विरोधियों की फाइल

विपक्षियों और विरोधियों पर कार्रवाई के लिए तैयार हो चुकी हैं फाइल्स

जब सत्ता हाथ में हो और उसका नशा इस क़दर सवार हो कि सत्ता पक्ष किसी को कुछ न समझे, तो तानाशाही, अकड़ और मनमानी स्वाभाविक रूप से हावी हो जाती हैं। विरोधी सुरों को दबाने की केंद्र सरकार की कोशिश से यही ज़ाहिर होता है। सत्ता में आने के बाद पिछले आठ साल से केंद्र सरकार ने हर तरह के विरोधियों पर, चाहे वो लेखक हों, समाजसेवी हों, पत्रकार हों, नौकरशाह हों, किसान हों या फिर नेता हों, सभी पर खुले रूप से राष्ट्रद्रोह के तहत या दूसरे तरीक़ों से दोषी ठहराकर या फिर गुप्त तरी$के से कार्रवाई की है। लोकतंत्र में कहा गया है कि किसी सरकार को राष्ट्रहित और जनहित वाली सरकार बनाने में मज़बूत विपक्ष की बहुत बड़ी भूमिका होती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई भी इस बात को मानते थे। लेकिन मौज़ूदा केंद्र सरकार ने विपक्ष और विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए न सिर्फ़ संसद सत्रों से प्रश्नकाल को ख़त्म करने की कोशिश की है, बल्कि उन्हें दबाने के लिए हर तरह से क़ानून को अपने हाथ की कठपुतली बनाने की पूरी कोशिश की है।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी किसी भी तरह देश की केंद्र की सत्ता पर हावी रहना चाहती है। इसके लिए इस जोड़ी ने विरोधियों को दबाने के लिए उनके कारनामों की फाइल्स का सहारा लेना शुरू कर दिया है। भाजपा के गोपनीय सूत्र बताते हैं कि तक़रीबन 150 विरोधी नेताओं की फाइलें केंद्र की मुट्ठी में हैं। इनमें विपक्ष के ही नहीं, विरोधी सुर वाले सत्ता पक्ष के लोग भी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी की नेशनल हेराल्ड वाली फाइल तो खुल भी चुकी है। लेकिन जो जानकारी बाहर निकलकर सामने आ रही है, उसके मुताबिक, क़रीब 122 सांसदों और विधायकों की फाइल्स तैयार की जा चुकी हैं, जिन्हें केंद्र सरकार चुनाव के दौरान हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेगी।

दिल्ली नगर निगम के चुनाव टालकर दिल्ली में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर भी कथित तौर पर इसी के तहत कार्रवाई हुई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो यहाँ तक दावा कर चुके हैं कि केंद्र सरकार मनीष सिसोदिया पर भी अवैध और $गैर-क़ानूनी तरी$के से कार्रवाई की तैयारी कर रही है। हिमाचल में आम आदमी पार्टी के लोगों को तोड़ा और जो नहीं टूटे, उन्हें गिर$फ्तार करना इसी साज़िश का हिस्सा है।

नेशनल हेराल्ड मामले में तो ईडी ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को समन भी जारी कर दिये हैं। हालाँकि सोनिया गाँधी बीमार हो गयी हैं। हालाँकि ईडी ने उनकी पेशी में राहत देते हुए तारीख़ बढ़ा दी है। वहीं राहुल गाँधी को 13 जून से बार-बार ईडी ने बुलाया। हर बार उनसे लम्बी पूछताछ हुई। इससे पहले वह सत्याग्रह करने की कोशिश में थे; लेकिन सरकार ने पुलिस घेरेबंदी से उन्हें और उनके समर्थकों को रोक लिया। इस बीच कांग्रेस नेताओं ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन करने की कोशिश भी की।

दरअसल नेशनल हेराल्ड एक न्यूज पेपर रहा है, जिसे साल 1938 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा गाँधी की सहमति से शुरू किया था। इस न्यूज पेपर को शुरू करने का उद्देश्य वही था, जो आज की केंद्र सरकार का है कि मीडिया से जनता तक अपनी बात अपने हिसाब से पहुँचाने के लिए अपना ही कोई न्यूज पेपर होना चाहिए। फ़र्क़ यह है कि उस समय नेशनल हेराल्ड को कांग्रेस ने ख़ुद खोला था; लेकिन आज की केंद्र सरकार भाजपा या अपने किसी नेता के नाम से मीडिया हाउसेस नहीं चला रही, बल्कि पूँजीपतियों या दूसरे लोगों के उन न्यूज चैनल्स और न्यूज पेपर्स को बढ़ावा दे रही है, जो उसके मन की बात करते हैं।

ख़ैर, नेशनल हेराल्ड न्यूज पेपर को चलाने के लिए एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की एक कम्पनी खोली गयी। नेशनल हेराल्ड में क़रीब 5,000 स्वतंत्रता सेनानी स्टेक होल्डर थे और उस समय इस न्यूज पेपर को अंग्रेजी में शुरू किया गया। इसके बाद नवजीवन न्यूज पेपर हिन्दी में और क़ौमी आवाज़ न्यूज पेपर उर्दू में निकलने शुरू हुए। शुरुआत से इस कम्पनी में कांग्रेस और गाँधी परिवार के लोग ही रहे। लेकिन यह कम्पनी 2008 में घाटे की वजह से सभी न्यूज पेपर्स को बन्द कर दिया गया। क्योंकि उस समय इस कम्पनी पर क़रीब 90 करोड़ रुपये का क़र्ज़ हो गया। इसके अलावा इसके स्टेक होल्डर भी घटकर बहुत कम रह गये थे। यह क़र्ज़ कैसे हुआ, यह जाँच का विषय है, जिस पर कांग्रेस ने कभी ग़ौर नहीं किया। अब सवाल यह उठा कि इस क़र्ज़ को निपटाया कैसे जाए? इसके लिए कांग्रेस ने एसोसिएट्स जर्नल्स लिमिटेड को पार्टी फंड से बिना ब्याज के 90 करोड़ रुपये का क़र्ज़ दिया, जिसके चलते यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड को एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड में 99 फ़ीसदी की हिस्सेदारी मिल गयी। यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना कांग्रेस की मनमोहन सिंह सत्ता के दौरान 23 नवंबर 2010 को की गयी, जिसमें सबसे पहले दो लोग- सुमन दुबे और सैम पित्रोदा, जिनका पूरा नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा है; शामिल हुए। 13 दिसंबर, 2010 को इसमें राहुल गाँधी को शामिल किया गया और 22 जनवरी, 2011 को इस कम्पनी में सोनिया गाँधी, मोती लाल बोहरा और ऑस्कर फर्नांडीज के नाम और शामिल किये गये। इस कम्पनी में सोनिया और राहुल गाँधी की 38-38 (कुल 76) फ़ीसदी की हिस्सेदारी है, जबकि बाक़ी की 24 फ़ीसदी हिस्सेदारी पहले मोतीलाल बोहरा और ऑस्कर फर्नांडिस के पास थी, अब उसमें मोती लाल बोहरा की जगह शायद दूसरे नाम हैं। क्योंकि साल 1997 में मोती लाल बोहरा की मृत्यु हो गयी थी, जिसके बाद उनकी जगह 2021 में पवन कुमार बंसल का नाम जोड़ा गया था। नेशनल हेराल्ड मामले में पवन कुमार बंसल को भी पूछताछ की जा चुकी है।