यूरोप के अनाथ भारतवंशी

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माना जाता है कि यूरोप में रोमा-सिंती समुदाय के एक करोड़ से भी अधिक लोग रहते हैं.

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सारा हैकान्सन सिर्फ दो साल की एक बच्ची है. सितंबर, 2013 में वह सारे स्वीडन में चर्चा का विषय बन गई. हुआ यह कि अगस्त, 2011 में, जब वह मात्र तीन महीने का नवजात शिशु थी, उसका नाम पुलिस के एक गोपनीय डाटाबैंक में दर्ज हो गया. डाटाबैंक के सभी पांच हजार नाम रोमा कहलाने वाले जातीय अल्पसंख्यकों के हैं. उन्होंने कुछ किया नहीं था. उनका रोमा होना ही काफी था. भारतीय मूल वाली लगभग 40 हजार जनसंख्या की यह बिरादरी पिछले 500 वर्षों से स्वीडन में रह रही है.

स्वीडिश दैनिक ‘दागेन न्यिहेतर’ ने ‘घुमंतू जन’ शीर्षक वाले इस डाटाबैंक का रहस्योद्घाटन किया था. पुलिस ने पहले तो इस डाटाबैंक के अस्तित्व से ही इंकार कर दिया. बाद में उसने कहा कि यह अपराधों की रोकथाम के विश्लेषण में काम आता है. उसमें संबद्ध व्यक्ति के 19वीं सदी तक के पूर्वजों का भी रिकॉर्ड रखा जाता है. अखबार ने एक और डाटाबैंक खोज निकाला. उसमें 10 साल से कम के 106 बच्चों सहित 997 रोमा लोगों का विवरण दर्ज था. याद रहे कि नोबेल पुरस्कारों का देश स्वीडन संसार के सबसे खुशहाल, सुशासित और भ्रष्टाचार-मुक्त कल्याणकारी देशों में गिना जाता है.

15 साल की लेओनार्दा दिब्रानी नौ अक्टूबर, 2013 को, पूर्वी फ्रांस के लेवियेर में अपने स्कूल के दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने जा रही थी. पुलिस ने स्कूल-बस रास्ते में ही रोक ली. लेओनार्दा को बलपूर्वक बस से उतार लिया गया और तुरंत ही उसे शेष परिवार के साथ कोसोवो भेज दिया गया. लेओनार्दा का रोमा का परिवार कोसोवो से ही आया था और पांच साल से फ्रांस में शरण लेने की कोशिशें कर रहा था. किस्सा यहीं खत्म हो जाता. लेकिन, हजारों छात्रों ने लेआनार्दा के निष्कासन के विरुद्ध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. मामला तूल पकड़ने लगा. मीडिया ने भी सरकारी निष्ठुरता को आड़े हाथों लिया. बात यहां तक पहुंची कि राष्ट्रपति फ्रोंस्वा ओलांद को, 20 अक्टूबर के दिन, टेलीविजन पर कहना पड़ा कि लेओनार्दा यदि चाहे तो अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए ‘अकेले’ वापस आ सकती है. कोसोवो से लेओनार्दा का दो टूक उत्तर आया, ‘मैं अकेले फ्रांस वापस नहीं जाऊंगी, अपने परिवार को नहीं छोडूं़गी.’

सिर्फ 18 लाख जनसंख्या वाला मुस्लिम देश कोसोवो यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों के ‘नाटो’ सैन्य संगठन की सहायता से बना यूरोप का सबसे नया देश है. फरवरी, 2008 में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा से पहले वह सर्बिया का, और 1990 वाले दशक में यूगोस्लाविया के विघटन से पहले सर्बिया यूगोस्लाविया का हिस्सा हुआ करता था. 1999 में यूरोपीय संघ और नाटो की मदद से कोसोवो का कथित स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने पर वहां रह रहे एक लाख 20 हजार रोमा अल्पसंख्यकों में से ज्यादातर को भाग कर दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ी है.

कभी भारत से आए और पूर्वी यूरोप के देशों में सदियों से रहने वाले लाखों रोमा लोगों का जीना इन दिनों दूभर है. इन देशों की बहुमत जनसंख्या उन्हें ही अपने हर क्षोभ का कोपभाजन बनाती है. हर चोरी में, खासकर बच्चों के गायब होने में उन्हीं का हाथ देखा जाता है. नवंबर के शुरुआत में यूनान और आयरलैंड में पुलिस ने गोरे-चिट्टे रंग और सुनहले बालों वाले बच्चों को उनके घरवालों से इसलिए छीन लिया कि घरवाले रोमा थे. रोमा बच्चे आम तौर पर बहुत गोरे नहीं होते, इसलिए पू्र्वाग्रह-ग्रस्त पुलिस ने मान लिया कि ये गोरे बच्चे जरूर कहीं से चुराए गए हैं. लेकिन, डीएनए जांच ने दोनों मामलों में पुलिस को गलत ठहराया.

इस्तवान पिसोंत फुटबॉल खिलाड़ी था. उस की गणना हंगरी के सबसे होनहार फुटबॉल खिलाड़ियों में हुआ करती थी. 1980 वाले दशक में वह ‘होनवेद बुडापेस्ट’ क्लब के लिए खेला करता था. वह खेल-समीक्षकों से लेकर दर्शकों तक का दुलारा था. अपनी प्रसिद्धि को अपनी सिद्धि मान बैठा. 18 साल का होते ही एक टेलीविजन इंटरव्यू में कह बैठा कि उसके माता-पिता ‘रोमा’ हैं. इसके बाद तो वह फुटबॉल प्रेमियों की नजरों में ऐसा गिरा कि हीरो से जीरो बन गया. भद्दी फब्तियां कसी जानें लगीं, ‘साला बंजारा है…बंजारा…’ इस्तवान पिसोंत अपने देश के दर्शकों से दुखी होते हुए भी राष्ट्रीय ही नहीं, 31 अंतरराष्ट्रीय मैचों में भी खेल चुका है. कहता है, ‘हंगरी के कई नामी फुटबॉल खिलाड़ी रोमा हैं. पर, अपने अपमान और तिरस्कार के डर से वे कभी यह कहने की हिम्मत नहीं करते कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि रोमा बंजारों की है.’ हंगरी की करीब एक करोड़ की जनसंख्या में छह लाख रोमा हैं. उनके नाच-गाने तो पसंद किए जाते हैं, पर आए दिन हमले होना, उनके घर-बार जला देना और पुलिस द्वारा उन्हें तंग करना भी आम बात है. वहां के दक्षिणपंथी अतिवादी 2007 के बाद से 10 रोमा लोगों की हत्या कर चुके हैं.

लोकतंत्र में रोमा संत्रस्त
दो दशक पूर्व पूर्वी यूरोप की कम्युनिस्ट सरकारों के पतन के बाद से लोकतंत्र बन गए वहां के हंगरी और रोमानिया से लेकर स्लोवाकिया और चेक गणराज्य तक डेढ़ दर्जन देशों में भारतीय पूर्वजों की संतान रोमा लोगों की हालत बद से बदतर होती गई है. अपने आप को लोकतंत्र और कानून के राज का आदर्श नमूना मानने वाले जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली या स्वीडन जैसे पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी रोमा लोगों के लिए वह सामाजिक मान्यता व समानता सपना ही है जो इस बीच समलैंगिकों तक को पूरे आदर-सम्मान के साथ मिलने लगी है.

मुख्य रूप से जर्मन-भाषी देशों में सिंती कहलाने वाले लोग भी रोमा बिरादरी की ही एक उपजाति हैं. पर, वे रोमा हैं या सिंती हैं, पूर्वी यूरोप में हैं या पश्चिमी यूरोप में, निपट गरीब ही हैं. अनपढ़ हैं. बदनाम कर दिए गए हैं कि भीख मांगने या चोरी-उठाईगीरी करने के सिवा कुछ नहीं जानते. उन्हें पास-पड़ोस में फटकने तक नहीं दिया जाता. उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है. न कोई घर-द्वार मिलता है और न नौकरी-धंधा. यह सब पहले भी था. लेकिन, जब से पू्र्वी यूरोप के भूतपूर्व समाजवादी देशों में ‘लोकतंत्र’ आया है, तब से उनका अपमान और तिरस्कार पराकाष्ठा पर है. नौबत यहां तक आ गई है कि पू्र्वी यूरोपीय देशों के हजारों रोमा अपने साथ नस्लवादी भेदभाव, अपनी गरीबी और मजबूरी से तंग आ कर पश्चिमी यूरोप के जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड या बेल्जियम जैसे देशों में शरण मांगने लगे हैं. पर, कोई देश उन्हें शरण नहीं देना चाहता. भारत जैसे देशों को गाहे-बगाहे अल्पसंख्यकों के साथ न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा का उपदेश देने वाले यूरोपीय देश, अपने सारे आदर्श भुला कर, रोमा लोगों को निकाल बाहर करने की ही जुगाड़ में रहते हैं. फ्रांस के पू्र्व राष्ट्रपति निकोला सार्कोजी ने तो वहां 2012 वाले चुनावों से पहले अवसरवादिता की हद ही कर दी. उन्होंने रोमानिया से आए हजारों रोमा शरणार्थियों को यह सोच कर बैरंग वापस भेज दिया कि इससे फ्रांसिसी जनता बाग-बाग हो जाएगी और चुनाव में जीत पक्की हो जाएगी. हालांकि वे चुनाव फिर भी हार गए. जर्मनी के कुछ राजनेता भी शोर मचा रहे हैं कि देश भिखमंगे व जेबकतरे रोमा शरणार्थियों से भरता जा रहा है.

जर्मनी का रोमा इतिहास
जर्मनी का इतिहास यहूदियों के ही नहीं, रोमा और सिंती जनों के खून से भी सना हुआ है. हिटलर की तानाशाही के समय यूरोप के 60 लाख यहूदियों के जातिसंहार के पाप का प्रायश्चित करते रहना जर्मनी में शाश्वत राजधर्म बन गया है. लेकिन, इस बात पर यथासंभव पर्दा ही डाला जाता रहा है कि हिटलर के आदेश पर, यहूदियों की ही तरह, यूरोप भर में पांच लाख रोमा और सिंती भी मौत के घाट उतार दिए गए थे. आम जर्मनों की नजर में रोमा और सिंती, आज भी, कहीं न टिकने वाले घुमंतू बंजारे ही हैं. उनके लिए ‘त्सिगोएनर’ (बंजारे) या ‘फ़ारन्डे फ़ोल्क’ (घुमंतू जाति) जैसे हिकारत भरे शब्द आज भी इस्तेमाल किए जाते हैं.

‘त्सिगोएनर’ नाम से ही जर्मनी में पहली बार 1407 में हिल्डेसहाइम नगर के इतिहास में उनका उल्लेख मिलता है. शुरू में उन्हें तत्कालीन रजवाड़ों और सामंतों का संरक्षण भी मिला हुआ था, क्योंकि वे अच्छे हस्तशिल्पी, वाद्ययंत्र-निर्माता और आज्ञाकारी सैनिक हुआ करते थे. लेकिन 15वीं सदी का अंत आते-आते उनका व्यापक शोषण और दमन होने लगा. स्थानीय जर्मन हस्तशिल्पी उनसे जलने लगे. उन्हें गांवों-शहरों से दूर भागने के लिए विवश किया जाने लगा. ईसाई धर्माधिकारियों को भी यह पसंद नहीं था कि वे गैर-ईसाई देवी-देवताओं को पूजते थे. उनकी औरतें टोने-टोटके व भविष्यवाणियां करती थीं. लिंदाऊ और फ्राइबुर्ग के तत्कालीन शासकों ने तो यहां तक आदेश दे दिया कि जिसे अपनी जमीन-जायदाद पर कोई बंजारा दिखाई पड़ जाए, वह उसे मौत के घाट उतार सकता है. 1589 से तत्कालीन जर्मनी के कई प्रदेशों में पुलिस को यह अधिकार था कि वह बंजारों का माल-सामान छीन कर उन्हें खदेड़ बाहर कर सकती है. इस तरह उन्हें दर-दर भटकने और खानाबदोशों की तरह रहने पर मजबूर होना पड़ा.

वे बच्चे उठा ले जाते हैं
18वीं-19वीं सदी में यूरोप के जर्मन-भाषी क्षेत्रों में उन्हें एक जगह टिकाने-बसाने का विफल प्रयास भी हुआ. विफलता का एक बड़ा कारण यह भी था कि तत्कालीन ऑस्ट्रिया में, 1773 के बाद से, रोमा-सिंती बंजारों के बच्चों को उनसे छीन कर कोई रोजगार सिखाना और बाद में सेना में भर्ती किया जाने लगा. इससे होता यह कि बच्चे अपने माता-पिता के पारंपरिक हस्तशिल्पों से कट जाते और उन पर माता-पिता के संस्कारों की छाप भी नहीं पड़ती. चूंकि माता-पिता को यह सब पसंद नहीं था, इसलिए बाल-शिविरों से वे अपने बच्चों को भगा ले जाते थे. प्रचारित कर दिया गया कि वे तो बच्चों का अपहरण करके उन्हें उठा ले जाते हैं. यह मान्यता एक रूढ़ि बन कर सारे यूरोप मंे आज भी जीवित है.

पूर्वी यूरोप के देशों में रोमा बंधुआ मजदूरों और गुलामों की तरह रखे व बेचे-खरीदे भी जाते थे. उनकी पहचान करने के लिए मवेशियों की तरह तपते लोहे से उन्हें दागा जाता था. साढ़े चार सौ वर्षों से चल रही इस दास प्रथा का अंत 1864 में रोमानिया और बुल्गारिया द्वारा उसे त्याग देने के साथ हुआ. दास प्रथा से मुक्त हुए रोमा जर्मनी जैसे पश्चिमी यूरोप के देशों में रहने-बसने की कोशिश करने लगे, पर हर जगह वे दुत्कारे ही जाते थे. जर्मनी में रह रहे रोमा या सिंती लोगों का 1899 से पंजीकरण शुरू कर दिया गया. इसी पंजीकरण के बल पर हिटलर के शासनकाल में उन्हें चुन-चुन कर पकड़ा गया, गोलियों से उड़ा दिया गया या फिर यहूदियों के साथ-साथ उन्हें भी यातना शिविरों की गैस-भट्ठियों में ठूंस कर मार डाला गया.

हिटलर की बलि चढ़े पांच लाख रोमा
हाल ही में प्रकाशित खोजपूर्ण पुस्तकों के अनुसार, हिटलर के शासनकाल में जर्मनी में करीब 30 हजार रोमा और सिंती रहते थे. उनमें से 90 प्रतिशत औरतों, बच्चों और मर्दों को यातना शिविरों में मौत के घाट उतार दिया गया. यही हाल जर्मनी से बाहर यूरोप के उन देशों के रोमा और सिंतियों का भी हुआ, जिन पर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर की सेना ने कब्जा कर लिया था. उनकी संख्या करीब पांच लाख आंकी जाती है.

अखिल जर्मन सिंती एवं रोमा केंद्रीय परिषद  जर्मनी में रोमा व सिंती लोगों की मान्यता प्राप्त देशव्यापी प्रतिनिधि संस्था है. इसका काम है रोमा और सिंती संस्कृति का संरक्षण और प्रोत्साहन. इसके अध्यक्ष रोमानी रोजे के अपने परिवार के भी 13 सदस्य हिटलर के शासनकाल वाले आउश्वित्स और रावेंसब्रुइक यातना शिविरों में मौत के घाट उतार दिए गए थे. तब भी वे आज के जर्मनी में रोमा बिरादरी की रोजमर्रा जिंदगी को, सारी कमियों और विरोधाभासों के बावजूद कहीं बेहतर बताते हैं. तहलका के लिए एक विशेष बातचीत में वे कहते हैं, ‘जर्मनी में भी नस्लवाद और भेदभाव है. तब भी जर्मनी कानून के राज वाला देश है. यहां एक व्यापक जनाधार वाला नागरिक समाज है जो दूसरे देशों की अपेक्षा कहीं अधिक मुखर है. जर्मनी में पहले से ही रह रहे और जर्मन नागरिकता प्राप्त करीब 70 हजार रोमा और सिंती हैं. यहां ऐसे भी रोमा हैं जिनके पास तुर्की या ग्रीस की, रोमानिया या बुल्गारिया की नागरिकता है. लेकिन, वे रोमा होने की अपनी पहचान छिपाते हैं, क्योंकि उन्हें जर्मनी में भी अपने साथ भेदभाव होने और सामाजिक तिरस्कार का डर रहता है. पश्चिमी यूरोप के दूसरे देशों में, जैसे कि फ्रांस, इटली, हॉलैंड, बेल्जियम, नॉर्वे आदि में भी यही स्थिति है. वहां भी भेदभाव और नस्लवाद का शिकार बनने से बचने के लिए रोमा लोगों को यथासंभव गुमनामी में ही जीवन बिताना पड़ता है.’ जर्मनी में रोमा-सिंती लोगों की कुल संख्या एक लाख 20 हजार आंकी जाती है.  हालांकि रोजे यह भी मानते हैं कि रोमा अल्पसंख्यकों के साथ ‘जर्मनी में सरकारी स्तर पर भेदभाव अब भी होता है.’

यूरोप में रोमा आबादी
रोमा लोग वैसे तो इस बीच अमेरिका, ब्राज़ील और तुर्की में भी मिलते हैं, लेकिन उनका मुख्य निवासक्षेत्र यूरोप ही है. यूरोप के विभिन्न देशों में उनकी अनुमानित संख्या इस प्रकार हैःरोमानिया 24 00 000
बुल्गारिया 8 00 000
स्पेन 8 00 000
रूस 6 00 000
हंगरी 6 00 000
सर्बिया 5 00 000
तुर्की 5 00 000
स्लोवाकिया 4 50 000
फ्रांस 4 00 000
मेसेडोनिया 2 50 000
चेक गणराज्य 2 50 000
ग्रीस 2 20 000
यूक्रेन 2 00 000
ब्रिटेन 1 50 000
जर्मनी 1 40 000
इटली 1 00 000इसके अलावा अल्बानिया, बोस्निया, पुर्तगाल,  पोलैंड, क्रोएशिया, स्वीडन, आयरलैंड,  बेल्जियम, स्विट्जरलैंड आदि यूरोपीय देशों में भी रोमानी लोगों की काफी तादाद है

भारत से पहुंचे थे यूरोप
जर्मनी के कोलोन शहर में रोमा बच्चों के लिए एक अलग स्कूल और किंडरगार्टन है. रोमा बिरादरी द्वारा संचालित इस विशेष स्कूल में पूर्वी यूरोप से आए रोमा शरणार्थियों के दो से 13 साल तक के 46 बच्चों को दो साल के भीतर किसी सामान्य जर्मन स्कूल में पढ़ने लायक बनाया जाता है. स्कूल का नाम है ‘अमारो खेर.’ रोमानी भाषा में इस नाम का अर्थ है ‘हमारा घर.’ साफ है कि राजस्थान जैसे राज्यों में प्रचलित ‘अमारो घर’ सदियों के समय और हजारों किलोमीटर की दूरी के बाद भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं.

भाग्य की मार और परिस्थितियों से हार कर सदियों से घुमंतू बंजारा जीवन बिताने वाले रोमा लोगों को लिखने-पढ़ने का न तो कभी ठीक से मौका मिला और न ही उन्होंने इसमें दिलचस्पी ली. इसीलिए, उनके पास अपना कोई लिखित साहित्य, इतिहास या ऐसे दस्तावेज भी नहीं हैं जिनसे साफ पता चल सके कि वे कब, कहां से और कैसे यूरोप पहुंचे. वे जहां पहुंचे वहीं के बन गए. उन्होंने वहां प्रचलित धर्मों और नामों को तो अपना लिया पर अपने रीति-रिवाज, रहन-सहन, गीत-संगीत और पुरानी बोली-भाषा को यथासंभव संजोए रखा. उन्हीं के आधार पर भाषाविदों और इतिहासकारों का 18वीं सदी के बाद से यही मानना रहा है कि उनके पूर्वज कोई हजार-डेढ़ हजार साल पहले भारत के उन हिस्सों से चले थे जो आज राजस्थान, सिंध और पंजाब कहलाते हैं. समय के साथ वे तीन चरणों में पूरे  यूरोप और अमेरिका तक फैल गए. पश्चिमी यूरोप में उनका फैलना 15वीं सदी में शुरू हुआ.

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