यह कैसी हरकत है सरकार!

इतने दिनों में सरकार की एक पहचान बहुत पुख्ता हुई है. वह यह कि वह लगातार हरकत करने में असमर्थ रहती है. तब सरकार हरकत में कब आती है! किसान मर जाते हैं. मजदूर का पूरा परिवार आत्महत्या कर लेता है. बस्तियां जला दी जाती हैं. ट्रेन पलट जाती है. बाढ़ आती है. सूखा पड़ता है. तब भी नहीं. तब सरकार हरकत में कब आती है! शायद जब वोटबैंक में से अपना खाता बंद होने की आंशका उसे घेरती है. तब!

लोग कहते हैं कि सरकार तुरत-फुरत में हरकत में क्यों नहीं आती! देखा जाए तो इसमें सरकार का कोई दोष नहीं. वह क्या करे. अब इतनी बड़ी सरकार. उसके इतने हाथ तो इतने पैर. इनको हिलाने-डुलाने में काफी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती होगी, लिहाजा वह लेटी (पड़ी) रहती है. सरकार बहुत ठस्स चीज होती है. भारी भरकम. कितने तो पुरजे उसके, कितने तो जोड़ उसके. वह एकदम से हरकत में आ भी जाए तो कैसे. सरकार की मजबूरी है. कुछ तो मजबूरी है, कुछ उसकी रूढ़ हो चुकी छवि का भी सवाल है. बात-बात पर हरकत में आ जाएगी, जरूरत के वक्त हरकत में आ जाएगी, तो उसे सरकार कहेगा कौन!

अब यह हरकत देखिए! सरकार के चलते रहने को हरकत नहीं माना जाता. न ही तो सरकार के गिरने को ही. जबकि ये दोनों भी क्रियाएं हैं. यह सरकार के साथ ज्यादती है. चलिए इसे हरकत न मानिए जैसी आपकी मर्जी. चलिए मगर यह मानिए, सरकार किसी भी तरह से हरकत में आ तो गई! तो पहले पहल तो विपक्ष के ऊपर ठीकरा फोड़ेगी. वर्तमान चुनौतियों को भूतपूर्व सरकार के पहलू से नत्थी  करेगी. जब इतनी हरकत से बात नहीं बनेगी तो सरकार और हरकत करेगी और उसके बदन से आयोग, बयान, खंडन, जांच कमीशन! पैकेज! आदि झड़ेंगे. फिर! फिर क्या! फिर सरकार शांत, ठस्स, क्रियाविहीन, लगभग मरणासन्न हो जाती है. तब तक, जब तक कोई होनी अनहोनी में, घटना दुर्घटना में, खबर त्रासदी में न बदल जाए.

-अनूप मणि त्रिपाठी

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