राम मंदिर जन्मभूमि में बनें: भागवत

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दिल्ली के विज्ञानभवन में आरएसएस प्रमुख ने कई भाषण दिए थे। उनमें उन्होंने कहा था कि आरएसएस के स्वयंसेवी किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। वे नहीं जानते इतने लोग क्यों सिर्फ भाजपा में ही आ रहे हैं। इस पहेली का जवाब जानने के लिए मोहन भागवत को विजयदशमी पर दिए जाने वाले खुद के भाषण का इंतजार कर लेना चाहिए था। विजयदशमी पर उन्होंने आज के तीन महत्वपूर्ण राजनीतिक विवादों पर अपना भाषण केंद्रित रखा। एक शहरी माओवादी (अर्बन माओइज्म), दो-सबरीमाला मंदिर में महिला प्रवेश और तीन राम मंदिर।

उन्होंने शहरी माओवादी का उपहास तक उड़ाया। सबरीमाला पर उन्होंने कहा कि हिंदु समाज पर बार-बार बेशर्मी से हमले होते हैं। उन्होंने मांग की एक कानून बने जिससे राम मंदिर ‘जन्मभूमिÓ में बने। इतने नज़रिया, इतने विचारों और इतनी आकांक्षाओं के चलते यह आश्चर्य ही होगा यदि आरएसएस का कोई स्वयं सेवक भाजपा के लिए साथ-साथ काम न करने लगे।

भागवत ने विजयदशमी के अपने भाषण का समापन भारतीय होने और हिंदू होने के एकात्मवाद पर किया। सितंबर में दिल्ली में हुई भाषण शृंखला के दूसरे दिन भी उन्होंने अपने लंबे भाषण में इसी तर्क पर ज़ोर दिया था। उस भाषण के बाद और अब दशहरा पर उनके भाषण को सुनने वाले को चाहे वे अंदर हों या बाहर यह आश्चर्य ज़रूर होता है कि आखिर यह विदा हिंदू क्यों है।

आरएसएस के वर्तमान प्रमुख अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में तीन तरह से अलग नज़र आते हैं। एक, संगठनात्मक विश्वास जिसे आरएसएस ने हासिल कर लिया है। इसे पता है कि इसके अपने सिद्धांतों को पहले की तुलना में अब ज्य़ादा मान्यता हासिल है। इस कारण इसे बौद्धिक तौर पर पहले की तुलना में ज्य़ादा दखल देना चाहिए। दूसरे, भागवत अनुकूल होने में पटु हैं। वे राजनीतिक विवादों को साधारण और मान्य संदेशों में बदल देते हैं। यह कला ज़रूर यह तय करती है कि स्वयं सेवी तक संदेश ठीक पहुंचे और उसी समय वे प्रभावशाली तरीके से विवाद को बड़े आकार में बदल लेते हैं। सितंबर महीने में उनके भाषणों को शीर्षकों में लिखा गया। इसकी वजह यह नहीं थी कि वे आरएसएस के मूल विचारों को दुहरा रहे थे बल्कि वे विविधता की बात कर रहे थे। उनका विविधता पर बोलना यह जता रहा था कि बौद्धिक सोच के कितने करीब वे पहुंच रहे थे और उसको वे एक अलग मायना दे रहे थे। तीसरे, गोलवलकर को खारिज करके भागवत खुद को ज्य़ादा ‘बोल्डÓ  बता रहे थे। उसमें भी उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवको को तरजीह दी। उन्होंने इसमें भी यह अंतर रखा संदर्भ और शाश्वत दिया कि गुरू जी गलत नहीं थे। जो कुछ गुरू जी ने कहा उसका भी संदर्भ था। तर्क के इस सिद्धांत से भागवत को र्शीषकों में वह महत्ता मिली मानों वे एक सुधारक हैं साथ ही उन्हेें यह अनुमति भी मिल गई कि वे ही मूल तौर पर उसे बनाने वाले हैं।

फिर मोहन भागवत का स्थान क्या होगा? विजयदशमी पर उनका भाषण और सितंबर में उनके व्याख्यानों की शृंखला से यह साफ हो गया था कि वे राजनीतिक तौर पर समझदार हैं साथ ही राजनीतिक तौर पर आरएसएस प्रमुख तो हैं ही इसमें वे बालासाहब देवरस के ही पदचिन्हों पर चल रहे हैं। भागवत की राजनीति विविध रही है। वह कांग्रेस से बातचीत के लिए रास्ते खुले रखना चाहते हैं। उन्हें अच्छी तरह आभास है कि भाजपा की आलोचना के खतरे क्या होंगे इसलिए वे सरकार की आलोचना करने से कतराते भी नहीं। यह है वह समय जब आरएसएस के लिए ज़रूरी है कि मजबूत भाजपा सरकार हो जो तमाम किस्म के हिंदुओं को एकजुट कर सके। इसीलिए उन्होंने दशहरा भाषण में यह भी कहा कि वोट न देना अच्छा मौका नहीं है।

भागवत सिर्फ आरएसएस के कार्यकर्ता से वोट मांगने तक सीमित नहीं है बल्कि उनका तरीका सावरकर के विचारों की तरह है जहां उनके विचारों को मानने पर ज़ोर होता है। वे घुमावदार तरीके से, विवादी फिर भी साफ संदेश देते हैं कि हिंदुत्व के मायने क्या है? विजयदशमी के भाषण में भी ज्य़ादातर बातें सामान्य ही थीं मसलन सैनिक तैयारी में सुरक्षा और आत्म निर्भरता आदि जो ताकतवर संदेश था वह ‘हमÓ हिंदुओं के लिए था। महत्वपूर्ण शब्द थे ‘स्वÓ जो राष्ट्र के लिए और हिंदू पहचान के लिए था। यह बात और ज्य़ादा साफ होती है जब सितंबर में दूसरे भाषण में यह ज्य़ादा साफ होता है।

व्यंग्य ही सही, पर आरएसएस प्रमुख ने अपनी चतुराई से दूसरे भाषण पढ़ते हुए आलोचकों पर्यवेक्षकों को अपने वैविधापूर्ण भाषण से चमत्कृत कर दिया। उनके दूसरे भाषण को बड़े ही ध्यान से यदि रखा जाए तो जाहिर होता है कि वह लगातार हमारी परंपरा को याद करते हैं कि भारत के सभी धर्म हमारी परंपरा से उपजे हैं। सभी भारत से निकले संप्रदायों का जो सामूहिक मूल्य बोध है उसका नाम हिंदुत्व है। हिंदुत्व नाम है उस सामूहिक विचारधारा का जो भारत में पनपा। यानी हिंदू बहुत बाद की विचार है। वे इंडिक, भारत और आर्य से उसकी तुलना करते हैं। वे इतनी विविधता लिए हुए बाहु परंपरा और वर्ग का उल्लेख विशाल ‘हिंदूÓ राष्ट्र में करते हैं। इसका कुल उद्देश्य है कि इन परंपराओं और विधियों को ‘हिंदूÓ में समाहित करना। यानी एक ऐसी अखिल हिंदू पहचान बनाना जो विविधता से परिपूर्ण है।

हिंदुत्व की राजनीति ही बड़ी राजनीति है। इसके जरिए दो चुनौतियों के समाधान का प्रयास होता है। एक ओर तो यह वहां जन्मे संप्रदायों में ‘एकाÓ की बात करते है। जैसा मोहन भागवत जी ने सवाल-जवाब के दौर में विज्ञान भवन  में कहा था। हर एक (आदिवासी भी) हिंदू है। कुछ इसे जानते-मानते हैं और गर्व से कहते भी हैं। कुछ हैं जो इसे जानते तो हैं लेकिन वे इसे स्वीकार करनें में हिचकिचाते हैं। और कुछ हैं जो इसे जानते ही नहीं है। इस कारण बनाया जाता है ‘हिंदुत्वÓ यानी भारत में शामिल सभी भारतीय संप्रदाय आस्थाएं और विचार। फिर उन्हें ‘हिंदुत्वÓ के ताने-बाने में शामिल कर लिया जाता है और उसे एक ताकतवर राजनीतिक पहचान दी जाती है।

दूसरी ओर, इस राजनीति के जरिए यह बताया जाता है ‘हिंदुत्वÓ का धर्म (आस्था, रीति-रिवाज पूजापाठ) से कोई लेना-देना नहीं बल्कि सिर्फ राष्ट्र से है। इस कारण ‘जो हिंदू हैं कहने से हिचकिचातेे हैंÓ उन्हें प्रेरित किया जाता हैं कि वे किसी भी आस्था पर आधारित नहीं राष्ट्रीय हिंदू की पहचान ले लें। लेकिन यह एक चाल है। यदि कोई यहीं जन्मे किसी धर्म-संप्रदाय को नहीं मानता तो भी उसे मानना होगा कि गाय पवित्र है। भले ही मुंह पर कहा जाता है कि गौ रक्षकों  के समूह को सजा दी जाएगी। भागवत ने विज्ञानभवन में कहा था कि हर हाल में गाय पारपंरिक विश्वास का मुद्दा है (परंतु गाय परंपरा श्रद्धा का विषय तो है ही)। भागवत हिंदुओं की धार्मिक भावना से हिंदू-भारतीय राष्ट्रवाद को अलग नहीं कर पाते। इसी कारण उनके नवीनतम भाषण में अयोध्या की विवादित भूमि पर श्रीराम की जन्म भूमि पर भव्य राममंदिर बनाने की बात उठाई जाती है क्योंकि श्रीराम ही देश की जीवन ऊर्जा के व्यक्तित्व पुंज हैं।

विज्ञानभवन से रेशिमबाग तक वही कसिस्टैंटिली, कन्फयूजिंग राजनीति मुखर होती रहती है जो आरएसएस की कोर परियोजना है। मोहन भागवत को शायद इसलिए याद किया जाए क्योंकि वे अपनी बात साफ-साफ कहने वाले और साहसी प्रवक्ताओं मेें एक हैं। साफ और स्पष्ट कहना भी उनका शौर्य प्रयास है जिसमें वे बताते है कि हिंदुत्व का धर्म से कोई लेना-देना नहीं और इसकी तात्पर्य उस दावे से ही संबंधित है कि हिंदुत्व धार्मिक भावना और परंपरा है।

यानी आरएसएस बदल रहा है। आरएसएस बदल भी नहीं रहा है।

साभार: इंडियन एक्सप्रेस