राजनीति में कितनी संस्कृति?

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दुर्भाग्य से आज हम धीरे-धीरे ऐसे ही समाज में बदलते जा रहे हैं- ऐसे स्मृतिविहीन समाज में जिसके  लिए विकास का मतलब चिकनी-चौड़ी सड़कें, चमचमाते मॉल और बहुमंजिला इमारतें भर हैं. हम यह भी सोचने को तैयार नहीं हैं कि यह विकास किन शर्तों पर आ रहा है, किन वर्गों द्वारा लाया जा रहा है और अंततः कैसे वह हमें एक आक्रामक, सरोकारविपन्न और आत्महीन उपभोक्ता समाज में बदल कर छोड़ दे रहा है. इस समाज में श्रेष्ठता की एकमात्र कसौटी कारोबारी किस्म की सफलता है और आगे बढ़ने की आपाधापी में सबकुछ को छोड़ सकने की, हर किसी को छल सकने की कुशलता है. यही वजह है कि लड़ाई चाहे सांप्रदायिकता के खिलाफ हो या सामाजिक न्याय के पक्ष में, भ्रष्टाचार के खिलाफ हो या पारदर्शिता के पक्ष में- वह सिर्फ राजनीतिक नारों में बदल कर रह जा रही है, वह धरातल पर न लड़ी जा रही है, न उसे लड़ने का कोई इरादा दिख रहा है. सिर्फ साधनों और सफलता के पीछे भागते ऐसे बेजान और विपन्न समाज जब अपनी मुक्ति की राह खोजते हैं तो वे बस किसी मसीहा का इंतजार करते हैं जो दरअसल सबसे पहले उन लोगों को कुचलता है जिन्होंने उसका रास्ता बनाया है. यह भी इन दिनों हम होता हुआ देख रहे हैं.

बेशक, ऐसा समाज सिर्फ राजनीति ने नहीं, हमने भी बनाया है. हमारे राजनीतिक नारों में दिखाई पड़ने वाला खोखलापन, हमारे राजनीतिक आश्वासनों में झलक पड़ने वाली बेईमानी शायद इसलिए भी है कि हमने शब्दों का अवमूल्यन कर डाला है, कला को बाजार के हवाले कर दिया है और मुक्तिबोध के शब्दों में ऐसे ‘कीर्ति व्यवसायी’ हो गए हैं जिनके लिए कविता-कहानी या कोई भी साहित्यिक उद्यम अपने लिए छोटे लाभ अर्जित करने का जरिया भर रह गए हैं.

लेकिन राजनीति और साहित्य के बीच घटती इस दूरी का, लोकतंत्र के महापर्व में वास्तविक संस्कृति की अनुपस्थिति का खामियाजा सिर्फ लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को नहीं, पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा. राजनीति के एजेंडे पर संस्कृति हो और वह सच्चे अर्थों में हो, यह जरूरी है. क्योंकि ऐसा कोई सांस्कृतिक एजेंडा होगा और उसको देखने की मजबूरी होगी तभी यह बात समझ में आएगी कि लोगों के होने का क्या मतलब होता है, उनकी खुशहाली की परिभाषा क्या होती है और कैसे हम विकास के इस्पाती बियावानों में भटकते जानवरों की तरह नहीं, मनुष्य की तरह एक स्वस्थ समाज की कल्पना और कामना कर सकते हैं. सवाल है, राजनीति यह एजेंडा लाएगी क्यों? यह काम तो अंततः संस्कृति के मोर्चे पर ही करना होगा- आखिर हमारे एक पुरखे ने ही कहा है कि साहित्य समाज के आगे जलने वाली मशाल है.

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