विश्वशक्ति के देसी खिवैया | Tehelka Hindi

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विश्वशक्ति के देसी खिवैया

माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया सत्या नाडेला अमेरिका में भारतीयों की अभूतपूर्व सफलता का सबसे नया उदाहरण हैं. आखिर कौन से कारण हैं जिनके चलते वहां का भारतीय समुदाय बाकी अमेरिकियों के लिए नया आदर्श बन गया है?
विकास बहुगुणा 2014-02-28 , Issue 4 Volume 6
सितारे (बाएं से) बॉबी जजंदल, सबीर भाजिया, नीना दावुलूरी, एस जिचाई, इंद्रा नूयी और (बीच में) सत्या नाडेला

सितारे (बाएं से) बॉबी जजंदल, सबीर भाजिया, नीना  दावुलूरी, एस जिचाई, इंद्रा नूयी और (बीच में) सत्या नाडेला. कॉलाजः मनीषा यादव

कोई भारतीय सबसे पहले अमेरिका कब पहुंचा, इस सवाल का जवाब दो सदी से भी लंबी दूरी तय करता हुआ हमें 1790 तक पहुंचाता है. इसी साल अमेरिका के पूर्वी प्रांत मैसाच्यूसेट्स के तटीय कस्बे सेलेम में एक भारतीय दिखाई दिया था. यह जानकारी नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक एस चंद्रशेखर द्वारा संपादित और 1982 में प्रकाशित किताब फ्रॉम इंडिया टू अमेरिका में मिलती है–इस संभावना के साथ कि भारतीय उपमहाद्वीप का वह यात्री किसी मालवाहक जहाज के साथ वहां पहुंचा होगा. सूचना के महासागर गूगल सर्च पर काफी वक्त बिताने के बाद भी उससे जुड़ी और कोई जानकारी नहीं मिलती.

लेकिन इसी गूगल सर्च पर सत्या नाडेला टाइप करें तो पल भर में ही जानकारी का महाद्वीप उभर आता है. सर्च इंजन तुरंत ही बताता है कि उसके पास इस नाम से जुड़े करीब 17 करोड़ खोज परिणाम हैं. भारत में पले-बढ़े नाडेला ने हाल ही में आईटी जगत की सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट की कमान संभाली है. संयोग देखिए कि महीना भर पहले तक जब माइक्रोसॉफ्ट के अगले मुखिया के बारे में कयास लग रहे थे तो एक और भारतीय सुंदर पिचाई की भी बड़ी चर्चा हो रही थी. पिचाई उसी गूगल के शीर्ष प्रबंधन में शामिल हैं जिसका सर्च इंजन नाडेला से जुड़े 17 करोड़ खोज परिणाम देता है.

करीब दो सदियों के सिरे पर खड़े ये उदाहरण दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका में भारतीयों की यात्रा के ओर- छोर भी बनाते हैं. इनमें से एक छोर का रिश्ता महत्वहीनता और गुमनामी से जुड़ता है तो दूसरे का अहमियत और प्रसिद्धि  से. नाडेला अमेरिका जा बसे भारतीयों की सफलता के सिलसिले की सबसे नई और बड़ी कड़ी हैं. इस सूची में एडोबी के सीईओ शांतनु नारायण, पेप्सी की कमान थाम रहीं इंद्रा नूयी, मास्टरकार्ड के मुखिया अजय बंगा, लुजियाना के गवर्नर पीयूष बाबी जिंदल और 2014 की मिस अमेरिका नीना दावुलूरी जैसे कई नाम मिलते हैं.

2010 की अमेरिकी जनगणना बताती है कि अमेरिका की करीब 30 करोड़ की आबादी में लगभग चार करोड़ अप्रवासी हैं. उनमें से करीब 28 लाख भारतीय मूल के हैं. यह संख्या कुल आबादी के एक फीसदी से भी कम है. लेकिन यह तथ्य तब चौंकाने लगता है जब पता चलता है कि इस छोटी-सी आबादी की उपलब्धियां इससे कई गुना ज्यादा हैं. चर्चित पत्रिका फोर्ब्स के एक हालिया लेख में जोसेफ रिशवाइन लिखते हैं कि आबादी का एक फीसदी से भी कम होने के बावजूद भारतीय अमेरिका के कुल इंजीनियरों का तीन फीसदी हैं. सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का वे सात फीसदी हैं तो डॉक्टरों का आठ फीसदी. यानी औसत अमेरिकी की बात करें तो उसके लिए किसी सड़क से गुजरता कोई आदमी भारतीय है इससे आठ गुना ज्यादा संभावना इस बात की है कि उसका डॉक्टर भारतीय हो.’

लेकिन जैसा कि हर सुखांत कथा में होता है, महत्वहीन से महत्वपूर्ण होने तक के इस सफर में भी मुश्किलों और संघर्ष के कई मोड़ हैं. और कुछ अहम सबक भी.

1790 के बाद अमेरिका में भारतीयों का जिक्र 1851 की एक घटना में मिलता है. उस साल चार जुलाई यानी अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सेलेम में हुई परेड में छह भारतीयों ने भी हिस्सा लिया था. छोटी-छोटी बूंदों के रूप में वे आते गए और 19वीं सदी खत्म होते-होते अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक अमेरिका में करीब 2000 भारतीय बस चुके थे. मुख्य रूप से कैलीफोर्निया जैसे पश्चिमी हिस्सों में रहने वाले इन लोगों में से ज्यादातर पंजाब से आए सिख थे और उन्हें खेती, कारखानों और रेल या सड़क से जुड़े निर्माण कार्यों में रोजगार मिला हुआ था. 20 वीं सदी के शुरुआती दशक में भारतीयों की यह संख्या और भी तेजी से बढ़ी. 1901 से लेकर 1911 तक के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि तब तक अमेरिका में कानूनी रूप से 6,250 भारतीयों को प्रवेश मिल चुका था. लेकिन गैरकानूनी रूप से रहने वाले भारतीयों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी. दरअसल अमेरिका के ही पड़ोस में स्थित कनाडा ब्रिटिश उपनिवेश था. वहां जाने के लिए भारतीयों को वीजा की जरूरत नहीं होती थी क्योंकि भारत भी तब तक ब्रिटिश अधिकार में ही था. कनाडा आने के बाद अमेरिका में घुस जाना आसान था. इसलिए अमेरिका में भारतीयों की वास्तविक संख्या उनकी आधिकारिक संख्या से कहीं ज्यादा हो गई थी.

imgयहीं से मुश्किल शुरू हुई. भारतीय ही नहीं बल्कि एशिया के दूसरे देशों जैसे चीन, कोरिया और जापान से भी बड़ी संख्या में लोग अमेरिका आने लगे थे. अपने काम में कुशल ये एशियाई ही अपनी-अपनी जड़ें छोड़कर सात समुंदर पार आए थे–सिर्फ इसलिए कि उनमें नए अवसर खोजने और उन्हें भुनाकर सफल होने की भूख थी. स्वाभाविक ही था कि वे कम पैसे में ज्यादा काम करने के लिए तैयार रहते थे. इसलिए काम देने वालों में उनकी पूछ भी बढ़ रही थी. यही वजह थी कि स्थानीय श्वेत समाज में धीरे-धीरे इनके खिलाफ असंतोष पनपने लगा. सामाजिक दबाव बढ़ा तो 1882 में आए चाइनीज एक्सक्लूजन एक्ट के साथ ऐसे कानूनों और अदालती फैसलों की शुरुआत हुई जो भारत सहित तमाम एशियाई देशों के लोगों को या तो अमेरिका आने से रोकते थे या पहले से वहां रह रहे लोगों को नागरिकता सहित दूसरे मूलभूत अधिकारों से वंचित करते थे.

एक तरफ कानून का कहर था तो दूसरी तरफ स्थानीय समाज की नफरत. अपने एक लेख में न्यूयॉर्क स्थित संगठन ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन फॉर पीपुल ऑफ इंडियन ओरिजिन के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह लिखते हैं, ‘शुरुआती भारतीयों में से ज्यादातर सिख थे. उनके सिर की पगड़ी की वजह से उन्हें अपमानजनक लहजे में रैगहेड्स कहा जाता था. उसी दौर में अमेरिका में एक एशियाटिक एक्सक्लूजन लीग भी हुआ करती थी जो अमेरिका में हिंदुओं (तब भारतीय उपमहाद्वीप के सभी लोगों को हिंदू कहकर ही पुकारा जाता था) के खिलाफ दुष्प्रचार करती थी और मीडिया पर उनके खिलाफ लिखने का दबाव बनाती थी. 1907 में वाशिंगटन के बेलिंघम कस्बे में हुई एक घटना में करीब 500 लोगों की भीड़ ने वहां के बोर्डिंग हाउसों और कारखानों में घुसकर करीब 300 भारतीयों को नौकरी और कस्बा छोड़ने पर मजबूर कर दिया. पुलिस की भी उनके सामने एक न चली.’

फिर भी ये भारतीय अपने हक के लिए लड़ते रहे, सरकार पर नागरिकता के लिए दबाव बनाते रहे. लेकिन यह तभी संभव हो सकता था जब संसद में इसके लिए कानून लाया जाता. 1946 में यह संभव हुआ. राष्ट्रपति हैरी एस ट्रुमन ने इसमें दिलचस्पी दिखाई और संसद ने ल्यूस-सैलर नामक बिल पर मुहर लगा दी. इसके बाद अमेरिका में रह रहे इन भारतीयों को नागरिकता का हक तो मिला ही, उन्हें कुछ और भी फायदे हुए. जैसे अब वे भारत जाकर अपनी पत्नी और बच्चों को अमेरिका ला सकते थे. हर साल 100 लोग भारत से कानूनी रूप से अमेरिका आकर नागरिकता भी पा सकते थे. यह भारतीय अमेरिकियों की पहली विजय थी. इससे कुछ रास्ते खुले. इसके लिए दबाव बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले दिलीप सिंह सौंद 1957 में एक डेमोक्रेट के रूप में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के पहले भारतीय सदस्य बने.

इसके बाद 1965 में बना इमिग्रेशन एेंड नेशनैलिटी एक्ट तो जैसे भारतीयों के लिए अवसरों की बाढ़ लेकर आया. इसके मुताबिक अमेरिका आने और नागरिकता प्राप्त करने के लिए हर देश का 20000 सालाना कोटा तय कर दिया गया. वैसे यह कानून बनाना उसकी मजबूरी बन गई थी. दरअसल वह अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलनों का दौर था. वहां और दुनिया भर में सवाल किए जा रहे थे कि फ्रीडम और लिबर्टी फॉर ऑल की बात करने वाले देश की सोच इतनी संकरी क्यों है कि वह अपने यहां रहने वाली एक बड़ी अश्वेत आबादी को उसका जायज हक नहीं दे रहा. अपने लेख में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया में इतिहास के अध्यापक विनय लाल लिखते हैं, ’1965 से अमेरिका में भारतीयों के समकालीन इतिहास का सबसे नया दौर शुरू होता है.’ ये लोग शिक्षित थे, कुशल थे और अपनी योग्यता का अधिकतम इस्तेमाल करना चाहते थे. वे अमेरिका में भारतीय आबादी की दूसरी लहर जैसे थे. उनका लक्ष्य भी वही था जो उनसे पहले वाली पीढ़ी का था. यानी सफल होना. लेकिन वे इस मायने में अलग थे कि उनके पास नए ज्ञान की शक्ति थी. आइआइटी सहित दूसरे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकली ये प्रतिभाएं अपने देश में उचित अवसरों की कमी और लालफीताशाही से त्रस्त होकर अमेरिका पहुंची थीं.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 4, Dated 28 February 2014)

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