शक्ति, पर कोई शक्ति नहीं नौकरशाहों के पास

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अनुचित क्या है अगर नौकरशाह आज के भारत की वास्तविक सच्चाई को इंगित करता है। आखिरकार वे जमीनी सतह पर आधारित समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

हर कोई हैरान है कि नौकरशाह सेवानिवृत होने के बाद ही क्यों अपने संस्मरण लिखने की हिम्मत जुटा पाते हैं? क्योंकि नौकरी के दौरान निर्धारित मापदंडों से बाहर बोलने या लिखने का उन्हें हक नहीं होता। बाद में उन पर कोई बंदिश नहीं होती है फिर भी कुछ ही हैं जो रिटायर होने के बाद भी स्पष्ट रूप से लिख पाते हैं। शायद उनके प्रशिक्षण की अवधि और कार्यकाल के दौरान जिम्मेदारी से बचने की उनकी प्रवृति उन्हें सुरक्षित क्षेत्र में सीमित कर देती है। यहां राजनीतिक मालिक का डर कम होता है।

देखिए किस तरह प्रशासन ने देश में होने वाली बलात्कार की घटनाओं पर जम्मू-कश्मीर कैडर के नौकरशाह शाह फैजल के ट्वीट पर प्रतिक्रिया की है। ट्वीट में कहा गया,” पितृसत्ता + जनसंख्या + निरक्षता + शराब + अश्लीलता + टक्नोलोजी + राजकता = रेपिस्तान!

केंद्र इस पर सिर्फ क्रोधित ही नहीं हुआ बल्कि उसने 2011 बैच के इस टॉपर नौकरशाह के खिलाफ कार्रवाई का आदेश भी दिया है। वास्तव में 35 वर्षीय शाह फैजल जम्मू-कश्मीर के एकमात्र आईएएस अधिकारी हंै, जिन्होंनेे सिविल सेवाओं में टॉप किया है और वर्तमान में अध्ययन छुट्टी पर एडवर्ड एस मेसन फैलोशिप पर हार्वड कनैडी स्कूल में हैं।

मुझे बताइए, इस ट्वीट में क्या गलत है। शायद वास्तविकता को बताने के लिए कुछ अतिरिक्त शब्द जैसे – लिंचिस्तान, जंगल राज और हत्यारे शासक जोडऩे चाहिए थे।

 इसके साथ ही क्या एक नौकरशाह वास्तविक सच्चाई को बताने का मूल अधिकार नहीं रखता? वह केवल धूल भरी फाइलों का नहीं बल्कि जनता का प्रशासक होता है। बेशक आज के शासन में नौकरशाह का काम राजनीतिक शासकों की सेवा करना होता है न कि सामान्य जनता का काम करना जिन्हें सुरक्षा के नाम पर दूर रखा जाता है।

अगर एक नौकरशाह जोर से बोलने या स्पष्ट रूप से लिखने की हिम्मत करता है तो वह अकेला हो जाता है उसे सस्पैंड कर दिया जाता है।

तमिलनाडु कैडर के चतुर्वेदी बद्रीनाथ प्रशासन द्वारा प्रताडि़त किए गए पहले नौकरशाह थे। यह 70 के दशक के प्रारंभ का समय था जब सरकारी उद्यम- ‘टाइम कैप्सूलÓ की पृष्ठभूमि में विवाद उभरा था, और इस नौकरशाह ने उस कैप्सूल में जोड़ी गई ऐतिहासिक सामग्रियों के संदर्भ में कई प्रश्न उठाए थे। यह बताना आवश्यक नहीं कि इससे इस नौकरशाह का करियर गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था। परन्तु उसका मनोबल और आत्मविश्वास नहीं।

मेरे साथ कई साक्षात्कारों के दौरान उन्होंने विस्तार से बताया था कि निलंबित होने और पूछताछ के बाद भी वह अपनी बात पर दृढ़ बने रहे और फिर ‘धर्मÓ पर लिखने लगे।

बेशक बाद में उन्होंने समय से पहले सेवानिवृति ले ली और अकादमिक दुनिया, बाबूगिरि से दूर हो गए पर 2010 में पुडुचेरी में अपनी मृत्यु से पहले तक उन्होंने किताबें लिखी।

आज के भारत में यही मिश्रित स्थिति है। सरकार का आदेश आने से पहले दक्षिण पंथी ताकतें अपना कृत्य कर जाती है।

यहां तक की नौकरशाहों की राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी सार्वजनिक कार्यक्षेत्र से दूर रखा जाना चाहिए। क्या 2016 में हमने मध्यप्रदेश के नौकरशाह अजय गंगवार की दुर्दशा नहीं देखी जिन्हें फेसबुक पर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्रशंसा करने के बाद तबादले का आदेश सौंपा गया था। तब मध्यप्रदेश के बरवानी जिले के कलेक्टर गंगवार को अपनी एक पोस्ट को भी हटाना पड़ा जिसमें कि अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा की आलोचना प्रतीत होती थी।

इस साल के शुरू में बरेली के जि़ला मेजिस्ट्रेट राघवेंद्र विक्रम सिंह पर भी सेवा नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था, जब उन्होंने फेसबुक पर उत्तरप्रदेश के कुछ जि़लों में हिंसा उकसाने का आरोप दक्षिणपंथी ताकतों पर लगाया था।

कासगंज में सांप्रदायिक दंगे भड़कने के तुरंत बाद सिंह ने फेसबुक पर लिखा, ‘अजब रिवाज बन गया है। मुस्लिम मुहल्लों में जलूस ले जाओ और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाओं। क्यों भाई वो पाकिस्तानी हैं क्याÓ?

दरअसल पिछले साल भी सिंह ने इस तरह की एक पोस्ट लिखी थी। जहां उन्होंने इस तथ्य की आलोचना की थी – बरेली के खेहम इलाके में कावडिय़ों का समूह मुस्लिम प्रभुत्व वाले गांव से उत्तेजक नारे लगाते गुजर रहा था। लेकिन इस बहादुर , ईमानदार नौकरशाह को जिसने यह बताने की हिम्मत की उसे फेसबुक पोस्ट को हटाने के लिए मज़बूर किया गया।

कासगंज में दंगों के दौरान वहां नियुक्त कम से कम दो अधिकारियों ने टेलीविजन पर सुना और देखा कि कासगंज के मुस्लिम प्रभुत्व वाले क्षेत्र के कई युवा राष्ट्रीय ध्वज फहराने की तैयारी कर रहे थे, बाइक पर सवार आदमियों ने जो कि वीएचपी और हिन्दुत्व बिग्रेड से संबंधित थे उन्होंने न केवल ध्वज फहराने के सामारोह में बाधा डाली बल्कि उत्तेजक नारे भी लगाए।

 इस तथ्य को नजऱअंदाज नहीं किया जा सकता कि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कासगंज में सापं्रदायिक दंगों के बाद जि़ला पुलिस प्रमुख सुनील कुमार का तबादला कर दिया क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक पागलपन की गहरी सच्चाइयों को उजागर किया था।

यह निश्चित नहीं है कि कासगंज के तत्कालीन जि़ला मेजिस्ट्रेट को क्या दंड मिला था क्योंकि वह भी आज के उत्तरप्रदेश में प्रचलित जमीनी वास्तविकताओं के बारे में ईमानदार थे। उन्होंने एक समाचार रिपोर्ट से बताया – ‘राज्य के हर हिस्से में ऐसे समूह हैं जो अल्पसंख्यक समुदाय के इलाके में बलपूर्वक प्रवेश करके राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें भड़काते हैं।

मुझे बताइए कि इसमे क्या गलत है अगर कोई नौकरशाह वास्तविक सच्चाई को बताता है और उसके बारे में बोलता या लिखता है। आखिरकार वह ज़मीनी वास्वविकताओं पर केंद्रित है।