राज्यों और नेताओं की जंग में उलझी कांग्रेस

कांग्रेस आलाकमान के लिए दिक़्क़त यह है कि उसकी अपनी स्थिति यह कहती है कि मुख्यमंत्री के रूप में बघेल जनता का भरोसा जीतने में सफल रहे हैं। पार्टी को लगता है कि ऐसी स्थिति में बघेल का जाना पार्टी को महँगा भी पड़ सकता है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि सिंहदेव परिपक्व राजनीतिक नेता हैं और राज्य को सँभालने की क्षमता रखते हैं। लेकिन जनता में जैसी छवि बघेल बनाने में सफल रहे हैं, उससे ज़मीन पर कांग्रेस सत्ता के क़रीब तीन साल बाद भी विरोधी भाजपा के मुक़ाबले काफ़ी मज़बूत दिखती है। हालाँकि वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम से उसे नुक़सान की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कांग्रेस की इस लड़ाई को देखते हुए भाजपा ने अभी से जनता के बीच जाना और कार्यक्रमों का आयोजन करना शुरू कर दिया है। भाजपा देख रही है कि यदि कांग्रेस की जंग बढ़ती है, तो सत्ता में उसके लौटने का रास्ता खुल सकता है। पिछले चुनाव में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को तीन-चौथाई बहुमत मिला था, लिहाज़ा उसकी सरकार काफ़ी टिकाऊ रही है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि बघेल सरकार चुनाव से पहले किये वादों पर काम भी कर रही है। लिहाज़ा भाजपा के पास सरकार की निंदा करने के कोई ज़्यादा मुद्दे थे नहीं थे; लेकिन कांग्रेस के दो बड़े नेताओं के बीच सत्ता की लड़ाई से मानों भाजपा की लॉटरी निकल गयी है।

सिंहदेव और बघेल के बीच इस उठापटक से जनता में यह सन्देश जा रहा है कि कांग्रेस के नेता कुर्सी के भूखे हैं। भाजपा यही चाहती थी कि कांग्रेस के बीच ही ऐसे समीकरण बनें कि उसे जनता के बीच बघेल सरकार की खिंचाई करने का मसाला मिल जाए। यह अब उसे मिल गया है और उसने जन भागीदारी वाले कार्यक्रमों के ज़रिये सरकार पर हमले तेज़ कर दिये हैं। कांग्रेस के लिए इस सरकार के सफलता इसलिए भी ज़रूरी है कि उसे 15 साल के लम्बे अंतराल के बाद छत्तीसगढ़ में सत्ता हासिल हुई है।

नेताओं के बार-बार दिल्ली जाने से राज्य की परियोजनाओं और विकास कार्यों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और इसका सीधा असर जनता पर पड़ेगा। कांग्रेस के नेता इसे राजनीति की सामान्य प्रक्रिया बताते हैं और उनका कहना है कि यह सब प्रजातंत्र का हिस्सा है। लेकिन राज्यों में कांग्रेस नेताओं की लड़ाई से आलाकमान की पेचीदगियाँ बढ़ गयी हैं। छत्तीसगढ़ में 2023 में विधानसभा के चुनाव होने हैं और उससे पहले नेतृत्व परिवर्तन से कांग्रेस को नयी शुरुआत करनी पड़ेगी।

छत्तीसगढ़ को लेकर कांग्रेस में यही साफ़ नहीं है कि क्या विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर ढाई-ढाई साल का कोई समझौता हुआ था या नहीं? सिंहदेव के समर्थक इस समझौते के आधार पर ही मुख्यमंत्री पद का दावा कर रहे हैं, जबकि बघेल का ख़ेमा कह रहा है कि ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं है। पिछले तीन महीने में कांग्रेस में यही जंग चल रही है। देश की सत्ता में इतने दशक तक रही कांग्रेस की इस स्थिति को दयनीय ही कहा जाएगा।

पिछले दो महीने में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छ: बार से ज़्यादा दिल्ली इसी सिलसिले में जा चुके हैं। उधर मुख्यमंत्री पद पर नज़र गड़ाये बैठे सिंहदेव भी कई बार दिल्ली जा चुके हैं। दिलचस्प यह है कि पार्टी के विधायक और मंत्री भी अपने-अपने नेताओं के साथ दिल्ली पहुँच जाते हैं। ज़ाहिर है इसका असर सरकार के कामकाज पर भी पड़ा  है। कांग्रेस इसे समझ नहीं रही या समझ के भी अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार रही है, यह पता नहीं।

राजस्थान में एक साल से ज़्यादा हो चुका है। सचिन पायलट की पार्टी में अपनी अवस्था को लेकर कुछ माँगें थीं; लेकिन इनका समाधान नहीं हो पाया है। उनके समर्थक विधायकों की शिकायत है कि सरकार में उनकी चलती नहीं, क्योंकि अफ़सर उनकी सुनते नहीं। मंत्रियों की सुझायी परियोजनाएँ ठण्डे बस्ते में पड़ी हैं।

अब यह साफ़ हो चुका है कि कांग्रेस के भीतर सोनिया गाँधी और राहुल-प्रियंका की पसन्द के नेताओं के बीच लकीर खिंच चुकी है। पंजाब से लेकर छत्तीसगढ़ और राजस्थान तक यह लड़ाई शुरू हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि 10 जनपथ और राहुल और प्रियंका के बीच कोई खाई पैदा हो गयी है। यह लड़ाई प्रदेश स्तर के नेताओं के मामले तक सीमित है, जहाँ सोनिया गाँधी पुराने नेताओं को खोना नहीं चाहतीं; जबकि राहुल गाँधी अपनी एक टीम खड़ी करना चाहते हैं। लेकिन इसी चक्कर में कांग्रेस की फ़ज़ीहत हो रही है और भाजपा उसका मज़ाक़ उड़ा रही है।

 

कांग्रेस में प्रशांत किशोर आएँगे?

कांग्रेस के बीच आजकल चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की बड़ी चर्चा है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के राजनीतिक सलाहकार के पद से इस्तीफ़े के बाद उनके कांग्रेस में शामिल होने के कयास लगाये जा रहे हैं। कांग्रेस के नेता इस मसले पर बँटे दिखायी दे रहे हैं। विरोध करने वालों का मानना है कि एक ग़ैर-राजनीतिक चुनावी रणनीतिकार को एक नेता के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाल में वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के घर पर एक बैठक हुई थी, जिसमें प्रशांत किशोर के कांग्रेस में आने की ख़बरों पर भी चर्चा हुई थी। कहते हैं कि कुछ नेताओं ने इस पर विरोध किया था और उनका कहना था कि राजनीति की दिशा राजनीतिक तय करते हैं; चुनावी रणनीतिकार नहीं। हालाँकि इसी बैठक में ऐसे नेता भी थे, जिन्होंने किशोर को पार्टी के लिए लाभकारी बताया और इस बात का समर्थन किया कि उन्हें कांग्रेस में आना चाहिए। ‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल करने के लिए बाक़ायदा सलाह कर रहा है; ताकि सबकी राय जानी जा सके। दो वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी और अंबिका सोनी नेताओं से बातचीत करके जल्दी ही एक रिपोर्ट आलाकमान को देंगे।

 

समितियों का गठन

28 August 2021 Amritsar
The renovated Jallianwala Bagh Martyrs’ Memorial, which has been inaugurated via video conference by Indian Prime Minister Narendra Modi, is seen illuminated in Amritsar on Saturday.
PHOTO-PRABHJOT GILL AMRITSAR

आने वाला समय कांग्रेस के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। संगठन को सक्रिय करने के लिए सोनिया गाँधी ने हाल में दो समितियों का गठन किया है, जिसमें मनमोहन सिंह के नेतृत्व में एक समिति में जी-23 के नेता गुलाम नबी आज़ाद और दो अन्य नेता भी शामिल हैं। इसके अलावा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मुद्दों पर देशव्यापी आन्दोलन चलाने के लिए भी एक समिति का गठन किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि मध्य प्रदेश की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति में मज़बूत किया जा रहा है। कमलनाथ पहले से ही दूसरे दलों से बातचीत के मामले काफ़ी सक्रिय रहे हैं।