विधानसभा चुनावों के नतीजे लोकतंत्र के लिहाज से अच्छी खबर

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एक पार्टी जो लंबे समय से हारते रहने की आदी हो गई हो। अलग-थलग रह गई हो। मौजूदा राजनीतिक हालात में उसके कार्यकर्ता उदास हो चुके हों। इसके अध्यक्ष का उपहास उड़ाया जाता हो। ऐसे में विधानसभा चुनावों के बाद आए नतीजों पर खुशी होनी ही चाहिए। तीनों हिंदी भाषी राज्य जहां इसका सीधा मुकाबला सत्ता में बैठी भाजपा से था कांगे्रस ने बहुत ही बढिय़ा नतीजे हासिल किए।

छत्तीसगढ़ में तो पार्टी अपनी ही उम्मीदों से कहीं आगे थी। वहां यह दो तिहाई बहुमत से जीती। राजस्थान और मध्यप्रदेश में मुकाबले की टक्कर रही। कांग्रेस इन तीनों ही राज्यों में इतने मतों से जीती कि यह सरकार बना सके। इन तीनों राज्यों से आए नतीजों से यह बात तो जाहिर होती है कि भाजपा की चुनावों में जीत पाने की क्षमता काफी कम हो गई है।

इससे कांग्रेस पार्टी के लिए एक आस बंध गई है कि वह 2019 के चुनाव में कुछ असरदार कर पाएगी। यदि 2019 में होने वाले चुनावों के लिहाज से इन नतीजों के अर्थ निकाले जाएं तो यह स्पष्ट है कि इन नतीजों से पार्टी के नेतृत्व और इसके कार्यकर्ताओं को यह भरोसा अब हासिल तो हो गया है कि वे जीत सकते हैं और जीत के सिलसिले को बनाए रख सकते हैं। पर यदि इन चुनावों को 2019 के लोकसभा चुनाव की नज़र से देखें तो कांग्रेस को अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। उसे अपने नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की कमज़ोरियों को भी समझना पड़ेगा। लेकिन इन परिणामाओं ने बेशक इसके नेताओं और कार्यकर्ताओं में जान फूंक दी है। हालांकि मिज़ोरम और तेलंगाना मेें ज़रूर इस जीत पर कुछ रोक लगी। पांचों राज्यों के नतीजों से एक ध्रुवीय राजनीति का ज़रूर समापन हुआ।

भाजपा के लिए ये नतीजे एक  मौका हैं खुद के आकलन का। जब इतनी बड़ी तादाद में आपके नेता चुनाव हार जाएं तो यह साफ लगता है कि कहीं न कहीं कुछ ज्य़ादा ही गड़बड़ है। इन नतीजों से यह संकेत मिलता है उन मतदाताओं की नाराज़गी का जिन्होंने 2014 में भाजपा को वोट दिए। वे किसान, व्यापारी, नौजवान जो नोटबंदी, जीएसटी लागू करने और नौकरियों के अभाव के दुखी हुए। गांधी परिवार पर निजी हमले और पूरे गांधी परिवार को स्तरहीन बताते रहना भी भाजपा के काम नहीं आया। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता आज भी जस की तस है। मोदी 2014 में आशा और उम्मीद के केंद्र थे। उनका पूरा क्रियाकलाप यह बताता है कि उन्हें 2019 के आम चुनाव में कम नहीं आंका जा सकता।

आम चुनावों में अब चार महीने ही बाकी हैं। राजनीति में चार महीनों का समय भी काफी लंबा होता है। सेमीफाइनल तो हो चुका है। और इसके नतीजों से अब काफी कुछ सीखने की ज़रूरत है। एक पार्टी या किसी नेता विशेष को स्मृतिशेष न मानिए भले ही वह पार्टी 133 साल पुरानी क्यों न हो और एक नेता जो उस परिवार का है जिसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए।

राहुल गांधी के नेतृत्व ने कांग्रेस को जीवनदान दिया है। और उनके नेतृत्व से यह जाहिर हुआ है कि वे भाजपा को उसके ही दुर्ग में परास्त कर सकते हैं। फिर भी सभाओं की जीत का कतई यह मतलब नहीं है कि 2019 में जीत हासिल हो ही जाएगी। अब राह और भी दुर्गम है इस खुले मुकाबले में। यदि यह छोड़ भी दें कि इन विधानसभा चुनावों में जीत किसकी हुई तो भी लोकतंत्र के लिहाज से यह एक अच्छी खबर है।