विधानसभा चुनावी नतीजों के आते ही त्रिपुरा में व्यापक हिंसा, माकपा चुनाव से हटी

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त्रिपुरा में भाजपा की अभूतपूर्व जीत के बाद प्रदेश में भारी हिंसा, लेनिन की दो मूर्तियों को तोडऩे और माकपा के दफ्तरों और कार्यकर्ताओं के घरों-दफ्तरों में आगजनी का दौर- दौरा रहा। खुद राज्यपाल ने इन घटनाओं के निहायत सामान्य माना। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने अपनी टीम के साथ हिंसाग्रस्त इलाकोंं का दौरा किया और हालात का जायजा लेने के बाद तय हुई पार्टी बैठक में फैसला किया कि त्रिपुरा चुनावों के पहले ही चारिलाम विधानसभा क्षेत्र के विधायक रामेेंद्र नारायण देव वर्मा के निधन के बाद खाली हुई सीट पर माकपा अपने उम्मीदवार पलाश देव वर्मा को नहीं उतारेगी। भाजपा ने इस सीट पर त्रिपुरा राजपरिवार के सदस्य और नए बने राज्य मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री जिश्नू देव बर्मन को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। माकपा के राज्यसचिव बिजॉन धर ने दस मार्च को ही अपनी पार्टी के उम्मीदवार को चुनाव मैदान में हटाने के फैसले की सूचना मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजी थी। त्रिपुरा वाम मोर्चे की बैठक में इस बात पर चर्चा भी हुई कि पार्टी ने चुनाव आयोग से अनुरोध किया था कि राज्य में हिंसा के हालात हैं। हालात सामान्य होने पर ही चुनाव कराए जाएं। आयोग के राजी न होने पर एकमत हो कर यह फैसला लिया गया। पार्टी ने अपने पत्र में यह जानकारी भी दी कि माकपा और आरएसपी पार्टियों के ग्यारह दफ्तरों केा तोड़ा गया, लूटपाट की गई और उनमें आग लगा दी गई। वाममोर्चे के उन्नीस नेताओं के साथ मारपीट की गई और कई सौ समर्थकों और कार्यकर्ताओं पर दूरदराज के इलाकों में अत्याचार और जुल्म ढाने का सिलसिला अब भी जारी है। राज्य में कानून-व्यवस्था सामान्य अब तक न हो सकी है। इसलिए जहां वामपंथी उम्मीदवार को सुरक्षा में भी प्रचार करने नहीं दिया जा रहा है वहां शांतिपूर्ण मतदान तो संभव ही नहीं है।

त्रिपुरा में हिंसा का दौर-दौरा!

मैं खोवाई, त्रिपुरा की हूं। मेरे चाचा खोवाई उप्र संभाग में माकपा के सदस्य हैं। अब चंूकि हम वामपंथ और वामपंथी पार्टियों के समर्थक हैं तो हमें परेशान किया जा रहा है। मेरे चाचा तो अपने घर के कमरे से बाहर भी नहीं निकल सकते। यही हाल मेरा और मां-बाप का है।

हर कहीं हिंसा का बोलबाला है। मेरे अपने गांव में और पड़ोस में। हमारे स्थानीय पार्टी कार्यालय बंद कर दिए गए हैं। वे मजदूरों और किसानों (जो वामपंथी दलों के समर्थक हैं) को पीट रहे हैं। मैं दैनिक जरूरियात का सामान खरीदना चाहती हूं। लेकिन हमें डराया-धमकाया जा रहा है। साधारण लोग भी बिना बात के पीटे जा रहे हैं। पार्टी नेताओं की खोजबीन की जा रही है। पार्टी के कई दफ्तरों में आग लगा दी गई।

मैं उन्नीस साल की लड़की हूं। अपनी छोटी सी जिंदगी में मैंने कल रात (चार मार्च) जो कुछ भी देखा सुना उसके बाद वे सो नहीं सकीं। मैं अपनी जिंदगी के सामने आ खड़े हुए खतरों के बारे में ही सोचती रही। अपने मां-बाप की सुरक्षा, अपने गांव और पड़ोस के गांव के बारे में सोचती रही। क्या अब ऐसे ही चलेगा? कृपया हमारी रक्षा करें।