‘राहुल गांधी को अहम मुद्दों पर बात करने की जरूरत है’

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क्या आपको नहीं लगता कि आपकी सरकार में बहुत-से मुद्दों को लेकर दो ध्रुवों वाली स्थिति है? प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को लगता है कि पर्यावरण मंत्रालय उनकी राह में कांटे जैसा है.
देखिए, हमारी सरकार एक गठबंधन की सरकार है…

लेकिन कांग्रेस के भी कई मंत्री एक-दूसरे के खिलाफ जाते दिखते हैं.
मैं मानता हूं कि सोच को लेकर मतभिन्नता है. मैं इससे इनकार नहीं करूंगा. मुझे लगता है कि भविष्य में जब मुद्दों पर बहुत हठी रुख रखने वाले लोग भी सरकार में आएंगे तो भी मतभिन्नता की यह स्थिति रहेगी. और मुझे इस स्थिति से कोई समस्या नहीं है. मैं सरकार में अपने साथियों से बात करने के लिए, उन्हें समझने की कोशिश करने के लिए तैयार हूं. चार लोगों के किसी मुद्दे पर चार विचार होंगे तो बहसें होंगी ही. मैं कई मंत्रिमंडलों में रहा हूं और पिछले तीन-चार साल के दौरान हमने कई बार बहुत तीखी बहसें की हैं. लेकिन मंत्रिमंडल वाली व्यवस्था में जब एक बार कोई फैसला होता है तो आपको इसका पालन करना होता है. और अगर आपकी अंतरात्मा इसे मानने के लिए तैयार नहीं तो आप सरकार से बाहर हो जाएं. पर मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगता कि अलग-अलग मंत्रियों के अलग-अलग विचार हों.

2009 में आप पहले से भी अधिक धमक के साथ सत्ता में लौटे थे. आपके हिसाब से तब से अब तक ऐसा क्या हो गया कि इस सरकार से लोगों का विश्वास उठता दिख रहा है? क्या आपको लगता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कमी रही है?
सरकार में रहते हुए प्रधानमंत्री पर कोई टिप्पणी करना मेरे लिए ठीक नहीं. यह नैतिक रूप से गलत है. वे प्रधानमंत्री हैं. मैं उनके मंत्रिमंडल में मंत्री हूं, इसलिए मुझे उनके नेतृत्व को स्वीकार करना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए. इसलिए मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.

2009 में कहा जा रहा था कि यूपीए सत्ता में नहीं आएगा. हर सर्वेक्षण बता रहा था कि हम सत्ता से बाहर होंगे. लेकिन लोग हमें फिर सत्ता में लाए. उन्होंने हमारी सीटों के आंकड़े में 61 की बढ़ोतरी की और मुख्य विपक्षी पार्टी का प्रतिनिधित्व घटाया. यानी हमारी सरकार के 10 में से पांच सालों में लोगों की राय हमारे बारे में अच्छी रही. हां, दूसरे पांच साल की बात करें तो मैं देख सकता हूं और महसूस कर सकता हूं कि वोट नकारात्मक है. इसकी वजहें हैं मंदी, कार्यपालिका का अपना काम ठीक से न करना, भ्रष्टाचार के मामले, जांचें, महंगाई और नए रोजगार पहले जैसी रफ्तार से पैदा न होना. इन सब चीजों के कॉकटेल ने नकारात्मकता का माहौल बनाया है. हो सकता है हम इससे उबर जाएं, हो सकता है न उबर पाएं, लेकिन इसका फैसला जनता करेगी और हमें यह फैसला स्वीकार करना होगा. लेकिन मंदी के बावजूद पिछले नौ साल में औसत विकास दर 7.5 फीसदी रही है. यह दुख का विषय है कि मंदी इन दस सालों के आखिरी चरण में आई. काश यह उलटा होता. मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं कि यह स्थिति बदले और चुनावों में जाने से पहले माहौल सकारात्मकता की तरफ बढ़े.

आपने कार्यपालिका की कमी की बात की. अगर श्रीधरन मेट्रो की व्यवस्था इतनी सफलता से चला सकते हैं तो जिस सरकार में इतने सक्षम लोग हैं उसका प्रशासन के मोर्चे पर इतना बुरा हाल क्यों है?
यह फिर से वही प्रशंसा वाली बात है कि सरकार में इतने सक्षम लोग हैं. देखिए, सारी उंगलियां बराबर नहीं होतीं. सरकार में हर समुदाय, क्षेत्र आदि के लोग होते हैं. जरूरी नहीं कि सब के सब काम करने के मोर्चे पर उतने ही अच्छे हों. मुझे लगता है कि कार्यपालिका उतनी प्रभावी नहीं रही है जितना इसे होना चाहिए था. लेकिन कार्यपालिका का मतलब सिर्फ मंत्री नहीं हैं. मंत्री तो जिम्मेदार हैं ही, इसमें नौकरशाह भी शामिल हैं. कार्यपालिका के ज्यादातर फैसले तो सचिव जैसे नौकरशाह ही करते हैं.

आपको नहीं लगता कि इस दौर में सरकारें लोगों की नब्ज नहीं समझ पा रहीं. उन्हें नहीं लगता कि उन्हें अपने फैसलों को समझाने की जरूरत है? टूजी या कोयला आवंटन जैसे मसलों पर पीछे मुड़कर देखने क्या आपको नहीं लगता कि अगर आप यह समझाते कि इस फैसले को दूसरे विकल्पों पर इसलिए तरजीह दी गई तो आपकी सरकार के लिए स्थितियां इतनी खराब नहीं होतीं?
मुझे लगता है कि सूचना के अधिकार ने सरकारों को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है. मैं खुद फाइलों पर विस्तृत टिप्पणियां लिखने के लिए जाना जाता हूं. हालिया कोयला घोटाले को ही लें. इस मामले में भी फैसला क्यों लिया गया यह साफ बताया गया है. इसके बावजूद कहा जाता है कि उसमें घोटाला हुआ. आप कार्यपालिका के फैसलों को भी समझें. छह महीने पहले मैंने किसी फाइल पर कोई नोट लिखा तो वह तब उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिखा. छह महीने बाद जब मेरी जानकारी में कुछ और बातें जुड़ती हैं तो मैं उस फाइल पर कुछ और लिखता हूं. अब तीन साल बाद आप वह फैसला देखें और कहें कि एक ही फाइल पर छह महीने के फासले पर दो तरह के फैसले लिए गए और इसका मतलब यह है कि कुछ गड़बड़ है तो वह ठीक नहीं है. फैसले में यह बदलाव और तथ्यों के संज्ञान में आने के बाद हुआ. आप कार्यपालिका के फैसलों को न्यायपालिका के फैसलों की तरह नहीं देख सकते.

क्या आपको नरेंद्र मोदी का उभार देखकर किसी तरह की चिंता होती है? क्या आपको लगता है कि वे सत्ता में आ सकते हैं?
एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर हम मानते हैं कि वे हमारे लिए एक चुनौती हैं. हम उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि मुख्य विपक्षी पार्टी ने उन्हें एक चुनौती की तरह पेश किया है. एक व्यक्ति के तौर पर मैं उनकी विचारधारा से चिंतित हूं. जिस तरह की भाषा का वे इस्तेमाल करते हैं उससे भी मुझे चिंता होती है. अभी तक वे एक अपारदर्शी आवरण ओढ़े हुए हैं. उन्होंने ऐसे किसी बड़े मुद्दे पर नहीं बोला है जो इस समय देश को परेशान कर रहा है. उन्होंने बस वादे किए हैं. मैं मानता हूं कि यह करना पड़ता है क्योंकि चुनाव प्रचार का समय है. लेकिन उन्होंने अब तक कहीं यह नहीं कहा है कि इन वादों को पूरा करने के लिए उनके पास क्या विस्तृत कार्ययोजना है.

लेकिन आपका अपना नेतृत्व भी कई अहम मुद्दों पर कुछ नहीं बोल रहा?
नहीं, यह कहना गलत है. मैं अर्थव्यवस्था पर बोलता हूं. वित्त मंत्री होने के नाते आर्थिक मुद्दों पर मेरा क्या सोचना है मैं इस पर बोलता हूं. प्रधानमंत्री कई तरह के मुद्दों पर बात करते हैं. वे चुनाव रैलियों में उतना नहीं बोलते हों, उतने साक्षात्कार नहीं देते हों, जितना मैं चाहता हूं कि वे दें लेकिन वे अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग मंचों से अपनी राय रखते हैं. इसके लिखित प्रमाण मौजूद हैं. इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि मुद्दों पर अपनी राय नहीं रखते. आप उस राय से असहमत हो सकते हैं, उसकी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन यह नहीं कह सकते कि मुद्दों पर प्रधानमंत्री बोलते नहीं.

आप अपने नये नेतृत्व, जैसे राहुल गांधी के बारे में क्या कहेंगे जिनके बारे में हम बिल्कुल ही नहीं जानते कि वे कैसे काम करेंगे.
राहुल गांधी पार्टी के उपाध्यक्ष हैं. वे चुनाव रैलियों में बोल रहे हैं. पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उन्होंने कुछ मुद्दों पर अपनी राय रखी है. मैं सहमत हूं कि कई मुद्दों पर अभी उन्होंने नहीं बोला है. अगर मैं उन्हें राय दे रहा होता तो मैं निश्चित रूप से यह सलाह देता कि वे अहम मुद्दों पर बहुत विस्तार से अपना रुख रखें.

भाजपा में नेतृत्व का बदलाव बहुत उठापटक वाला रहा. क्या कांग्रेस में नेतृत्व भी कुछ ऐसे ही बदलेगा?
नहीं, मुझे लगता है कि पार्टी में यह भावना है कि अगर कांग्रेस फिर सत्ता में आती है तो राहुल गांधी को पार्टी और सरकार का नेता बनना चाहिए. पार्टी में विभिन्न स्तरों पर लोगों से बात करने पर मुझे यह समझ में आता है. वे पार्टी के उपाध्यक्ष हैं. अब सत्ता में लौटने पर पार्टी किसे नेता के रूप में आगे करती है इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह सकता. लेकिन नाम और लोगों की बात छोड़ दें तो मुझे लगता है कि समय आ चुका है कि अब हम कमान अगली पीढ़ी के हाथ सौंप दें.

इसका मतलब यह नहीं कि 60 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों को पूरी तरह से किनारे धकेल दिया जाए. लेकिन मुझे लगता है कि देश में बहुत से ऐसे युवा नेता हैं जो सरकार का हिस्सा बन सकते हैं और प्रभावी प्रशासन दे सकते हैं.

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