद रंजीत सिंह ब्रहमपुरा ने नई पार्टी की घोषणा की है। उनके साथ दो और टकसाली नेता सेवा सिंह सेखवां और रतन सिंह अजनाला निकाले गए। उन्होंने शिरोमणि अकाली दल से निकाले जाने के एक महीने से भी कम समय में नए राजनीतिक दल की घोषणा की।

इन तीनों ने 14 दिसंबर को नई पार्टी की घोषणा भी की। यही दिन शिरोमणि अकाली दल का स्थापना दिवस भी है। ब्रहमपुरा ने कहा कि नई ‘समानांतर पार्टी’ अकाली दल की स्थापना सन 1920 में अकाली दल की ‘मौलिक विचारधारा’ के तहत हो रही है। जो वर्तमान हालात और परिस्थितियों के अनुकूल भी है। उन्होंने कहा कि नई पार्टी के नाम में भी शिरोमणि आकाली दल रहेगा। उन्होंने बताया कि ढेरों लोग इस पार्टी मेें आने के लिए बेताब हैं। वे उनसे संपर्क कर रहे हैं। हमें ऐसे लोगों की भी ज़रूरत है जो हमारी विचारधारा से सहमत हो भले ही वे अकाली पार्टियों से बाहर के हो। बैंस भाइयों और आप नेता सुखपाल सिंह खैरा भी पुराने अकाली नेता हैं और हमारे नज़रिए से पूरी तौर पर वाकिफ हैं। सेखवां और डा. अजनाला ने माना कि उन्होंने एक ‘उचित मंच ‘ पर सही समय पर आवाज न उठा कर गलत किया था। हम हाथ जोड़ कर पूरे पंजाबी समुदाय से माफी मांगते हैं कि हालांकि हमने बादल।ठिया की पंथ विरोधी नीतियों का विरोध पार्टी में किया लेकिन हमें अपनी शिकायतें जनता की अदालत में भी रखनी थीं।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को दोषी पाते हुए और बरगरी और बेहबल कलां में हुई अपवित्रता की घटनाओं पर माफी देना अनुचित था। इन नेताओं ने कहा कि शिरोमणि अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल और उनके साले बिक्रम सिंह मजीठिया पर शिरोमणि अकाली दल को भारी नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाते हुए ब्रहमपुरा ने कहा कि इन लोगों ने शिरोमणि अकाली दल की असल तस्वीर चैपट कर दी और इसमें अपना वंशवाद शुरू कर दिया। इसी कारण ये आज विधानसभा में सिर्फ 15 सीटों पर सिमट गए।

इन हालात में एक समांनातर पार्टी गठन करने का बीड़ा उठाना पड़ा जो अकाली दल के 1920 के संविधान के तहत हो। वरिष्ठ नेताओं में ब्रहमपुरा के पुत्र रविंद्र सिंह ब्रहमपुरा, और अजनाला के पुत्र अमरपाल सिंह अजनाला को पार्टी से 11नवंबर को निकाल दिया गया था। एक नया मोर्चा बनाने का फैसला ब्रहमपुरा के अमृतसर मकान में हुई एक बैठक में लिया गया। अपने एक संयुक्त बयान में खडूर साहिब सांसद ब्रहमपुरा, पूर्वमंत्री सेखवां, अजनाला के पुत्र बौनी और पूर्व विधायक मनमोहन सिंह साठियाला ने कहा, ‘पंजाब और विदेशों में रह रहे पंजाब के सिखों की मांग पर हमने 14 दिसंबर को नए शिरोमणि अकाली दल के गठन की घोषणा की। यह उसी दिन गठित भी किया गया जब पहली बार दल 1920 में बना भी था। सेखवां, ब्रहमपुरा अजनाला और कुछ दूसरे टकसाली नेताओं (पुराने नेताओं में) ने पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया पर आरोप लगाया कि वे पंथिक एजेंडा से भटक गए और उन्होंने शिरोमणि अकाली दल का काफी नुकसान किया।

इन वरिष्ठ नेताओं में संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में पहली अक्तूबर को ‘खराब हालात’ का हवाला दिया और पार्टी की सात अक्तूबर की पटियाला रैली का बायकॉट किया। ब्रहमपुरा ने पार्टी के तमाम पदों से त्यागपत्र दे दिया और सेखवां ने तीन नवंबर को पद त्याग किए। चार नवंबर को ब्रहमपुरा ने तरनतारन के ऐतिहासिक चोहला साहिब गांव में अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। उन्होंने सुखबीर अैर मीजिठया को डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बेअदबी के मामले से आज़ाद करने का आरोप लगाया। कोटकपुरा और बेहबज कलां में हुई पुलिस फायरिंग और बरगरी में ‘अपवित्रता ‘ की घटनाओं के लिए दोषी ठहराया।

‘नई पार्टी बनाने के पीछे जो सोच है वह यह है कि शिरोमणि अकाली दल को सुखबीर और मजीठिया के पंजों से मुक्त कराया जाए। सेखवां ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि नई पार्टी चुनाव में भाग लेगी। यह शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव लड़ेगी। उन्होंन दावा किया कि राज्यसभा सांसद सुखदेव ढींढसा से भी उनका संपर्क है। ढीढंसा ने स्वास्थ्य के बहाने पार्टी की सभी पदों से 29 सितंबर को अपना इस्तीफा दे दिया था।

करतारपुर कॉरिडोर के बारे में बात करते हुए ब्रहमपुरा ने कहा कि इस परियोजना के लिए पूरा क्रेडिट नवजोत सिंह सिद्धू को जाना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान उनके अच्छे दोस्त हैं और उन्होंने सिद्धू की इच्छा का सम्मान रखा। यह सिखों की अर्से से चल रही मांग थी। दोनों देशों की सरकारों ने गुरु नानक के जन्म की 550वी जंयती के मौके पर कॉरिडोर खोलने की बात कही है। इसका पूरा क्रेडिट सिद्धू को जाना चाहिए। वे सारे विरोधी मसलन ताकतवर गुरचरण सिंह टोहड़ा भी इस मुद्दे पर एक किनारे रह गए। टोहड़ा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के 27 साल तक अध्यक्ष रहे। वे बीसवीं सदी के सिख नेताओं में सबसे ज़्यादा प्रभावशाली नेता थे।

अब ताकतवर नेताओं की त्रिवेणी और शिरोमणि अकाली दल का क्या होता है यह तो समय ही बताएगा लेकिन शिरोमणि अकाली दल के राजनीतिक नेतृत्व ने चुनौती को गंभीरता से लिया है ऐसा लगता है। स्वर्ण मंदिर में ‘सेवा’ करने और जानबूझ कर या अनजाने में किए गए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करना यह बताता है कि बादल ने चुनौती से मुकाबला करने का निश्चय किया है।