राहुल की ललकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुक़ाबले के लिए तैयार हो रहे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी

राहुल गाँधी अचानक चर्चा के केंद्र में हैं। यह चर्चा लगातार जारी है। अगले साल के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और विपक्ष के एक हिस्से में राहुल गाँधी के नेतृत्व को लेकर शुरू हुई चर्चा अब गम्भीर बहस की तरफ़ बढ़ती दिख रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में राहुल गाँधी की स्वीकार्यता का दायरा सँकरी गली से निकलकर व्यापक होने लगा है। राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा यह होने लगी है कि क्या भारत जोड़ो यात्रा देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव करने की तरफ़ जा रही है? तीन महीने पहले तक राजनीति के बियाबान में खड़ी दिख रही कांग्रेस पार्टी में रौनक़ और इसके नेताओं के चेहरे पर मुस्कराहट बताती है कि उसमें उम्मीद की बड़ी किरण जगी है। राहुल गाँधी की पद यात्रा को लोगों का इस स्तर पर समर्थन मिलने से $खुद कांग्रेस भी हैरान है। उसे लगता है कि जनता के बीच जाकर विपक्ष के मुद्दों को व्यापक बनाया जा सकता है। कांग्रेस 23-24 फरवरी, 2023 को रायपुर में विस्तारित अधिवेशन भी करने जा रही है, जिसमें विपक्षी एकता और 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति पर गहन चर्चा हो सकती है।

नीतीश कुमार जैसे नेता प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में हाल के महीनों तक राहुल गाँधी के नाम पर सहमति जताने से परहेज़ करते थे; लेकिन अब उनकी राय बदली हुई है। नीतीश ने जनवरी के शुरू में कहा कि बिहार में उनकी सहयोगी कांग्रेस के अगले आम चुनाव में राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर ज़ोर देने से उन्हें कोई समस्या नहीं है। दक्षिण के राज्यों के काफ़ी विपक्षी दल राहुल गाँधी के नाम पर सहमत दिखते हैं, जिनमें यूपीए के सहयोगी तो हैं ही।

उत्तर भारत में भी राहुल गाँधी के प्रति जनसमर्थन से भाजपा में बेचैनी दिखी है, भले उसके नेता आये दिन राहुल की यात्रा का मज़ाक़ उड़ाते हों। यह यात्रा इस महीने ख़त्म हो जाएगी; लेकिन इसकी गूँज अभी रहेगी। शायद यही कारण है कि कांग्रेस राहुल गाँधी की उत्तर भारत में एक और यात्रा का कार्यक्रम बना रही है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कांग्रेस इस यात्रा के ज़रिये भाजपा को सीधे चुनौती देने के मूड में है।

कांग्रेस लोकसभा के 2024 के चुनाव तक अपने कार्यक्रमों से राजनीति की ज़मीन को तपाये रखना चाहती है। उसे पता चल गया है कि राहुल गाँधी के ज़मीन पर उतरने से भाजपा ने बेचैनी महसूस की है और उसे टक्कर देने के लिए यही करना ज़रूरी है। छोटे-छोटे दल जिस तरह कांग्रेस को आँखें दिखाने लगे थे, उससे कांग्रेस नेता भी शर्म महसूस कर रहे थे। अब जबकि कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरा सामने होने के बावजूद भाजपा को धूल चटा दी और भाजपा दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भी हार गयी, कांग्रेस का थिंक टैंक समझ गया है कि ज़मीन पर उतरकर भाजपा की चुनौती को धवस्त किया जा सकता है।

भारत जोड़ो यात्रा के दिल्ली पहुँचने पर राहुल गाँधी ने संकेत दिया था कि वह आने वाले समय में विपक्ष के नेताओं से बातचीत कर सकते हैं। यह बातचीत किस तरह की और किन दलों से होगी, यह अभी साफ़ नहीं है। कारण यह है कि विपक्ष में ऐसे दल भी हैं, जो कांग्रेस का समर्थन नहीं करते। भले समय-समय पर भाजपा के ख़िलाफ़ कांग्रेस के साथ खड़े हो जाते हों। पार्टी इन दलों को साथ जोडऩे की कोशिश कर सकती है। उसके नेतृत्व वाला यूपीए कमोवेश कांग्रेस के साथ है। हालाँकि ममता बनर्जी की टीएमसी जैसे दल अलग खड़े दिखते हैं और वामपंथी दल भी कांग्रेस से कई मसलों पर परहेज़ करते हैं। कांग्रेस के लिए ममता और वामपंथियों को साथ लाना टेढ़ी खीर है। कांग्रेस का लक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव हैं, यह साफ़ है।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हाल में कहा कि राहुल गाँधी आम चुनाव में कांग्रेस और यूपीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे और नरेंद्र मोदी को चुनौती देंगे। कांग्रेस अब हिम्मत और भरोसे के साथ यह बात कहने लगी है, जिससे ज़ाहिर होता है कि भारत जोड़ो यात्रा ने उसे संजीवनी दी है। लेकिन कांग्रेस के लिए अपने दम पर भाजपा के ख़िलाफ़ मोर्चा फ़तेह करना आसान नहीं। कांग्रेस में आने वाले एक महीने में काफ़ी चीज़ें होने वाली हैं। सीडब्ल्यूसी का गठन होना है और लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए कमेटियाँ भी बनेंगी। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के रोल भी तय होंगे।

पहली चुनौती

राहुल गाँधी या कांग्रेस को भारत जोड़ो यात्रा से चुनावी लाभ मिला या नहीं, इसकी पहली परीक्षा इसी साल हो जाएगी। इस साल 10 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें तहत में 93 लोकसभा सीटें पड़ती हैं। यह कुल लोकसभा सीटों का 17 फ़ीसदी है। इनमें राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम शामिल हैं। भारत जोड़ो यात्रा इनमें से कई राज्यों में नहीं गयी; लेकिन सम्भावना है कि चुनाव से पहले कांग्रेस इन राज्यों में भी यात्रा निकालेगी। इनमें से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चार साल पहले कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनायी थी।

दिसंबर में जब चीन में कोरोना महामारी का नया वेरियंट आने पर जब मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री ने आनन-फ़ानन में भारत जोड़ो यात्रा रोकने का राहुल गाँधी को पत्र लिख दिया, तो बहुतों को यह लगा कि भाजपा यात्रा को दिल्ली आने से पहले ही रोक देना चाहती है; क्योंकि वह नहीं चाहती कि दिल्ली में उसका इम्पैक्ट दिखे और देश भर में इसकी चर्चा हो। राहुल को चिट्ठी लिखने के अलावा सरकार ने कोरोना को लेकर और कोई और गतिविधि नहीं की, तो इस आरोप को बल मिला कि भाजपा राहुल गाँधी की यात्रा से बेचैन है।

काफ़ी लोग मानते हैं कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के राहुल को यात्रा रोकने के लिए कहने के पीछे राजनीतिक कारण थे। कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अपनी रणनीति में बदलाव किये हैं। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े अब संगठन को मज़बूत करने में जुट गये हैं, जबकि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को जनता के बीच माहौल बदलने का ज़िम्मा दिया गया है। प्रियंका गाँधी ने जिस तरह हिमाचल प्रदेश में सघन चुनाव प्रचार किया और पार्टी की रणनीति पर काम किया, उससे उसे वहाँ भाजपा को पराजित करने में मदद मिली।

एआईसीसी के सचिव और हिमाचल चुनाव में घुमारवीं से तीसरी बार विधायक बने राजेश धर्माणी ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘सच कहूँ, तो प्रियंका गाँधी के चुनाव अभियान के तरीक़े से मैं हैरान था। उन्होंने एक दृढ़ संकल्प कमांडर की तरह पार्टी का नेतृत्व किया और कार्यकर्ताओं के भीतर यह भरोसा मज़बूती से भरा कि कांग्रेस भाजपा को परास्त कर सकती है, और ऐसा हुआ भी।’

धर्माणी के मुताबिक, प्रियंका ने पहाड़ी राज्य के मुद्दों को बहुत अच्छे से समझा और उन पर मज़बूती से टिके रहने का मंत्र वरिष्ठ नेताओं को दिया। राहुल गाँधी भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिये यह जान चुके हैं कि जनता के बीच जाकर वह अनुभव बटोर सकते हैं, जनता और देश के मुद्दों को और बेहतर तरीक़े से समझ सकते हैं और पार्टी और ग़ैर भाजपा विपक्ष में अपनी नेतृत्व क्षमता के प्रति भरोसा जगा सकते हैं। राहुल तमाम मुद्दों पर पहले भी बोलते थे; लेकिन यात्रा के दौरान उनके जनसभाओं में सीधे जनता से संवाद करने से अलग ही माहौल बनता है। राहुल के नज़दीकी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस और गाँधी इसे जारी रखना चाहते हैं।

राज्यों पर नज़र

कांग्रेस के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती राज्यों में जीत हासिल करने की है। भाजपा अपने पक्ष में सारा माहौल राज्यों में जीत हासिल करके बनाती है। जीत के बाद वह कहती है कि उसके और उसके नेतृत्व (प्रधानमंत्री मोदी) के सामने कोई गम्भीर चुनौती नहीं है। लेकिन हिमाचल में भाजपा को हराने के बाद कांग्रेस ने समझा लिया है कि उसे भी राज्यों में और जीत हासिल करनी होगी, तभी उसके लिए 2024 की राह से काँटे हट जाएँगे।

कांग्रेस के बड़े नेताओं की मानें, तो पार्टी नेतृत्व राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे इस साल के बड़े चुनावी राज्यों में अपने बूते पूरी ताक़त झोंकने की तैयारी कर रही है; जबकि तेलंगाना, जम्मू कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में वह अपनी स्थिति सुधारने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ सहयोग कर ज़मीन मज़बूत करना चाहती है। पंजाब से सबक़ सीखते हुए कांग्रेस ने राजस्थान में अशोक गहलोत को बनाये रखा है और इसके पीछे कारण चुनाव से पहले पार्टी को भीतरी लड़ाई से बचाना है। सचिन पायलट को भरोसा दिया गया है कि वह धीरज बनाये रखें, उन्हें बड़ा अवसर अवश्य मिलेगा। सचिन इससे सन्तुष्ट दिखते हैं, भले गहलोत के कुछ बोल उन्हें पीड़ा दे गये थे। मल्लिकार्जुन खड़े के अलावा प्रियंका और राहुल गाँधी ने भी सचिन और गहलोत की दूरियों को कम किया है।

पार्टी को कर्नाटक में बहुत उम्मीद है। राहुल को भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राज्य में काफ़ी जनसमर्थन मिला था। वहाँ भाजपा की सरकार है और कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री बनाये गये बसवराज सोमप्पा बोम्मई भाजपा को उस ऊँचाई पर नहीं ले जा सके हैं, जहाँ पार्टी उनके भरोसे चुनाव जीतने की उम्मीद करे। इसके अलावा वहाँ कई विवाद देखने को मिले हैं, जिनसे भाजपा को नुक़सान हो सकता है। कांग्रेस कर्नाटक में इस कारण से भी बेहतरी की उम्मीद कर रही है, क्योंकि उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े कर्नाटक से ही हैं।

भाजपा कर्नाटक में आरक्षण के चक्रव्यूह में फँसी है। दो बड़े समुदाय लिंगायत और वोक्कालिगा आरक्षण बढ़ाने की माँग कर रहे हैं। माँग पूरी नहीं हुई, तो भाजपा के लिए राजनीतिक संकट बढ़ेगा। एंटी इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार वहाँ भाजपा के लिए मुश्किल बन सकते हैं। लिहाज़ा कांग्रेस अपना रास्ता खुलता देख रही है। हालाँकि राज्य कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के बीच लड़ाई है। के. चंद्रशेखर राव अपनी पार्टी बीआरएस का देवेगौड़ा के जेडीएस को समर्थन दे चुके हैं। कांग्रेस को इन सबसे रास्ता निकलना पड़ेगा।

मध्य प्रदेश कांग्रेस के लिए चुनौती है, जहाँ उसने 2018 के आख़िर में विधानसभा चुनाव जीता था; लेकिन माधवराव सिंधिया पार्टी छोड़ भाजपा में चले गये, जिसके बाद भाजपा ने दलबदल करवाकर कांग्रेस की सत्ता छीन ली थी। कांग्रेस के बड़े नेताओं कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव, अजय सिंह आदि पर पार्टी को जीत दिलाने का ज़िम्मा रहेगा।

छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 2018 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर काफ़ी मश$क्क़त झेली। हालाँकि भूपेश बघेल ने इन चार वर्षों में अपने नेतृत्व से सरकार और पार्टी को मज़बूत बनाये रखा है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अगले चुनाव में बघेल के चेहरे के साथ ही आगे बढ़ेगी। हालाँकि टी.एस. सिंह देओ, महंत चरण दास और ताम्रध्वज साहू जैसे नेता भी ज़मीन पर काफ़ी मज़बूत हैं। बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद पिछले चार साल में भाजपा वहाँ विपक्ष के रूप में ज़्यादा सक्रिय नहीं रही है।

तेलंगाना सीटों के लिहाज़ से बड़ा राज्य है; लेकिन कांग्रेस वहाँ अपनी जड़ें मज़बूत नहीं कर पा रही है। कांग्रेस से निकले केसीआर ज़मीन पर अपने पाँव जमाये हुए हैं और उन्हें चुनौती देने के लिए भाजपा कांग्रेस से आगे दिखती है। कांग्रेस और केसीआर का वोट बैंक चूँकि एक ही है, उनके कमज़ोर होने से ही कांग्रेस बेहतरी की उम्मीद कर सकती है।

राहुल गाँधी ने हाल के महीनों में तेलंगाना के दौरे किये हैं। उनकी भारत जोड़ो यात्रा के बाद पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव से पहले पार्टी लय हासिल कर लेगी। वहाँ तेलुगु देशम (टीडीपी) से आये रेवंथ रेड्डी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के ख़िलाफ़ पार्टी में नाराज़गी थी, जिसे दूर करने का ज़िम्मा दिग्विजय सिंह को दिया गया था। पूर्व अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी रेवंथ के विरोधी हैं। उनके अलावा कार्यकारी अध्यक्ष के जग्गा रेड्डी, वरिष्ठ नेता वी हनुमंत राव और सीएलपी लीडर मल्लू भट्टी विक्रमार्क भी रेवंथ के पक्ष में नहीं। हालाँकि यह माना जाता है कि राहुल गाँधी रेवंत के साथ हैं और उन्हें हटाये जाने की उम्मीद नहीं।

पार्टी अब चुनाव पर फोकस कर रही है और चाहती है कि सब मिलकर काम करें। दिसंबर में जब पीसीसी का गठन हुआ था, तब वरिष्ठ नेता और सांसद वेंकटा रेड्डी को बाहर रखा गया था। फ़िलहाल वहाँ पार्टी में शान्ति दिखती है और चुनाव की राणनीति बनाने का काम शुरू हो गया है। हालाँकि उसका रास्ता आसान नहीं है और उसे टीआरएस और भाजपा के अलावा राज्य में पैठ रखने वाले असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमएम से भी पार पाना होगा। कांग्रेस का कभी उत्तर पूर्व में एकछत्र राज था। अब उसे वहाँ क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ भाजपा की भी मुश्किल चुनौती झेलनी पड़ रही है।

इस साल उत्तर पूर्व के त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में विधानसभा के चुनाव हैं, जहाँ कांग्रेस की राह चुनौती भरी है। उत्तर पूर्व में त्रिपुरा की लड़ाई सबसे दिलचस्प है, जहाँ भाजपा सत्ता बनाये रखने के लिए जूझ रही है। वहाँ वामपंथी दल माकपा और भाकपा अपने गढ़ को वापस पाना चाहते हैं। कुल 60 सीटों वाले त्रिपुरा में माकपा और कांग्रेस धुर विरोधी रहे हैं। अब भाजपा की चुनौती दोनों के सामने है, जबकि क्षेत्रीय दल भी हैं। हालाँकि वहाँ इस बार कांग्रेस ने माकपा से गठबंधन कर लिया है। ऐसा होने से दोनों की साझी राजनीतिक ताक़त भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है। प्रोग्रेसिव रीजनल एलायंस (टिपरा मोथा) भी इन डॉन के साथ जुड़ सकता है। कांग्रेस को वहाँ अपने पुराने नेता भाजपा छोडक़र आये सुदीप रॉय बर्मन से उम्मीद है।

मेघालय में कांग्रेस पिछली बार के चुनाव में 21 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी; लेकिन 2023 में होने वाले चुनाव से पहले एक तरह से उसका सफ़ाया हो गया है। उसके पास एक भी विधायक नहीं है।

मुकुल संगमा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता थे; लेकिन अब टीएमसी में हैं। राज्य में 2018 चुनाव नतीजों के बाद एनपीपी की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी, जिसमें एनपीपी, यूडीपी, पीडीएफ, एचएसपीडीपी और भाजपा सहयोगी हैं। हालाँकि अगले चुनाव में यह एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मैदान में उतरेंगे। भाजपा सभी 60 सीटों पर लडऩे का ऐलान कर चुकी है। कांग्रेस वहाँ खोयी ताक़त फिर पाने की जंग लड़ रही है। जहाँ तक नागालैंड की बात है, वहाँ 2018 के चुनाव में एनडीपीपी 18 सीटें जीतकर आयी एनडीपीपी ने 12 सीटें जीतने वाली भाजपा की मदद से गठबंधन सरकार बनायी।

कांग्रेस को दिसंबर में तब झटका लगा, जब मेघालय के पूर्वी शिलांग से विधायक एंपरीन लिंगदोह ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी वहाँ भाजपा की सहयोगी है और सत्ता में है। कांग्रेस के लिए वहाँ चुनौती है। मिजोरम में भी इसी साल चुनाव हैं, जहाँ मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता में है। पिछले चुनाव में उसने 40 में से 26 सीटें जीतकर जोरामथांगा के नेतृत्व में सरकार है। कांग्रेस को फिर सरकार बनाने के लिए एमजेएफ से पार पाना होगा। कांग्रेस की लाल थनहवला के नेतृत्व में लगातार 10 साल सरकार रहने के बाद मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता में आयी है। लिहाज़ा कांग्रेस की मुख्य लड़ाई उसी से होनी है। उम्मीद है कि कांग्रेस पूर्वोत्तर के पार्टी नेताओं के साथ इन राज्यों में राहुल गाँधी की जनसभाएँ करेगी।