विपदा और विडंबना

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फोटो: विजय पांडे
फोटो: विजय पांडे

किसी भी नेतृत्व की असली परीक्षा संकट में होती है. इस लिहाज से देखा जाए तो हाल की आपदा के दौरान जो हुआ उसने उत्तराखंड सरकार की पोल खोल दी है. सरकार का कहना है कि उसे ऐसी आपदाओं से निपटने का कोई अनुभव नहीं है. लेकिन सच यह है कि जो गंभीरता और इच्छाशक्ति उस अनुभव के लिए जरूरी है वही इस त्रासदी के दौरान उसके व्यवहार में गायब दिखी. ऐसी आपदा के लिए अलग और बड़ी व्यवस्था तो दूसरी बात है, राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को यही पता नहीं कि जो संसाधन उसके पास उपलब्ध हैं उनका ही इस्तेमाल ऐसे संकट में अच्छी तरह से कैसे किया जाए.

सरकार भले ही तर्क दे कि यह तो अचानक आई आफत थी, पर सच यह है कि यह आपदा न तो दबे पांव आई थी और न ही उत्तराखंड ने ऐसी आपदा पहली बार देखी है. यहां बादल फटने और भूस्खलन का इतिहास रहा है. फिर मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी के संकेत दे दिए थे. प्रकृति ने भी कई इशारे करते हुए धीरे-धीरे ही विकराल रूप धारण किया था. पर न तो समय रहते चेता गया और न ही आपदा के शुरुआती दिनों में सरकार ने पर्याप्त गंभीरता दिखाई. नतीजा सबके सामने है.

केदारनाथ की घटना भले ही 16-17 जून को हुई हो लेकिन 13 जून से ही पहाड़ों में भारी बारिश से हजारों यात्रियों का जगह-जगह फंसना शुरू हो गया था. समय से 15 दिन पहले उत्तराखंड पहुंच गए मानसून की मोटी बौछारों ने माहौल में चिंता घोल दी थी. 15 जून को मौसम विभाग ने फिर अगले 48 से लेकर 72 घंटों तक भारी वर्षा की भविष्यवाणी कर दी थी. ऐसा ही हुआ भी. 15 जून की शाम तक ही नदियां उफान पर आ गई थीं और रुद्रप्रयाग जिले में फाटा, रामपुर, सीतापुर आदि जगहों पर टूट-फूट और जनहानि की घटनाएं दर्ज होने लगी थीं.

लेकिन आपदा के सारे संकेतों के बावजूद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 16 जून को दिल्ली के लिए रवाना हो गए. उसी दिन दोपहर बाद उत्तरकाशी में भागीरथी के उफनते पानी ने नदी किनारे बने चार-चार मंजिला घरों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया. 16 जून की ही रात साढ़े आठ बजे भारी बारिश के बाद आए पानी के सैलाब ने केदारनाथ के एक हिस्से को तो बहाया ही, उससे सात किमी नीचे रामबाड़ा और 14 किमी नीचे गौरीकुंड का बड़ा हिस्सा भी साफ कर दिया. सूत्र बताते हैं कि पानी और मलबे के इस पहले वेग ने ही केदारनाथ से लेकर 20 किमी नीचे घाटी में बसे सीतापुर तक मरने वालों का आंकड़ा तीन अंकों में पहुंचा दिया था. कई पुल और मकान बह गए थे. इन सभी घटनाओं की सूचना जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को थी. रामबाड़ा से रात को अंतिम बार पुलिस वायरलेस से संपर्क हुआ था. यात्रियों ने भी अपने-अपने घरों में इस जलजले की सूचना पहुंचा दी थी. भागीरथी, उसकी सहायक नदियों और मंदाकिनी नदी से हो रहे विनाश की खबरों से स्थानीय लोगों, यात्रियों और उनके परिजनों की बेचैनी बढ़ रही थी. उफनाई अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी और असीगंगा नदियां खतरे के निशानों से कई मीटर ऊपर बह रही थीं. इन सबसे मिलकर बनने वाली गंगा हरिद्वार में खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी. 16 जून तक राज्य में 123 सड़कों के टूटने की सरकारी सूचना थी.

लेकिन इस सबसे निर्लिप्त मुख्यमंत्री बहुगुणा देश की राजधानी दिल्ली में बैठकर प्रदेश का हाल-चाल ले रहे थे. 17 जून को वे देहरादून वापस आए. उस दिन सुबह करीब आठ बजे तक जल प्रलय से केदारनाथ और उसके नीचे के क्षेत्र पूरी तरह से तबाह हो गए थे. लेकिन उस दिन हुई राज्य मत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के सहयोगी मंत्रियों से इस जल प्रलय से हुई तबाही पर कोई चर्चा नहीं की. इससे लगता है कि मुख्यमंत्री इस आपदा से या तो खुद ही निपटना चाहते थे या वे अपने सहयोगियों की राय को महत्वहीन समझते हैं. यही नहीं, प्रत्येक राज्य की सरकार हर दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की आपदा प्रबंधन डिवीजन को उस दिन राज्य में हुई आपदाओं और फौरी नुकसान की सूचना भेजती है. रिकॉर्ड बताते हैं कि 16 और 17 जून को उत्तराखंड सरकार ने राज्य में आपदा से जान-माल की कोई हानि नहीं दिखाई है. राज्य में 17 जून तक केदारनाथ तबाह हो गया था. फिर भी राज्य सरकार क्यों ये सूचनाएं नहीं भेज रही थी या छिपा रही थी, कोई नहीं जानता.

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