लड़की है एक नाम रजिया है

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दिल्ली से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित मेरठ जिले का नांगला कुंभा गांव कुछ समय पहले तक आसपास के गांवों के लिए भी अंजान सा ही था. लेकिन इन दिनों देश, दुनिया में इस गांव की बड़ी चर्चा है. इस चर्चा का कारण बनी हैं गरीब परिवारों के बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराकर उन्हें स्कूलों में दाखिला दिलवाने वाली रजिया सुल्ताना. 16 साल की रजिया को उनके इस काम के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने हाल ही में ‘प्रथम मलाला पुरस्कार’ ( यूएन स्पेशल एनवाय फार ग्लोबल एजुकेशंस यूथ करेज अवार्ड फार एजुकेशन) के लिए चुना है. ग्रामीण परिवेश की विषम परिस्थितियों में रह कर इतनी कम उम्र में रजिया ने जो कारनामा किया है वह किसी कमाल से कम नहीं. रजिया की कहानी उन्हीं की जुबानी जानने के लिए यह संवाददाता उनके गांव पहुंचा और जो कुछ लेकर लौटा, उसका सार यही है कि अगर लक्ष्य को लेकर थोड़ी भी समझ और खुद पर ईमानदारी भरा यकीन हो तो तमाम दुश्वारियों के बावजूद उसे हासिल किया जा सकता है.

आज से सात साल पहले की बात है, मेरठ जिले के कई गांवों में कम आमदनी वाले परिवार दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल की गेंदें सिलने का काम करते थे. एक गेंद के एवज में सात से दस रुपये पाने वाले इन लोगों ने अपने बच्चों को भी इस काम में लगा रखा था ताकि आमदनी में कुछ और इजाफा हो सके. पढाई लिखाई से दूर रहते हुए बच्चे लगातार इस काम में अपने परिजनों का हाथ बंटाते और स्कूल, कालेज जैसी बातें उनके हिस्से से गायब होती जाती. इसी दौर में बच्चों के लिए काम करने वाले स्वयं सेवी संगठन ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के कुछ लोग इन गांवों में आए और लोगों को शिक्षा का महत्व समझाने लगे. इस संगठन ने अलग-अलग गांवों में बाल पंचायतों का गठन किया जिसके तहत रजिया, नांगला कुंभा गांव की बाल पंचायत की अध्यक्ष चुनी गईं. इसके बाद से वे गांव-गांव घूमकर उन लोगों को बच्चों को पढ़ाने की बातें समझाने लगीं जो गरीबी के चलते उनसे बाल मजदूरी करा रहे थे. देखते ही देखते गांव के दूससे बच्चे भी रजिया के साथ जुड़ गए और फिर इनकी टोली ने इस जागरूकता अभियान को अपने जुनून में तब्दील कर दिया. इसी का परिणाम है कि अब तक रजिया और उनके साथी इलाके के करीब 50 बच्चों का दाखिला विभिन्न स्कूलों में करवा चुके हैं.

रजिया से बात करते हुए सफलता और संतुष्टि का समवेत भाव उनके चेहरे पर साफ दिखाई देता है. वे बताती हैं, ‘गरीबी के चलते मजबूरी में अपने बच्चों को काम पर भेजने वाले लोगों को समझाना बहुत कठिन था. एक तो वे खुद शिक्षा न होने के चलते इसके महत्व से उतने वाकिफ नहीं थे और दूसरा उन्हें लगता था कि बच्चे अगर काम नहीं करेंगे तो आमदनी कम होने से घर चलाने में हो रही मुश्किलें और बढ़ जाएंगी.’ रजिया हमें बताती हैं कि धीरे-धीरे वे यह समझ गई थीं कि लोगों को जागरुक करने के लिए समस्या के साथ ही उन्हें इससे होने वाले नुकसान के बारे में समझाने की भी जरूरत है. उन्होंने लोगों को समझाया कि बाल श्रम करने वाले बच्चों को न पूरा पैसा मिलता है और न ही बड़े होने पर ये कुछ और करने के लायक रह जाते हैं. इसलिए उन्हें पढ़ाने में ही सबका भला छुपा हुआ है. धीरे-धीरे लोग उनकी बातों को समझने लगे और अपने बच्चों का दाखिला कराने को तैयार हो गए.

रजिया से बात करते वक्त कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि वे दूसरे बच्चों से बहुत अलग हैं. उनके हावभाव और पहनावे से लेकर उनमें तमाम बातें अन्य बच्चों जैसी ही हैं. लेकिन उनमें मौजूद गजब की विलक्षणता उस वक्त साफ-साफ महसूस की जा सकती है जब वे कहती हैं, ‘जिस फुटबाल को बनाने के एवज में एक बच्चा मुश्किल से पांच-सात रुपये कमाते हुए अपना पूरा भविष्य अंधेरे में धकेल रहा होता है, उसी फुटबाल पर एक किक मारने के बदले एक खिलाड़ी करोड़ों रुपये कमा कर अपनी आगे की कई पीढि़यों तक का भविष्य सुरक्षित कर देता है.’ बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली रजिया की ये बातें शिक्षा अभियानों की सफलता और असफलता की पड़ताल करने वाले उन शोधार्थियों के निष्कर्षों  को भी छोटा कर देने वाली प्रतीत होती हैं, जो अपने अध्ययन के जरिये दुनिया भर का दर्शन सामने लाकर रख देते हैं मगर बुनियादी बातों को समझ नहीं पाते.

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