राजीव गांधी हत्याकांड और नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश में समानता का मुद्दा

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केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अभी हाल दिल्ली में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के आला अधिकारियों की बैठक ली। उन्होंने यह समीक्षा बैठक राजीव गांधी सरीखी घटना न होने देने के लिहाज से की। उन्होंने यह बैठक प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की माओवादी धमकी के संदर्भ में बुलाई थी। अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई अंदेशा वाकई है जिसके चलते एक घटना के बहाने दूसरी घटना को ध्यान में रख कर सरकार विचार करे।

महाराष्ट्र पुलिस से सरकार को कुछ मुद्दे मिले। मसलन कार्यकर्ता रोनी विल्सन के दिल्ली के आवास की तलाशी के दौरान ऐसी जानकारी मिली है जिससे यह जानकारी मिली है कि राजीव  गांधी की हत्या की ही तरह क्या प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश संभव है। विल्सन को भीमा कोरेगांव हिंसा में भूमिका निभाने के आरोप में दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसी योजना से साफ इंकार किया है। उन्होंने अनुरोध किया है कि इसकी जांच कराई जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी पत्र के होने की संभावना नहीं है। यह सिर्फ हमदर्दी पाने के लिए ऐसी बात कही गई है। उन्होंने कहा कि भाजपा को जब यह लगा कि वे अपना लोकप्रिय समर्थन खो रहे हैं तो उन्होंने ऐसी साजिश की बात गढ़ी। उधर कांग्रेस ने मांग की है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न किया जाए।

शिवसेना ने भी ऐसे किसी कथित माओवादी पत्र के होने की संभावना से इंकार किया है कि ऐसी कोई साजिश थी जिसमें राजीव गांधी हत्याकांड की घटना का दुहराव हो यह पूरी कहानी एक आतंकवादी कहानी है जिसे सुनकर सिर्फ हंसा जा सकता है। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामनाÓ में यह लिखा गया। चुनाव के मौके पर ऐसा जिक्र अमूमन होता ही है।

राजीव के संबंध में पहली जानकारी

राजीव गांंधी के बारे में जो पहली बात पकड़ में आई उसमें लिखा है कि राजीव गांधी अवरु दे मंडलाई एडीपोडलम। डंप पन्निडुंगो। मरानाई वेचिडुंगो (राजीव गांधी का सिर, फिर उड़ा दो, उसे खत्म कर दो, उसे मार डालो)। यह बात उभरी थी तमिल ईलम, एक सरकार समर्थक अर्धसैनिक संगठन के वायरलेस संदेश से। इसका संबंध एलटीटीई से था। इसे पहली बार 1990 की अप्रैल में सुना गया था। इसकी तत्कालिक सूचना इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (आईपीकेएफ) को श्रीलंका में दी गई थी। उसके बाद खुफिया एजेंसी इस वायरलेस संदेश की तहकीकात में जुट गई थीं। उन्होंने चेन्नई और जाफना के उन गैर अधिकृत स्टेशनों का भी जनवरी 1991 में पता लगा लिया गया था। लेकिन इसके कोड का पता नहीं लग सका। फिर राजीव की हत्या तक कोई संदेश नहीं मिला। उनकी हत्या के बाद सीबीआई की विशेष छानबीन टीम ने महीनों की अपनी जांच पड़ताल में संदेश कोड खोलने में कामयाबी पाई और पाया कि इसमें एलटीटीई की भागीदारी है।

मोदी के खिलाफ साजिश

अब लगभग 27 साल बाद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद वह घटना एक पत्र में फिर याद की जाती है। जिसे पुणे पुलिस ने दिल्ली के एक कार्यकर्ता रोनी विल्सन के कंप्यूटर से हासिल किया। विल्सन और विस्थापन विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ता महेश राऊत, नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोभा सेन, नागपुर के ही एक वकील सुरेंद्र गाडलिंग और मुंबई के कार्यकर्ता सुधीर ढावले को दिल्ली, नागपुर और मुंबई से गिरफ्तार किया गया। इस पूरे मामले ने एक नया तूल तब पकड़ लिया जब मीडिया के एक वर्ग ने वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की संभावना की कथित साजिश का पता लगा लिया और राजीव गांधी हत्याकांड से उसकी समानता की जानकारी हासिल कर ली। फिर इस संबंध में कथित दोषियों की गिरफ्तारी हुई।

अलगाव?

राजीव गांधी की हत्या का मामला एक ऐसे संचार से जुड़ा था जो गंभीर तौर पर कोडेड था। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साजिश की जो बात है उसमें कतई कोई गोपनीयता नहीं है। विल्सन के कंप्यूटर से जो माओवादी पत्र मिलने की बात है उसमें घटना का स्पष्ट उल्लेख है और राजनीतिक नेताओं के नाम हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी उल्लेख है। महाराष्ट्र पुलिस के डायरेक्टर जनरल सतीश माथुर ने बताया कि पत्र विश्वसनीय है।

आंध्रप्रदेश की खुफिया विभाग के एक उच्च स्तरीय आईपीएस अधिकारी जिनकी माओवादी पर विशेषज्ञता है उन्होंने भी यह कहा कि ‘माओवादी पत्र लिखते हैं लेकिन वे इतने लंबे चौड़े पत्र नहीं लिखते। एम-4 बंदूकों और चार लाख चक्र बुलेट खरीदने का ब्यौरा और प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जैसी बातें भी विश्वसनीय नहीं लगती। उन्होंने कहा, ‘मैंने अपने पूरे जीवन में माओवादियों के पत्र देखे हैं लेकिन ऐसा पत्र पहली बार ही देखा।Ó  फारेंसिक महकमे के एक अधिकारी ने कहा, हमने पत्रों की कोई छानबीन नहीं की है। हमने सिर्फ हार्ड डिस्क और दूसरे डिवाइस की क्लोनिंग की है। हम यह भी नहीं जानते कि पत्र हाई डिस्क में था भी या नहीं।

सशस्त्र सीमा बल के पूर्व महानिदेशक एमवी कृष्णराव जो सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी भी रहे हैं, उनका कहना रहा कि तमाम सीपीआई (माओवादी) उन लोगोंं को नहीं बहाल करते जो सार्वजनिक तौर पर जाने जाते हैं। ये पांचों लोग और प्रकाश अंबेडकर जिनका उल्लेख इस पत्र में है वे सभी जनजीवन में जाने जाते है। माओवादी ऐसे लोगों की कभी अपने साथ नहीं जोड़ते जो कुछ मशहूर हों।

‘पार्टी या सेंट्रल कमेटी का सदस्य होने वाले के सामने यह दुविधा हमेशा रही है कि उसे कोई भी न पहचाना हो। जहां तक मेरी जानकारी है छह-सात साल से सेंट्रल कमेटी का कोई सदस्य कप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करता। यदि इस बीच उन्होंने फिर शुरू किया हो तो यह बात मेरी जानकारी में नहीं है। सेंट्रल कमेटी के सदस्य उस तरीके को भी नहीं अपनाते कि ई मेल के जरिए संदेश भेजें। वे सेंट्रल कमेटी के 2-3 विश्वसनीय लोगों के जरिए संदेश भेजते हैं। जिनका काम आम संदेश पहुंचाना होता है। ये संदेश भी एक या दो लाइन के ही होते हैं। एक साधारण आदमी तो उन्हें समझ भी नहीं सकता। क्योंकि शब्दों में ही होते हैं ‘छिपे होते है अर्थ भीÓ, राव ने बताया।

इन तमाम टिप्पणियों और अनुभवों से लगता है कि असल मामला कुछ और है जिनकी छानबीन की जानी चाहिए।