यूजीसी को खत्म करने के प्रस्ताव पर बटे लोग

नया मसौदा कानून, भारत के उच्च शिक्षा आयोग के विधेयक में भारत की उच्च शिक्षा के शासन को सुधारने का प्रस्ताव है। इस पर लिख रहे हैं - विवाशवान सिंह

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वर्तमान केंद्र सरकार की प्रवृति शक्ति का केंद्रीयकरण करना और बाजारवाद को बढ़ावा देना है। तथापि यूजीसी को खत्म करने के लिए हालिया निर्देश एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत के उच्च शिक्षा आयोग के विधेयक में भारत की उच्च शिक्षा के शासन को सुधारने का प्रस्ताव है। यह विधेयक यूजीसी अधिनियम 1956 को बदल कर उसे भारत के उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) के रूप में पुनर्गठन करना है। संस्था अपने नए रूप में विश्वविद्यालयों में अकादमिक मानकों को स्थापित करने और उन्हें सुधारने का काम करेगी।

सरकार ने संस्थानों को खोलने और बंद करने के लिए मानदंड बनाने, संस्थाओं को अधिक लचीलापन और स्वायत्तता प्रदान करने के लिए, महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां करने के नियम बनाने का निर्णय भी लिया है। चाहे विश्वविद्यालय किसी भी कानून के तहत शुरू किए गए हों (राज्य कानून सहित)।

वर्तमान सरकार का एक उच्च तकनीकी दृष्टिकोण है चाहे मामला यूजीसी का हो। यूजीसी में शिक्षाविदों की संख्या में तेजी से कमी आई है। जाति पक्षपात को मज़बूत करने के साथ ही उच्च शिक्षा का सांप्रदायिकरण हो रहा है। सबसे अधिक परेशान करने वाला तथ्य यह है कि प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग में महिलाओं, दलितों, ओबीसी विद्वानों के लिए कोई आरक्षण नहीं है।

अकादमिक नौकरशाहों उप-कुलपति, प्रोफेसर सहित यह नौकरशाहों से भरा है, जो की राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित होते हैं,। भारत के प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग यूजीसी की तुलना में अपेक्षाकृत कम अकादमिक होगा। आयोग के कुल 12 सदस्यों में से तीन नौकरशाह होंगे – उच्च शिक्षा सचिव, कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के सचिव, विज्ञान और प्रोद्योगिकी विभाग के सचिव।

यह स्पष्ट है कि मुख्य रूप से नौकरशाही शिक्षाविदों से बना यह कमीशन यूजीसी के अकादमिक स्तर को पक्षपात और बाबूगिरि के साथ तेजी से कम कर देगा। शिक्षा का यह सांप्रदायिकरण वास्तव में बाजारीकरण के साथ अच्छी तरह से मेल खाता है। आत्मकेंद्रित व्यक्ति जो नव उदार बाजार के लिए बनाए गए है और जो पूंजीवाद पैदा करते हैं वे न केवल उन पक्षपातों को पूरा करते हैं जिन पूर्वाग्रहों से वे ग्रस्त हैं और वे पक्षपात की धारणा को मजबूत करते है। लोगों को पैसे के द्वारा जांचा जाता है और वे उत्पीडित और अधिकारहीन को अल्पसंख्यकों की तरह घृणा से देखते हैं। मसौदे में उल्लेख किया जाना चाहिए कि अधिकारहीन, सामाजिक समूह, लिंग, अल्पसंख्यक समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

जेएनयू से अर्थशास्त्र के सेवामुक्त प्रोफेसर प्रभात पटनायक के अनुसार सभी सभावनाओं में वर्तमान सरकार के नव उदार विकास के आधार पर यह एक नौकरशाही निकाय बन जाएगा। भारत में अकादमिक संस्थान कभी भी सरकारी हस्तक्षेप से पूरी तरह आजाद नहीं रहे हैं। लेकिन एचआरडी मंत्रालय द्वारा सीधे विश्वविद्यालय फंड को नियंत्रित करने से हमारे स्ंास्थानों के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप काफी हद तक बढ़ जाएगा।

संस्थानों को ‘स्वायत्तताÓ देना भारत के प्रस्तावित उच्च आयोग (एचईसी आई) के प्रमुख बिंदुओं में से एक है। यद्यपि स्वंय स्वायत्तता देना बुरा प्रस्ताव नहीं है, और विश्वविद्यालयों को प्रभावशाली ढंग से कार्य करने के लिए स्वायत्तता की आवश्यकता है, परन्तु वर्तमान सरकार की स्वायत्तता योजना लागत में कटौती और फीस बढ़ाने के पैकेज के साथ आई है। यह फीस तय करने का मामला है इससे पिछडी आर्थिक स्थिति वाले छात्र उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाएंगे जब तक कि वे कजऱ् न ले। हमारे देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है यदि छात्र ऋण लेते हैं तो उनमें से बड़ी संख्या में छात्र ऋण वापस करने में असमर्थ होंगे और मौजूदा किसान आत्महत्याओं के समान यह सामूहिक आत्महत्या का कारण बन जाएगा।

स्वायत्तता के नाम पर सरकार उच्च शिक्षा के निजीकरण की दिशा में जा रही है। एचईसीआई का उद्देश्य वर्ग विभाजन के साथ उच्च शिक्षा की श्रेणी प्रणाली स्थापित करना है- पहली श्रेणी उच्च वर्ग के लिए, दूसरी श्रेणी मध्यम वर्ग के लिए और तीसरी श्रेणी साधारण जनता के लिए। अगर यह लागू हुआ तो हमारे पास पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त और अत्याधिक फीस वाले विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय होंगे, लेकिन इस के साथ ही तीसरी श्रेणीे के सामान्य छात्रों की बड़ी संख्या होगी जिसे सरकार की मान्यता नहीं होगी। यह अस्पष्ट है कि यूजीसी के बिना विश्वविद्यालय कैसे काम करेंगे। हम यह नही जानते की संस्थान कैसे धन प्राप्त करेंगे, और वे किससे संबंधित होंगे। सरकार के हस्तक्षेप की गैरहाजिरी में वे धन के लिए पूंजीपतियों पर निर्भर रहेंगे। इससे उच्च शिक्षा पर अधिक नियंत्रण राजनेता और कोपरेटस की मिलीभगत का होगा।

वित्त और अकादमिक निर्णय एक स्वायत्त निकाय द्वारा अकादमिक मानदंडों के आधार पर किए जाने चाहिए और यह किसी भी राजनीतिक संस्थान से अलग होने चाहिए। वर्तमान सुधार राज्य को उच्च शिक्षा की दिशा में अपनी वित्तीय जिम्मेदारी से मुक्त करने का प्रयास है। हालांकि समय की आवश्यकता उच्च शिक्षा में एक ऐसे सार्थक सुधार की है जो पहुंच, निष्पक्षता और सामथ्र्य जैसी ज़रूरतों को पूरा करे। यह स्वायत्त कालेजों के निर्माण, जिसमें प्रवेश, पाठ्यक्रम और फीस के मामले में स्वतंत्रता होगी। यह पूरी तरह से उच्च शिक्षा क्षेत्र में ‘प्रबंधन कोटाÓ के साथ ‘स्वंय वित्त वाले पेशेवर कालेजोंÓ की श्रृंखला का आगे बढ़ाएगा।

यूजीसी ने अक्सर शैक्षिक संस्थानों में सरकारों के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का रोका है, परन्तु जब संस्थागत प्रमुख को यह महसूस होगा कि वित्त सीधा मंत्रालय के नियंत्रण में है तो उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से जो भी कहा जाएगा उसे वे मानेगे। भारत एक विशाल देश है और हमारी सामाजिक-आर्थिक स्थिति हर राज्य में अलग -अलग है। सरकार एचईसीआई जैसी संस्था का निर्माण कर सकती है जो राज्य की मदद उसकी स्थिति के अनुसार करे। उच्च शिक्षा में सुधार सामथ्र्य, पहुंच, गुणवत्ता की आवश्यकता और सभी को शिक्षा प्रदान करने की सामाजिक जिम्मदारी को पूरा करे।