वन्यजीवों के बचाव में लगा मंत्रालय

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पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने तीसरी राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना तैयार की है, जो देश में जंगली जानवरों को बचाने के लिए वर्ष 2031 तक लागू रहेगी।

राज्यसभा में इसकी जानकारी एक सवाल के लिखित जवाब में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने दी। उन्होंने बताया कि नयी वन्यजीव कार्य योजना सभी वन्य जीवों के संरक्षण के दृष्टिकोण पर केंद्रित है। नीति में उनके आवासों को संरक्षित करते हुए वन्यजीवों की खतरे वाली प्रजातियों को बचाने पर विशेष ज़ोर दिया गया है, जिसमें स्थलीय, अंतर्देशीय जलीय, तटीय और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं।

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर जारी ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन के परिणामों के अनुसार, भारत में अब 2,967 बाघ हैं और दुनिया के प्रत्येक 10 में 7 भारत में हैं।

यह संख्या 2014 के मुकाबले 33 फीसदी  वृद्धि को दर्शाती है, जब देश में 2,226 बाघ थे। संख्या 2010 (1,706) और 2006 (1,411) के मुकाबले भी कहीं ज़्यादा है। इन 12 वर्षों के अंतराल में भारत में बाघों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गयी है। यह ऐसा कारनामा है, विशेषज्ञ इसका श्रेय संप्रभु वित्त पोषण और फील्ड स्टाफ को देते हैं।  मध्य प्रदेश में 526 बाघों (2014 में 308) के साथ सूची में सबसे ऊपर है, जबकि कर्नाटक में यह संख्या 524 (406/2014) और उत्तराखंड में 442 (340/2014) है।

लगभग 3,000 बाघों वाला भारत दुनिया में बाघों के लिए सबसे बड़े और सुरक्षित आवासों में से एक है। दुनिया के तीन-चौथाई बाघ भारत में हैं। नये नम्बरों ने वन्यजीव संरक्षणवादियों को खुश कर दिया है। हालाँकि टाइगर स्टेट्स रिपोर्ट 2018 ने उत्तर पूर्व और छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या के बारे में कुछ चिन्ताएँ भी व्यक्त की हैं।

वैसे बाघों की संख्या छत्तीसगढ़ में 2014 में 46 मुकाबले 2018 में आधी से भी कम 19 हो गयी है। मिजोरम और उत्तरी पश्चिम बंगाल में 2014 में बाघों के होने के संकेत मिले थे; लेकिन इस बार ईसा कोई संकेत नहीं मिला। पश्चिम बंगाल के बक्सा, मिज़ोरम में डम्पा और झारखंड के पलामू में बाघों को दर्ज नहीं किया गया था। 2014 की जनगणना में सभी तीन इलाकों में बाघों के होने के संकेत दर्ज किये गये थे। ओडिशा में ही बाघों की संख्या में कोई सुधार दर्ज नहीं किया गया है।

टाइगर अधिवास-बाघों के कब्•ो वाले जंगल क्षेत्र पूर्वोत्तर में 9,901 वर्ग किमी से हटकर 3,312 वर्ग किमी हो गये हैं। शिवालिक रेंज में भी ऑक्यूपेंसी कम हो गयी है।

रिपोर्ट कहती है कि नॉर्थ ईस्ट हिल्स और ओडिशा में स्थिति विशेष रूप से कमज़ोर है और तत्काल बाघ संरक्षण की आवश्यकता है। नामेरी और पक्के के बाघ रिजर्व में गिरावट दर्ज की गयी है; जबकि इस आकलन में बक्सा, पलामू और दम्पा में बाघों को दर्ज नहीं किया गया है। इंद्रावती (छत्तीसगढ़) में कमज़ोर बाघ स्थिति इन क्षेत्रों में कानून और व्यवस्था की स्थिति से जुड़ी थी।

यदि सकारात्मक पक्ष देखा जाए, तो 83 फीसदी बाघ वास्तव में कैमरे की रेंज में थे, जिससे इस संख्या की विश्वसनीयता पर भरोसा किया जा सकता है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) की टीम के प्रभारी ने बाघों के कैमरा ट्रैप चित्रों पर अधिक निर्भरता के साथ कार्यप्रणाली में कुछ बदलाव किये। रिपोर्ट में कहा गया है- ‘व्यक्तिगत बाघ फोटो-कैप्चर पर स्थानीय डाटा का उपयोग सहचर के रूप में शिकार, निवास स्थान और मानवजनित कारकों पर स्थानिक डाटा के संयोजन में किया जाता है।’

कुछ वैज्ञानिक देश में बाघों की संख्या जानने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तथाकथित दोहरी नमूना पद्धति पर संदेह जताते हैं। भारत ने 2004 में पगमार्क  सेंसस को तब नकार दिया था जब यह सरिस्का बाघ अभयारण्य में बाघों के पूर्ण विलोपन का पता लगाने में विफल रहा था। नयी विधि में सभी बाघों के असर वाले जंगलों का ज़मीनी सर्वेक्षण, शिकार की बहुतायत का आकलन, आवास की विशेषताओं को समझना, अन्य बाघों के संकेतों की मैपिंग और बाघों की कैमरा ट्रैप तस्वीरें शामिल हैं। डबल सैंपलिंग विधि में बाघ की पटरियों की गिनती को क्षेत्र में व्यापक अनुमान प्रदान करने के लिए छोटे क्षेत्रों में फोटो खिंचवाने वाले वास्तविक बाघों के साथ सम्बद्ध किया जाता है।

अब विश्व की कुल संख्या के 70 फीसदी  से अधिक बाघ भारत में हैं। इस बार इनकी संख्या में सुधार का एक कारण बाघ के असर वाले जंगलों के स्थानिक कवरेज में वृद्धि हो सकता है। कैमरा ट्रैपिंग का क्षेत्र लगभग 25 फीसदी  (92,164 से 121,337 वर्ग किमी तक) बढ़ गया है। कैमरा ट्रैप स्थानों की संख्या में लगभग तीन गुना (9,735 से 26,838 कैमरा ट्रैपिंग स्थान) की वृद्धि हुई है और कवर किये गये राज्यों की संख्या भी 18 से 21 हो गयी है।

प्रमुख फ्लैगशिप प्रजातियों की जनगणना समय-समय पर सम्बन्धित राज्यों द्वारा राज्य स्तर पर की जाती है। हालाँकि, बाघ और हाथी की जनगणना राष्ट्रीय स्तर पर क्रमश: चार और पाँच साल में एक बार की जाती है।

राज्य और केंद्र सरकार द्वारा की गयी नवीनतम जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार, देश में लुप्तप्राय प्रजातियों की संख्या-विशेष रूप से शेर, गैंडा, बाघ और हाथी की संख्या बढ़ गयी है। मंत्रालय गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा कार्यक्रम के लिए राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को गम्भीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों की बचत के लिए रिकवरी कार्यक्रम और केन्द्र प्रायोजित योजना वाइल्ड हैबीटेट्स का विकास घटक के तहत वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। वर्तमान में इस कार्यक्रम के तहत 21 गम्भीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों की पहचान की गयी है।

वन्य प्राणियों की हत्या और शिकार को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने जो उपाय किये हैं, उनमें वाइल्ड लाइफ (संरक्षण) अधिनियम, 1972 शामिल है, जिसमें इसके प्रावधानों के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान है। अधिनियम में किसी भी उपकरण, वाहन या हथियार को ज़ब्त करने का प्रावधान है, जो वन्यजीव अपराध करने के लिए उपयोग किया जाता है। राज्यों में कानून प्रवर्तन अधिकारियों को जंगली जानवरों के अवैध शिकार के िखलाफ कड़ी निगरानी बनाये रखने के लिए निर्देशित किया गया है।

जानकारी से पता चलता है कि वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो का गठन जंगली जानवरों के अवैध शिकार और इनके चमड़ी से बनी चीज़ों के गैर-कानूनी व्यापार के बारे में खुिफया जानकारी जुटाने और वन्यजीव कानून के प्रवर्तन में अंतर्र्राज्यीय और सीमा-पार समन्वय प्राप्त करने के लिए किया गया है। राज्य/केन्द्र शासित प्रदेशों से अनुरोध किया गया है कि वे क्षेत्र संरचनाओं को मज़बूत करें और संरक्षित क्षेत्रों में और इसके आसपास गश्त तेज़ करें।

मंत्री बाबुल सुप्रियो के अनुसार, विलुप्तप्राय वन्यजीवों की सुरक्षा के अन्य उपायों में संरक्षित क्षेत्र, जिनमें राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व शामिल हैं; जो वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम 1972 के प्रावधानों के तहत पूरे देश में महत्त्वपूर्ण वन्यजीवों के आवासों को कवर करते हैं। इसका उद्देश्य जंगली जानवरों और उनके आवासों का संरक्षण करना है। वन्यजीवों को बेहतर संरक्षण और निवास स्थान में सुधार के लिए राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश सरकारों को वन्यप्राणी हैबिटेट का ‘एकीकृत विकास, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलिफेंट’ की केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।