‘ले आएंगे बाजार से जाकर दिलो जां और’

तो लंबे समय से मशीनी (मैकेनिकल) दिल आदि बनाने की कोशिशें जारी हैं. ऐसा दिल तो लगभग बना भी लिया गया है. उतना ही छोटा, उतना ही बढ़िया. छोटी-सी बैटरी से चलने वाला. प्रायोगिक तौर पर मरीजों पर इसका प्रयोग भी किया गया है. शायद, वह दिन अब बहुत दूर नहीं जब दवा की दुकान पर कृत्रिम हृदय कुछ लाख रुपये में उपलब्ध होगा. चलिए, दिल की बात तो भविष्य के गर्भ में है. पर जोड़ तो बना ही लिए गए हैं. खूब मिल रहे हैं. वर्कशॉप में बने घुटनों, कूल्हों या मेरुदंड का प्रत्यारोपण तो आज इतना आम हो गया है कि हम इसे चमत्कार जैसा कुछ मानते ही नहीं. घुटना बदलना कितना सरल तथा प्रभावी हो गया है. शुरुआती दिनों के कृत्रिम घुटने आदि एक सीमा तक ही मुड़ते थे. आज वे उसी रेंज में मुड़-तुड़ सकते हैं जैसे कि भगवान के बनाए घुटने. इंसुलिन पंप आदि भी ऐसी ही मशीनें हैं. पर एक सक्षम मशीन, जिसे लिवर आदि की जगह लगाया जा सके, अभी सपना ही है. वह बहुत महंगी भी होगी. कुछ साल ही चलेगी. उसमें मेंटीनेंस भी लगेगी. मशीनें फिलहाल तो किसी भी अंग का स्थान लेती दिखती नहीं.

तो एक तरफ तो मानव अंगों को दूसरे मानव से लेकर प्रत्यारोपित करने का अंग प्रत्यारोपण विज्ञान विकसित हो रहा है जिसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा डोनर्स अर्थात अंगदान करने वालों का अभाव है, तो दूसरी तरफ मैकेनिकल अंगों के निर्माण की कोशिशें हैं जो अभी भी अपने शैशवकाल में हैं. मानव अंगों की रचना तथा कार्य करने की माया बेहद ही जटिल है. उसे समझे बिना मशीनी अंग बनाना असंभव है.

इसीलिए एक नई, तीसरी दिशा से चिकित्सा विज्ञान को बड़ी आशाएं हैं. यही स्टेम सेल थेरेपी है यानी शरीर से ऐसी कोशिकाएं निकालना जिनमें कुछ भी अंग बनाने की क्षमता हो. ये कोशिकाएं ही स्टेम सेल कहलाती हैं. तो क्या हम शरीर से कुछ कोशिकाएं लेकर, प्रयोगशाला में उनकी पैदावार (कल्चर) करके लाखों-करोड़ों कोशिकाएं बना सकते हैं जिन्हें नियंत्रित तरीके से मनचाहे अंग का रूप दिया जा सके? क्या हम आपके शरीर से कुछ कोशिकाएं निकालकर, उनसे ठीक वैसा ही दिल, किडनी, आंख, पैंक्रियाज, लिवर आदि बना सकते हैं जैसा कि ईश्वर ने आपके शरीर में बनाकर आपको पैदा किया है? तब तो शरीर में जो भी अंग खराब होता जाए, लाकर नया फिट कर लिया जाएगा. एकदम मूल अंग जैसा ही विश्वसनीय तथा वैसा ही बढ़िया काम करने वाला. तब तो यदि डायबिटीज के रोगी की बीमार पैंक्रियाज को बदल लें तो डायबिटीज की बीमारी खत्म. किडनी लगा दें तो डायालिसिस का झंझट खत्म. लिवर सिरोसिस हो भी गया हो तो जाकर नया लिवर लगवाइए और ठाठ से वापस दारू चालू रखिए. इस तरह जो अंग बनेंगे वे ठीक आपके अपने जैसे ही होंगे. शरीर द्वारा इन्हें अस्वीकार करने का कोई झंझट ही नहीं जिसका डर अभी दूसरे की किडनी आदि प्रत्यारोपित करने पर बना रहता है. सारा विचार ही रोमांचित करने वाला है तो क्या अमरता की कुंजी चिकित्सा विज्ञान के हाथ लग गई है?

शायद, ऐसा ही है. स्टेम सेल का जो विज्ञान है वह मानव जीवन को अमर न भी कर पाए पर उसी दिशा में एक बड़ा कदम तो जरूर है. एक बड़ा उत्तर स्टेम सेल चिकित्सा में छिपा है. इसी उत्तर से आपको अगली बार अवगत कराया जाएगा.

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