मायावती: मोदी की राह में

लेकिन 2014 में हालात बदल चुके हैं. इस दौरान बसपा को दो बड़ी हार का सामना करना पड़ा है. 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा की हालत खराब रही है. उसकी वोटों की हिस्सेदारी पांच फीसदी तक घट गई है. जाहिर-सी बात है कि दलित ब्राह्मण फार्मूला इन चुनावों में काम नहीं कर सका है. जानकारों की मानें तो आगामी लोकसभा चुनावों में भी ब्राह्मणों का बसपा से दुराव बना रह सकता है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में बसपा को ब्राह्मणों का वोट किसी हालत में नहीं मिलेगा. ब्राह्मणों ने 2009 में भी इन्हें वोट नहीं दिया था. फिलहाल तो ब्राह्मण मोदी और भाजपा के पीछे खड़ा है क्योंकि उसे पता है कि प्रधानमंत्री भले ही मोदी बन जाएं लेकिन चुनाव जीतने की स्थिति में पार्टी और संघ के जरिए ब्राह्मण ही सबसे ज्यादा ताकतवर रहने वाले हैं.’

ब्राह्मण और शहरी मध्यवर्ग के ऊपर मोदी का असर साफ-साफ देखा जा सकता है. मोदी के इस बहाव ने उत्तर प्रदेश की जातिगत खांचों में बंटी राजनीति में एक नए तरह का ध्रुवीकरण पैदा किया है. अजय बोस एक दिलचस्प विचार रखते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में लंबे समय बाद ऐसा चुनाव हो रहा है जो काफी हद तक बाईपोलर है. इसमें ब्राह्मण, ठाकुर और मध्यवर्ग मोदी के समर्थन में है जबकि दलित, मुसलिम और महापिछड़ी जातियां बसपा के पाले में हैं. कांग्रेस यहां पर पहले से ही दौड़ से बाहर हो चुकी है. मुलायम सिंह के पास केवल अपना यादव वोटबैंक ही बचा हुआ है. हो सकता है कि यादवों का भी एक बड़ा हिस्सा उनसे कट जाए क्योंकि जिस तरह से उन्होंने पिछले दो सालों में अपने परिवार को आगे बढ़ाने का काम किया है उससे यादवों के एक बड़े वर्ग में नाराजगी है.’

यहां अहम सवाल है कि जिस दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के जरिए मायावती ने चमत्कार किया था उसमें से ब्राह्मण के अलग होने का कितना नुकसान बसपा को हो सकता है और पार्टी इसकी भरपाई कैसे करेगी. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, ‘फिलहाल पार्टी का ध्यान 40 फीसदी वाले फार्मूले (दलित-मुस्लिम) को ठोस रूप देने पर है न कि तीस फीसदी (दलित-ब्राह्मण) वाले फार्मूले पर.’ जाहिर-सी बात है बसपा के भीतर ब्राह्मणों के मोदी की तरफ जाने की कोई खास चिंता नहीं है. अजय बोस के शब्दों में, ‘बसपा को इतना ब्राह्मण वोट कभी नहीं मिला है, हल्ला ज्यादा हुआ है.’ इसके बावजूद ब्राह्मण समुदाय को आश्वस्त करने और उसके साथ हर-संभव मधुर रिश्ते कायम रखने की कोशिश दो स्तरों पर चल रही है. पहला, पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा 2006 की तर्ज पर प्रदेश भर में घूम-घूम कर दलित-ब्राह्मण गठजोड़ वाली रैलियां कर रहे हैं. दूसरा, पार्टी ने अपने घोषित लोकसभा उम्मीदवारों में करीब 18 टिकट ब्राह्मण समुदाय को दिए हैं. यहां पार्टी की रणनीति यह है कि उम्मीदवारों के निजी प्रभाव के जरिए ब्राह्मण वोटों का एक हिस्सा भी पार्टी अपने हक में कर लेती है तो यह उसके लिए बोनस होगा.

महापिछड़ी जातियां
कांशीराम ने जिस सोशल इंजीनियरिंग के जरिए राजनीतिक सत्ता तक पहुंचने का रोडमैप बनाया था उनमें दलितों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की 15-16 महापिछड़ी जातियां भी शामिल थीं. कांशीराम की इस विशाल छतरी  के नीचे बिंद, राजभर, बरई, कुशवाहा और पासी आदि अत्यंत पिछड़ी जातियां शामिल थीं. लेकिन 1998 के बाद बसपा में कांशीराम का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया और उनकी जातियों की छतरी छिन्न-भिन्न होती गई. कांशीराम ने पहले ही मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. पार्टी में मायावती का प्रभाव बढ़ गया था. जानकार इस छतरी के बिखरने के पीछे मायावती के निरंकुश रवैये को जिम्मेदार मानते हैं. मायावती ने उन नेताओं को एक-एक कर किनारे लगाना शुरू कर दिया जिनसे उनके एकाधिकार को चुनौती मिल सकती थी. अफरा-तफरी के इस दौर में कांशीराम के इकट्ठा किए गए तमाम साथी बसपा से बाहर निकाल दिए गए. इनमें बरखूराम वर्मा, आरके चौधरी, रामसमुझ पासी, डॉ. मसूद, किशनपाल जैसे तमाम नेता शामिल थे. यह 2001 के आस-पास की घटना है. इनके जाने के बाद बसपा में मायावती की एकल सत्ता स्थापित हो गई. लेकिन हाल के दिनों में मायावती को इस बात का इल्म हुआ है कि दलितों को दिल्ली के दरबार तक पहुंचाने के लिए उसी रास्ते पर चलना होगा जिस पर चलने का सपना कभी कांशीराम ने देखा था.

पिछले कुछ महीनों के दरमियान मायावती ने इस दिशा में कई सुधारवादी कदम उठाए हैं जिनसे महापिछड़ी जातियों के बसपा के साथ एक बार फिर से जुड़ाव की संभावना बलवती हो गई है. पार्टी में दलितों के साथ अतिपिछड़ों की हिस्सेदारी फिर से बढ़ी है. बसपा की अंदरूनी समझ रखने वाले अजय बोस बताते हैं, ‘आरके चौधरी को बहनजी एक बार फिर से पार्टी में वापस लाने जा रही है. चौधरी, कांशीराम के साथी और बसपा के संस्थापक सदस्य थे. इसी तरह से पासियों के बड़े नेता रामसमुझ पासी की भी बसपा में वापसी की बात चल रही है. उत्तर प्रदेश में पासी समुदाय की बड़ी आबादी है.’

महापिछड़ी जातियों का छाता बसपा ने काफी फैलाया है. फिलहाल पार्टी के पास सुखदेव राजभर, रामअचल राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे तमाम अतिपिछड़े नेता हैं. पुराने साथियों की वापसी के सवाल पर स्वामी प्रसाद मौर्य इशारों ही इशारों में पुष्टि करते हैं, ‘बसपा व्यक्तियों पर ध्यान नहीं देती. हमारा लक्ष्य सर्वजन को साथ लाने का है. जो लोग किसी कारणवश दूर हो गए थे, अगर वे चाहेंगे तो बहनजी उन पर विचार करेंगी.’

संगठन और मुद्दे
अजय बोस के शब्दों में, ‘मोदी के पक्ष में हवा तो है लेकिन उस हवा में 1990 के मंदिर आंदोलन जैसा भावनात्मक लगाव नहीं है.’ वे हमें उत्तर प्रदेश के दलित मध्यवर्ग में मायावती के प्रति फिर से पैदा हुए भावनात्मक लगाव के बारे में भी बताते हैं. प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा पिछले दिनों काफी चर्चा का

विषय रहा था. बसपा को छोड़कर शेष सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया था विशेषकर सपा और भाजपा ने. बोस के मुताबिक दलितों के नौकरीपेशा तबके और मध्यवर्ग में इस बात को लेकर गुस्सा है कि सभी पार्टियां प्रमोशन में आरक्षण की विरोधी हैं. सिर्फ मायावती ही उन्हें यह अधिकार दिला सकती है.

बसपा ने भी अपने कोर वोटबैंक के बीच इस मुद्द को काफी आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया है.

इस काम को आगे बढ़ाने में बसपा अपने पुराने संगठनों का इस्तेमाल कर रही है. बसपा के सांगठनिक ढांचे पर रोशनी डालते हुए गोविंद पंत राजू बताते हैं, ‘डीएसफोर और कांशीराम द्वारा 70 के दशक में खड़े किए गए दलित कर्मचारी संगठन आज भी बसपा के लिए काडर का काम करते हैं. अंबेडकर जयंती, महात्मा फूले जयंती, रविदास जयंती के अलावा तमाम दलित महापुरुषों की जयंतियों और पुण्यतिथियों के माध्यम से ये संगठन साल भर जिलों-तहसीलों में सक्रिय रहते हैं. इनमें दलित और अतिपिछड़े समुदायों की जमकर हिस्सेदारी होती है. इन आयोजनों के जरिए बसपा अपने दलित वोटरों को लामबंद करने और अपनी बात को नीचे तक पहुंचाने में सफल रहती है. ये संगठन बसपा के अपने राजनीतिक ढांचे के साथ बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं. इसमें प्रदेश स्तर की कमेटियां, जोनल कमेटियां, उसके नीचे जिला कमेटियां और ब्लाक स्तरीय कमेटियां होती है. इसके जरिए छोटा से छोटा संदेश भी देखते-देखते मायावती से आम वोटर तक और आम वोटर से मायावती तक पहुंच जाता है.’

ऊपर से देखने पर मायावती भले ही ज्यादा सक्रिय नहीं दिखती हों लेकिन इस ढांचे के जरिए उनका जमीन से संपर्क लगातार बना रहता है.

बसपा की दिक्कत
मुलायम सिंह यादव को चुनाव प्रबंधन का बड़ा खिलाड़ी माना जाता है. यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि मुलायम सिंह अपना दावा यूं ही नहीं छोड़ेंगे. लिहाजा उनके तरकश से निकलने वाले तीर का सबको इंतजार है. सुरेंद्र राजपूत के मुताबिक ‘मुसलमानों को अपने पाले में खींचने के लिए मुलायम सिंह ने मुस्लिम उलेमाओं की एक पूरी फौज खड़ी कर रखी है जो गांव-गांव जाकर सपा के पक्ष में वोट मांगने का काम करेंगे.’

इसके अलावा मुलायम सिंह की उम्मीद नरेंद्र मोदी भी हैं. जानकारों के मुताबिक मुलायम सिंह की फौज मुजफ्फरनगर को भुलाकर मुसलमानों के बड़े दुश्मन के रूप में मोदी को आगे बढ़ाएगी. अगर यह दांव कामयाब होता है तो मायावती के लिए रास्ता कठिन हो जाएगा. अगर मुसलमान काबा और कलीसे के फेर में फंस गया तो मायावती का खेल खराब हो जाएगा क्योंकि उनके सर्वजन फार्मूले से ब्राह्मण पहले ही अलग होकर मोदी के पक्ष में मन बनाता दिख रहा हैै.

अब बात आती है बसपा को मिलने वाली संभावित सीटों की. इस मुद्दे पर ज्यादातर लोग किसी तरह की भविष्यवाणी करने से बचते हैं. रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, ‘सीटों के बारे में विश्वास से तभी कुछ कहा जा सकता है जब फाइनल उम्मीदवारों के नाम सामने आ जाएं क्योंकि अंतिम समय में उम्मीदवार और उसकी व्यक्तिगत क्षमता सबसे अहम होती है.’

जानकारों की इस मुद्दे पर सहमति है कि भाजपा के अलावा सिर्फ बसपा उत्तर प्रदेश में अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने में कामयाब रहेगी और यदि मायावती के हालिया उपाय काम कर गए तो उत्तर प्रदेश में और शायद राष्ट्रीय राजनीति में भी मोदी का रथ रोकने का काम मायावती ही कर सकती हैं.

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