अमित शाह: मोदी की चाह में

खैर, 2002 में जब प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की फिर सरकार बनी तो सरकार में सबसे कम उम्र के अमित शाह को गृह (राज्य) मंत्री बनाया गया. यही नहीं, सबसे अधिक 10 मंत्रालय उन्हें दे दिए गए. मोदी ने शाह को 90 फीसदी से अधिक कैबिनेट समितियों का सदस्य भी बनाया जिनसे उनके विभागों का कोई लेना-देना तक नहीं था. जानकार बताते है कि यह भी मोदी की अपने मंत्रियों पर नजर रखने की रणनीति ही थी. कुछ लोगों की नजर में शाह पर ये मेहरबानियां केशुभाई के तख्तापलट में उनका साथ देने का इनाम थीं.

अमित शाह के रसूख में दिन दोगुनी, रात चौगुनी तरक्की होने की यह सिर्फ शुरुआत भर थी. धीरे-धीरे प्रदेश में स्थिति ऐसी होती गई कि अमित शाह राज्य में मोदी के बाद सबसे अधिक प्रभाव वाले नेता बन गए. कैबिनेट में शाह का रुतबा मोदी से कम नहीं था.

ऐसा नहीं है कि मोदी और शाह के संबंधों में कोई उतार-चढ़ाव नहीं आया या फिर शाह को किसी तरह की कोई चुनौती नहीं मिली. शाह के लिए भी मोदी के मन पर एकछत्र राज कर पाना बहुत आसान नहीं था. इसका सबसे बड़ा कारण थीं वर्तमान में गुजरात की शिक्षा मंत्री आनंदी बेन पटेल.

गुजरात में नरेंद्र मोदी जिन दो लोगों के बेहद करीब थे उनमें से एक थे अमित शाह और दूसरी थीं आनंदी बेन. मोदी के बेहद करीबी मानी जाने वाली आनंदी और अमित शाह के बीच लंबे समय तक शीतयुद्ध चलता रहा. दोनों मोदी पर किसी और के प्रभाव को देखने को तैयार नहीं थे. लेकिन मोदी ने कभी दोनों में से किसी एक को चुनने का काम नहीं किया. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘अमित शाह मोदी जी की परछाई हैं लेकिन आनंदी बेन मोदी जी के बेहद करीब हैं. ये दोनों लोग आरएसएस के समय से ही एक साथ हंै. शाह और आनंदी के बीच में असहमति हो सकती है. लेकिन मोदी जी कभी इस बात को बर्दाश्त नहीं करते कि शाह आनंदी बेन से कंपटीशन करें.’ दोनों के साथ काम कर चुके शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘दोनों बहुत अलग-अलग स्वभाव के लोग है. शाह जहां षड़यंत्र वाले कामों में महारत रखते हैं वहीं आनंदी की प्रशासन पर बेहतर पकड़ रही है.’

हालांकि कैबिनेट के तमाम सदस्यों और पार्टी के अन्य नेताओं की तरफ से भी शाह के प्रति नापसंदगी की खबरें दबे-छिपे आती रही हैं. लेकिन मोदी से नजदीकी की वजह से किसी ने मुंह खोलकर शाह का विरोध करने की हिम्मत नहीं की. ब्रजेश कहते हैं, ‘मोदी सरकार में अमित शाह सब कुछ थे. मोदी के बाद वही सरकार थे. इस वजह से कैबिनेट के बाकी लोग, जो उम्र और अनुभव में शाह से  वरिष्ठ थे, उनका शाह से नाराज होना स्वाभाविक था.’ खैर मोदी ने हरसंभव तरीके से शाह को आगे बढ़ाया और शाह ने भी उन्हें प्रसन्न करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी.

देवेंद्र पटेल कहते हैं, ‘अब तक गुजरात में मोदी ने जो भी रणनीति अपनाई है जो कुछ भी किया है उसके पीछे असली दिमाग अमित शाह का ही रहा है. भले ही पर्दे के सामने मोदी दिखाई देते हों. अब तक के अपने राजनीतिक करियर से उन्होंने ये स्थापित किया है कि वो एक बेहद चालाक, सोशल और पॉलिटिकल इंजीनियरिंग में माहिर व्यक्ति हैं.’

शाह का व्यक्तित्व विश्लेषण करते हुए शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘ये आदमी बहुत बढ़िया मैनेजर है. अपने मालिक के प्रति वफादार रहता है. इसी आदमी ने गुजरात में कांग्रेस को तोड़ा. सहकारी संस्थाओं से कांग्रेस को खत्म करने का काम किया. ये आदमी 24 घंटे राजनीतिक षडयंत्र में लगा रहता था. आज भी वही करता है. उत्तर प्रदेश में वही करने वो गया है.’

चुनावी राजनीति में माहिर अमित शाह के नाम यह रिकॉर्ड भी है कि अपने जीवन में उन्होंने अभी तक कुल 42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े लेकिन उनमें से एक में उन्होंने हार का सामना नहीं किया. दूसरी ओर अमित शाह पर कई फर्जी एनकाउंटर कराने, हत्या कराने, फिरौती, अपहरण जैसे संगीन आरोप भी हैं. हाल ही में उन पर यह आरोप भी लगा कि जब वे गृह राज्य मंत्री थे तो उन्होंने मोदी के आदेश पर अवैध तरीके से एक महिला की जासूसी करवाई थी.

सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड़ के मामले में अमित शाह को 2010 में गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा. शाह पर आरोपों का सबसे बड़ा हमला खुद उनके बेहद खास रहे गुजरात पुलिस के निलंबित अधिकारी डीजी बंजारा ने किया. फर्जी मुठभेडों के मामले में ही जेल में बंद बंजारा ने एक चिट्ठी लिखकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाते हुए कहा कि ये दोनों नेता भी फर्जी मुठभेड़ में हुई उन मौतों के आरोपी हैं जिसके चलते वे और 31 अन्य अधिकारी वर्षों से जेल में कैद हैं. साबरमती केंद्रीय कारागार से लिखे गए इस पत्र में वंजारा ने शाह पर पुलिस अधिकारियों को धोखा देने का आरोप लगाया. बंजारा ने लिखा कि वह नरेंद्र मोदी को लंबे समय तक एक भगवान की तरह मानता था, लेकिन उसे यह कहते हुए खेद हो रहा है कि ‘मेरा भगवान अमित भाई शाह जैसे शैतान के प्रभाव से नहीं उबर सका.’ शाह पर गुजरात में ईमानदार पुलिस अधिकारियों को हाशिये पर धकेलने और मनमानी करने के भी आरोप हैं.

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में शाह ने एक बेहद लो-प्रोफाइल रखने वाले व्यक्ति की छवि बनाई है. एक ऐसा व्यक्ति जो मीडिया से मोदी के समान ही दूरी बरतता है. बेहद नपे-तुले शब्दों में अपनी बात रखने वाले शाह पर पार्टी के नेता तानाशाह और घमंडी होने समेत कई आरोप लगाते रहे हैं.

गुजरात में पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष कानजी एस ठाकुर इन आरोपों का खंडन करते हुए कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है. वो सभी को साथ में लेकर चलते हैं. उनमें कोई घमंड नहीं है. हां, ये है कि वो जो सच होता है वो सीधे मुंह पर बोल देते है. किसी को अच्छा लगे या बुरा.’

उत्तर प्रदेश में उन्हें भेजे जाने के सवाल पर कानजी कहते हैं, ‘जो व्यक्ति यहां गुजरात में कमाल कर सकता है, उसे पार्टी आगे क्यों ना बढ़ाए. हमें विश्वास है कि वो वही करिश्मा उत्तर प्रदेश में दिखाएंगे जो उन्होंने यहां किया है. मोदी जी को किससे क्या काम लेना है ये अच्छी तरह से आता है.’

उत्तर प्रदेश
मोदी और शाह के बीच के अब तक के आपसी संबंध और शाह की चुनावी काबिलियत से यह बात समझी जा सकती है कि क्यों मोदी ने उनको उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया. उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनने के बाद से अमित शाह ने प्रदेश में भाजपा की जीत के लिए युद्ध स्तर पर काम करना शुरू कर दिया है.

भाजपा के स्थानीय पार्टी नेता बताते हैं कि प्रभारी बनने के बाद लखनऊ में अमित शाह अकेले नहीं आए बल्कि उनके साथ एक पूरी टीम आई है. इसमें बड़ी संख्या में लोगों को वे गुजरात से लेकर आए हैं, ये सभी लोग अमित शाह के मार्गदर्शन में पार्टी की रणनीति बनाते रहे हैं. इनके अलावा आईआईटी और आईआईएम के लड़कों की भी एक टीम शाह ने बनाई है. इसी टीम के माध्यम से शाह उत्तर प्रदेश की व्यूहरचना करने में जुटे हैं. उन्होंने लखनऊ में अपना एक पूरा तंत्र स्थापित किया है.

Amit-Shahअमित शाह ने सालों से मरणासन्न पड़े संगठन को सक्रिय करने से अपने काम की शुरुआत की है. पार्टी नेता बताते हैं कि एक रणनीति बनाई गई है जिसके तहत लखनऊ से लेकर राज्य के हर बूथ तक पार्टी संगठन को सक्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है. पार्टी प्रवक्ता मनोज मिश्रा कहते हैं, ‘सबसे पहले अमित शाह जी के नेतृत्व में पार्टी ने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का काम किया है. उन्होंने तेजी से जनसंपर्क किया है और सभी आठ क्षेत्रों में व्यक्तिगत दौरा किया है. पूरे राज्य में वैज्ञानिक तरीके से बूथ कमेटियां बनाई जा रही हैं.’ शाह के उत्तर प्रदेश में आने के बाद हुए बदलावों की चर्चा करते हुए वाजपेयी कहते हैं, ‘आज लगभग 80 प्रतिशत जगहों पर हमारी बूथ कमेटियां तैयार हो चुकी हैं. पहले ऐसा नहीं होता था. होता ये था कि अगर मुझे टिकट नहीं मिला तो फिर बूथ जाए भाड़ में मैं पार्टी के औपचारिक प्रत्याशी के खिलाफ काम करूंगा. इस बार ऐसा नहीं है. इस बार व्यक्ति नहीं पार्टी चुनाव लड़ रही है. संगठन के तंत्र से चुनाव लड़ा जा रहा है.’

इसके अलावा शाह के नेतृत्व में पार्टी उत्तर प्रदेश में कुछ उसी तरह से तकनीक के साथ गलबहियां कर रही है जिस तरह का प्रयोग प्रमोद महाजन ने अपने समय में किया था. पार्टी नेता बताते हैं कि तकनीक का जैसा प्रयोग इस बार के चुनाव में हो रहा है वैसा उत्तर प्रदेश में पहले कभी नहीं हुआ. हाल ही में अति अत्याधुनिक 400 मोदी रथों को पूरे राज्य में रवाना किया गया है.

पार्टी के नेता बताते हैं कि शाह के यहां आने के बाद एक बड़ा बदलाव यह आया है कि प्रदेश के नेताओं की आपसी सिर-फुटौव्वल बंद हुई है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘पहले बड़े नेता आपस में खूब जूतमपैजार करते थे. लेकिन अमित शाह के आने के बाद कार्यकर्ताओं की सुनवाई शुरू हुई है. इन नेताओं को पता है कि शाह मोदी के आदमी हैं. मोदी भाजपा का वर्तमान और भविष्य हैं, ऐसे में जिसे अपने भविष्य की चिंता है वो शाह के सामने जी सर वाली मुद्रा में रहने में ही अपनी भलाई समझ रहा है. सभी कार्यकर्ता इससे बेहद खुश हैं.’

शाह से जुड़े अपने अनुभव को साझा करते हुए एक भाजपा कार्यकर्ता राकेशचंद्र त्रिपाठी कहते हैं, ‘वो प्रैक्टिकल एप्रोच वाले व्यक्ति हैं. उत्तर प्रदेश के उन पुराने नेताओं की तरह नहीं हैं कि पांच घंटे भाषण देंगे जिसमें से तीन लाइनें ही काम की निकलेंगी. वो तीन लाइनें ही बोलते हैं और सभी काम की होती हैं.’ पार्टी के एक जिलाध्यक्ष शाह के काम करने के तरीके पर चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘उनकी बातचीत से एक बात साफ हो जाती है कि उन्हें सिर्फ जीत से मतलब है. उनके लिए कुछ और मायने नहीं रखता. आप देख सकते हैं कि प्रदेश में तमाम लोगों को पार्टी से जोड़ा जा रहा है. उन्होंने साफ कर रखा है किसी भी कीमत पर हमें नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री बनाना है. हमको ये चुनाव किसी भी तरह से जीतना ही होगा.’ भाजपा के उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात और दिल्ली तक के नेताओं से बातचीत में यह बात सामने आ जाती है कि कैसे मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई पूरी पार्टी में पागलपन की हद तक मेहनत कर रहा है तो वह अमित शाह ही हैं.

लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘अमित शाह को पूरी तरह से फ्री हैंड मिला हुआ है. वो प्रदेश में  सब कुछ कर रहे हैं जो करना चाहते हैं.’ शाह के माध्यम से आए नवाचारों में एक व्यवस्था यह भी शामिल है कि इस बार पार्टी किसी प्रत्याशी को कैश में कोई रकम नहीं दे रही. लक्ष्मीकांत कहते हैं, हम लोग लोकसभा के स्तर पर पार्टी का बैंक एकाउंट खुलवा रहे हैं. पार्टी प्रत्याशी को जो भी पार्टी की तरफ से सहयोग होगा वो इसी तरह से जाएगा और प्रत्याशी तीन अन्य लोगों की सहमति के बाद ही उस एकाउंट से पैसे निकाल सकता है. बाद में उसको खर्च का पूरा ब्यौरा देना होगा. काले-नीले धन की कोई गुंजाइश नहीं रहने देंगे. ये सब शाह जी की रणनीति का हिस्सा है.’

हालांकि पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं से विस्तार से बातचीत करने पर शाह के तौर-तरीकों को लेकर उनकी अप्रसन्नता भी सामने आ जाती है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में शाह दो तरह के लोगों को साथ लेकर काम कर रहे हैं. एक उन्होंने संघ के लोगों की टीम बनाई है. दूसरी गुजरात से वो अपने लोगों को लाए हैं. प्रदेश के नेताओं को वो तवज्जो नहीं दे रहे. यही कारण है कि प्रदेश के बड़े नेताओं में उनको लेकर नाराजगी है. लेकिन लोग डर के मारे मुंह नहीं खोल रहे.’

शाह की कार्यप्रणाली और प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से उनकी नाराजगी के प्रश्न को जब हम प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी के सामने रखते हैं तो वे कुछ यूं जवाब देते हैं, ‘जो वरिष्ठ नेता राज्य में पार्टी को 10 और 47 पर ले आए वो आज राज्य में अपने अस्तित्व का संकट झेल रहे हैं. इसीलिए वो ऐसा माहौल बना रहे हैं. इन लोगों से शाह जी बात करते हैं. उनकी राय ली जाती है लेकिन अब नीतियों के कार्यान्वयन में उनकी बात नहीं माना जाएगी ये तय है. अगर वही निर्णय होना है जो ये काबिल नेता आज तक करते आए हैं तो फिर नई टीम का मतलब क्या रह जाएगा? इन नेताओं ने प्रदेश में हुई रैलियों में अब तक न एक नए पैसे की मदद की है और न भीड़ में एक आदमी बढ़ाने में मदद की है. बस इन लोगों से आप भाषण दिलवा लीजिए.’

उधर शाह के आने से पार्टी के जिला स्तर के नेता और सामान्य कार्यकर्ता खुश नजर आते हैं. वाराणसी महानगर के भाजपा जिलाध्यक्ष तुलसी जोशी कहते हैं, ‘शाह जी पार्टी को हर वार्ड और हर घर से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. पहले ऐसा नहीं था. पार्टी को उनके जैसे चार लोग और मिल जांए तो पूरे भारत में वो पार्टी की सूरत बदल देंगे. वो आम कार्यकर्ता को खुद फोन करते हैं. हम जब चाहें वो फोन पर उपलब्ध रहते हैं. ऐसा पहले कभी नहीं था.’

गुजरात, दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि अगर नरेंद्र मोदी किसी तरह से पीएम बन जाते हंै तो फिर भारतीय राजनीति और खासकर भाजपा की अपनी राजनीति में अमित शाह सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव वाले नेता होंगे.

खैर, मोदी को गुजरात का सीएम बनाने में सफल भूमिका अदा करने वाले अमित शाह अपनी तरफ से तो वह हर कोशिश करते नजर आ रहे हैं जिससे मोदी को वे पीएम बनवा सकें लेकिन समय की बंद मुट्ठी में क्या है यह तो वक्त ही बताएगा.

1 COMMENT

  1. Modi ke Shah aur Ram ke Hanuman ke bhagti men kitni samata hai ,sahaj hi samajh men aa jata hai. Isliye Sita (desh ki shaasan-vyawastha ) Rawan ke kaid (congress ke) se mukt ho kar desh ka bhula karengi.

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