मोदी का सवाल और उत्तर प्रदेश | Tehelka Hindi

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मोदी का सवाल और उत्तर प्रदेश

नरेंद्र मोदी का असर उत्तर प्रदेश भाजपा में उत्साह फूंकता दिख रहा है, पर वोट खींचने के लिहाज से क्या यह असर राम मंदिर मुद्दे की बराबरी कर सकता है?
फोटोः प्रमोद सिंह

फोटोः प्रमोद सिंह

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी की रैलियों के बाद राज्य में कलह से ग्रस्त भाजपा कुछ हद तक संभली हुई दिखने लगी है. पार्टी का लक्ष्य अगले लोकसभा चुनाव में 272 से ज्यादा सीटें जीतना है और प्रदेश के पार्टी नेता मानते हैं कि मोदी का प्रभाव इसमें अहम भूमिका निभाएगा.

पर क्या मोदी फैक्टर पार्टी को 90 के दशक में चली राम मंदिर लहर से भी ज्यादा वोट दिला सकता है ? पार्टी वरिष्ठ नेता और विधानपरिषद के सदस्य महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘ यदि हमारे पक्ष में 1990 की तरह की लहर न भी हो फिर भी पार्टी पूरी कोशिश करेगी कि एक वैसी ही लहर बन सके और इसका श्रेय मोदी के चुनाव अभियान को जाता है. ‘ एक और वरिष्ठ नेता बात को आगे बढ़ाते हुए यहां तक कहते हैं, ‘ हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी के भीतर आपसी कलह खत्म हो जाए. वैसे भी इस पर मोदी की लहर भारी पड़ेगी.’

दरअसल 1990 का दशक राज्य में भाजपा के लिए स्वर्ण काल रहा है. अक्टूबर,1990 में कार सेवा के चलते राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुंचने लगा था. नतीजतन 1991 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गई. सफलता की कुछ यही कहानी लोकसभा चुनाव में भी दोहराई गई. 1989 में पार्टी को प्रदेश में लोकसभा की नौ सीटें मिली थीं तो दो साल में यह आंकड़ा 52 पर पहुंच गया और 1998 के लोकसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या बढ़कर 57 हो गई. फिर एक साल बाद मध्यावधि चुनाव हुए. इनमें भाजपा 26 सीटें ही जीत सकी. उत्तर प्रदेश में उस समय से भाजपा की गिरावट का जो दौर शुरू हुआ तो पार्टी आगे नहीं बढ़ पाई. 2004 के लोकसभा चुनावों में जहां उसे 11 सीटें मिलीं वहीं तो 2009 में यह संख्या घटकर 10 हो गई.

इस बार मोदी प्रदेश में पांच रैलियां कर चुके हैं, राष्ट्रीय स्तर पर इनकी खूब चर्चा भी हुई. हालांकि इसके बाद भी उत्तर प्रदेश भाजपा में एक ऐसा वर्ग है जो  मानकर चल रहा है कि मोदी का जादू सवर्णों और शहरी वर्ग तक ही सीमित है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘ पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों का वोट बैंक सीधे-सीधे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा हुआ है, ऐसे में मोदी के लिए इस वर्ग को भाजपा से जोड़ पाना एक बड़ी चुनौती है. हां, लेकिन भाजपा के पाले में कुछ वोट जरूर बढ़ेंगे, लेकिन इस पर यह कहना कि मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए खड़ा करने से पार्टी को राम मंदिर आंदोलन जैसा समर्थन मिल जाएगा तो यह अतिशयोक्ति के अलावा कुछ नहीं है.’ पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले और  भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के करीबी एक नेता कहते हैं, ‘ मोदी को पार्टी अतिपिछड़े वर्ग के नेता के तौर पर पेश कर रही है. राजनाथ सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (2000-2002) थे तब उन्होंने पिछड़े वर्ग के 27 फीसदी कोटे के भीतर इस वर्ग को अलग से आरक्षण का फायदा देने की कोशिश की थी लेकिन बाद में पार्टी इस कोशिश को किसी नतीजे तक नहीं ले गई. इसलिए इस बात की संभावना कम ही है कि मोदी इस वर्ग के मतदाताओं को अपनी ओर खींच पाएं.’

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 4, Dated 28 February 2014)

1 Comment

  • ATI ATM-MUGDHTA KE TAHAT HI SAHI, LEKIN JANTA KE AADESH KE PAHLE HI BHAJPA KA MODI KO AGLA PRADHAN MANTRI SAMBODHIT KARNA KUCH THIK NAHIN LAGTA. AISA LAGTA HAI JAISE TANTR MEN KABIJ HONE KI LALAK KE CHALTE LOK KE MAHATV KO NAKARA JA RAHA HAI.