वर्दी चाहे हमदर्दी

लखनऊ के एक थाने में तैनात कांस्टेबल रमेश कहते हैं, ‘एक पॉश कालोनी में गश्त करते हुए मैंने देखा कि चार लड़के एक कार में बैठे शराब पी रहे थे. मैंने उन्हें मना किया तो उनमें से एक कार से उतरा और उसने मुझे तीन-चार झापड़ रसीद कर दिए. मैंने पुलिस स्टेशन फोन कर और फोर्स भेजने को कहा. लेकिन कार्रवाई करने की बजाय एसओ ने मुझसे कहा कि वे उन लड़कों को जानते हैं और मैं भविष्य में सावधानी बरतूं. मैं उसी दिन मर गया था. आत्महत्या इसलिए नहीं की क्योंकि 12 साल की एक बेटी है. अब तो मेरे सामने बुरे से बुरा भी हो जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं किसी रोबोट जैसा हो गया हूं जो तभी कुछ करता है जब अधिकारी करने को कहे.’

रमेश हमें अपने आवास में ले जाते हैं. किसी दड़बे जैसी नजर आती यह जगह बहुत छोटी है और लोग बहुत ज्यादा. रमेश कहते हैं, ‘हमारे इस घर से ज्यादा जगह तो हमारी जेल में है. मगर किसे परवाह है.’ पूर्व आईजी एसएस दारापुरी कहते हैं, ‘किसी इलाके में प्रशासन कैसे काम कर रहा है इसका संकेत इससे मिल जाता है कि वहां पुलिस का क्या हाल है.’

और जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपना कर्तव्य निभाने की जिद पर डटे रहते हैं उनके साथ क्या होता है यह जानना हो तो शैलेंद्र सिंह एक उदाहरण हैं जिन्होंने 2004 में डिप्टी एसपी के पद से इस्तीफा दे दिया. चंदौली में जन्मे सिंह प्रदेश में नियुक्ति पाने वाले सबसे कम उम्र के सर्कल अफसरों में से एक थे. लेकिन उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि उत्तर प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी होना बड़ा मुश्किल काम है. सिंह बताते हैं, ‘एक बार मुझे खबर मिली कि दो लोग अवैध रूप से 10 लाख 50 हजार रु लेकर जा रहे हैं. पूछताछ के दौरान उन्होंने माना कि वे बेसिक शिक्षा अधिकारी रमेश कुमार की तरफ से यह पैसा ले जा रहे थे जो शिक्षा मंत्री राम अचल राजभर के जरिए पार्टी फंड में जाना था. रमेश कुमार ने मुझे फोन किया और कहा कि आप गलत जगह हाथ डाल रहे हैं. खबर पुलिस मुख्यालय पहुंची तो आईजी स्तर से नीचे तक हड़कंप मच गया. उन्होंने मेरे इंस्पेक्टर को खूब लताड़ा मगर मुझसे सीधे कुछ नहीं कहा. मायावती जी उस समय

देश से बाहर थीं. मेरा एक हफ्ते में पांच बार ट्रांसफर हुआ. शाम को मैं सीबी-सीआईडी का चार्ज लेता और सुबह पता चलता कि मेरा तबादला भ्रष्टाचार निरोधक शाखा में कर दिया गया है.’

सजा देने, डर बिठाने और इस तरह पुलिस को अपने इशारों पर नचाने के लिए ऐसे तबादलों का किस खूबी से इस्तेमाल होता है यह आंकड़ों पर नजर डालने से भी साफ हो जाता है. 2007 के मध्य से 2009 के मध्य तक 95 आईपीएस अफसर ऐसे थे जिनका पांच से लेकर 11 बार तक तबादला हुआ. बरेली शहर ने इस दरम्यान 12 एसएसपी देखे. नोएडा का यह हाल है कि कोई एसपी छह महीने टिक जाए तो हैरत होने लगती है. गृह सचिव जीके पिल्लई ने कुछ समय पहले ही एक इंटरव्यू में माना था कि उत्तर प्रदेश में एक एसपी का एक जगह औसत कार्यकाल दो महीने होता है. जब शीर्ष स्तर पर ही यह हाल है तो एसएचओ और सब इंस्पेक्टरों  की स्थिति क्या होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है. आईजीपी रैंक के एक अधिकारी व्यंग्यात्मक लहजे में कहते भी हैं, ‘सब इंस्पेक्टर, एएसआई या फिर हेड कांस्टेबल को जो एक वाक्य सबसे ज्यादा सुनने को मिलता है वह यही है कि तेरा ट्रांस्फर करवा दूंगा.’

एक पुलिसकर्मी की समस्याएं रिटायर होने के बाद भी कम नहीं होती. नौकरी के दौरान जिन जिन जगहों पर दरोगा की तैनाती रही है यदि वहां के न्यायालय में उसके द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट या गवाही से संबंधित कोई मामला चल रहा हो तो उसे वहां जाना पड़ता है. इस काम के लिए उसे महज 15 रुपये ही खाने का सरकारी खर्च मिलता है. वह भी तब जब न्यायालय में तय तारीख पर गवाही हो जाए. कई बार गवाही किन्हीं कारणों से नहीं हो पाती. ऐसे में खाने का खर्च रिटायर पुलिसकर्मी को अपने पास से उठाना पड़ता है. यदि दारोगा न्यायालय में गवाही के लिए उपस्थित नहीं हो पाता तो उसके खिलाफ वारंट जारी हो जाता है. ऐसे में नौकरी के दौरान ये खर्चे नहीं खलते, लेकिन रिटायरमेंट के बाद यह खासा मुश्किल होता है.

प्रदेश के पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता का आरोप है कि पूरा विभाग ही गैर योजनाबद्ध तरीके से चलता आ रहा है. वे खुलकर कहते हैं, ‘हर सरकार चाहती है कि क्राइम का ग्राफ उसके शासन में कम रहे. इसका फायदा पुलिस विभाग बखूबी उठाता है. अब सीएम का फरमान है कि क्राइम 15 परसेंट कम हो. आप बताइए उनके पास ऐसा करने के लिए कोई जादू की छड़ी तो है नहीं. इसलिए वे अपने तरीके निकालते हैं. मसलन पीड़ित की रिपोर्ट ही नहीं दर्ज की जाती. इससे पुलिसकर्मियों को दोहरी राहत मिलती है. एक तो क्राइम का ग्राफ नहीं बढ़ता, दूसरा रिपोर्ट दर्ज होने के बाद होने वाली भागदौड़ से भी राहत मिलती है क्योंकि भागदौड़ में हजारों रु खर्च होते हैं, जिसके लिए थानों के पास कोई बजट नहीं होता.’

पूर्व डीजीपी उदाहरण देते हैं कि वर्ष 1973 में प्रदेश भर के थानों में 2 लाख 75 हजार मुकदमे दर्ज हुए थे जबकि उन दिनों अपराध आज की तुलना में काफी कम था. लेकिन अब यह आंकड़ा डेढ़ लाख के आसपास सिमट गया है. यही कारण है कि थानों में सुनवाई न होने की दशा में पीड़ितों की फरियाद विभिन्न आयोगों, न्यायालयों सहित पुलिस के आला अधिकारियों के यहां बढ़ रही है. आंकड़े देख कर अधिकारी से लेकर सरकार तक खुश होती है कि अपराध कम हो रहा है, लेकिन इस तरह अपराध कम करने से अपराधियों को ही बढ़ावा मिल रहा है. अधिकारी नेताओं के कृपापात्र हैं, लिहाजा वे कर्मचारियों की मांग सरकार तक नहीं ले जा पाते. दोनों ही यह उम्मीद करते हैं कि थाने में तैनात लोग ही अपने पास से सबकुछ मैनेज करें. नौकरी बचाने के लिए थाने के लोग सबकुछ करने को मजबूर होते हैं. ऐसा नहीं कि अधिकारी उनकी हरकतों से अनभिज्ञ हैं लेकिन जानबूझकर वे भी आंखें बंद किए परंपरा को आगे बढ़ाते रहते हैं. गुप्ता कहते हैं, ‘यह सब कुछ तभी सुधरेगा जब सरकार जैसे विकास योजनाओं पर रुपये खर्च करती है उसी तरह पुलिस विभाग के सभी कामों के लिए सरकारी धन उपलब्ध कराया जाए.’

जानकारों के मुताबिक पुलिस कर्मचारियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों को कम करने के लिए आईपीएस असीम अरुण ने शासन को एक प्रस्ताव भी बना कर भेजा है. जिसमें थानों की जीप का डीजल, वर्दी भत्ता, मोबाइल खर्च, मुल्जिम खुराक बढ़ाने से लेकर भवनों के मरम्मत, गुप्त व्यय सहित करीब 27 बिन्दु हैं. महीनों हो गए लेकिन यह प्रस्ताव भी अभी ठंडे बस्ते में ही है.

(बृजेश पांडे के सहयोग के साथ)

(31 अक्टूबर 2010)

2 COMMENTS

  1. Dear Sir

    You have tried to unveil that aspect of police force, which is often left by others. Thanks for this. It is a stark reality that everyone has complaint about police force, be it a common man or Chief Minister, but who cares for their rights. I agree that police force too have the same human rights, which others do possess.

    Various commissions have made their recommendations to provide basic comforts to these security personnels, but they have been denied. Why? Where lies the problem? The problem lies with those leaders and politicians who want this police force to become a tool in their hands. Even the Supreme Court has issued directions for these, but the deaf ears of statehood have ignored this. Now, the ball is in the court of media, if it highlights this, then we can hope for some relief to police force. Till then, we have to wait for this.

    Thanks once again for writing such article.

    Balendu Priyadarshan

    Advocate

  2. Dear Sir ,

    There is a saying in Hindi crime is guilty of the crime who endures. And in our country’s police, which tended to be in charge of the safety of the country are suffering the same crime will happen to the common man. If you try to force it, but then everything is possible.

    महोदय जी

    हिंदी में एक कहावत है जुर्म को सहने वाला जुर्म करने वाले से बड़ा अपराधी होता है। और जब हमारे देश की पुलिस जिसके हाँथों में सारे देश की सेफ्टी का जिम्मा हो वही जुर्म को सहता रहे तो फिर आम आदमी का क्या होगा। अगर फ़ोर्स चाहे तो सब कुछ संभव है लेकिन कोशिश करे तब।

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