मेरी दुनिया मेरे लोग…

(मशहूर लेखिका कहानी के किरदारों की तलाश में शाहीन बाग़, नई दिल्ली पहुंचीं)

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नासिरा शर्मा शाहीन बाग में आंदोलनकारी ‘दादी’ के साथ।

शाहीन बाग की वह रात मेरे लिए बोलने की नहीं, महसूस करने की रात साबित हुई। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद, स्वतंत्रता संग्राम की तारीख़ और अपने अध्यापन काल के वह चंद साल जैसे अपने को दोहराने लगे थे। वह सारी बातें और यादें मेरे ज़हन की बंद सीपियों से खुलकर अचानक मोतियों की तरह जगमगाने लगी थीं।

जो आँखों के सामने था वह वर्तमान था। उससे तालमेल बिठाती मैं काफ़ी देर तक खोई खोई सी रही। ज़बान से शब्द ग़ायब हो चुके थे और दिल और दिमाग़ जज़्बात के भंवर में फंस चुके थे।

अचानक मेरे अहसास की दुनिया मुझसे मुख़ातिब हुई, नहीं पहचाना? यह अजनबी नहीं तुम्हारी कहानियों के किरदार हैं। तुम्हारे अपने जिनके लिए तुमने आज का सपना बुना था। देखो वह चुप्पी टूट गई।

मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई। मैंने इत्मिनान की सांस ली जैसे यहां कोई अब मेरे लिए अजनबी न रहा। औरतों के बैठने के घेरे के पीछे खड़ी मर्दों की बाउंड्री वाल पर नजऱ पड़ती है तो मुझे हर चेहरे में ‘सरहद के इस पार’ का रेहान नजऱ आता है जिसे देश का बंटवारा लानत लगता था।

‘पत्थर गली ‘की फऱीदा, ‘ताबूत ‘की हुमैरा, ’ठीकरे की मँगनी‘ की महरूख़ सचमुच वहां बूढ़ी होकर असमां खा़तून, बिलक़ीस बेगम और सरवरी के रूप में बैठी थीं। नजंरें घुमाईं तो पीछे की क़तार में ‘चार बहनें शीश महल ‘की अधेड़ अवस्था में बैठी दिखीं जिन्होंने चूड़ी के झाबों में छुपी बन्दूकों को हाथो में उठा लिया था और यहां उसी तेवर और आत्मविश्वास से संविधान पर अड़ी बैठी हैं।

अपनों के पहलू से लगे कमसिन लडक़े-लड़कियां जो चुपचाप बैठे ठीक अपने दादा, नाना के गुजऱे बचपन की तरह तारीख़ की दूसरी करवट के गवाह बने स्टेज से होती बातों को ग़ौर से सुन रहे थे। मुझे सबीना के चालीस चोर की कहानी की उस मासूम बच्ची की याद दिला गए जो मरदुम शुमारी के लगाए गए नम्बरों को सिर्फ इस लिए मिटाती है कि कहीं यह चालीस चोरों ने न लगाएं हों। वह तय करती है कि मुझे मरजीना बन इन चोरों से सबको बचाना है।

जवान मांएं गोद में दूध पीते बच्चों को लिए बैठी थीं। कुछ दोशीज़ाएं सामने से गुजरीं जिनमें खुदा की वापसी की फऱज़ाना भी खड़ी नजऱ आई जो उनसे कह रही थीं ‘मैं तो जाहिल मुल्ला की दाढ़ी ग़ुस्से में आकर कुतरना चाहती थी मगर तुम लोगों ने तो कमाल कर डाला उन्हें सिरे से ही नकार दिया?’

‘करना पड़ा आपा वरना इन सब के चक्कर में तो हम एक सदी और पीछे चले जाते।’

‘अपने कानून को दूसरों के मुंह से सुनने से अच्छा है ख़ुद से पढऩा, समझना और अपने अधिकार के लिए लडऩा’ ‘वही तो किया आपा हमारी मां व नानी, दादी ने बिना किसी नेता के हम अब ख़ुद अपने रहबर बन बैठे हैं।’ वह हंसी।

मुझे याद आया मैंने कहीं लिखा था ‘इन्सान दो बार पैदा होता है। पहली बार अपनी मां की कोख से और दूसरी बार हालात की मार से।’

आज महसूस हुआ जब मौत और जि़न्दगी सामने आन खड़ी हो तो इन्सान जीने की तमन्ना करता है।
वह रात बीत गई।

सुबह नमूदार हुई तो समां ही बदल चुका था।

शाहीन परिन्दे को ऊंची उड़ान भरने से कौन रोक सका जो अब कोई रोकता? शाहीन मोहल्लों, शहरों के ऊपर से उड़ान भरता रहा। लोगो के दिलों में उड़ान की ललक भरता हुआ। यह जानते हुए भी कि हम ख़तरे की तरफ़ बढ़ रहे, मगर सर पर सवार सौदा कहता है कि क्या फर्क पड़ता है कि हम $खतरे की तरफ बढ़ रहे हैं या $खतरा हमारी तर$फ बढ़ रहा है।

साझी भारतीय सभ्यता में सांस लेने वाले मेरे सारे किरदार एक बार फिर सामने थे चाहे वह ‘आमोख़ता’ के वीरजी हों या फिर ‘इन्सानी नस्ल’ की सविता हो या फिर ‘चांद तारे की शतरंज’ का पतंग बनाने वाला या फिर ‘उसका लडक़ा’ का मूंगफली बेचने वाला या फिर अफ़सर शाही की ‘शालमली’ हो या फिर ‘अक्षयवट’ का मुरली हो या फिर ‘कुइयांजान’ का डॉ. कमाल हो या फिर ‘ज़ीरो रोड’ का बेकारी झेलता एमए पास सिद्धार्थ हो या फिर ‘पारिजात’ के प्रो. प्रह्लाद दत्त या फिर ‘जि़न्दा मुहावरा का’ इमामउद्दीन जिसने देश के बंटवारे के बाद नए बने देश में जाने की जगह अपने वतन में रहना पसन्द किया। वह सब के सब जमा हो रहे हैं आज़ादी की चाह में हम क़दम, हम आवाज़ हो उठे हैं।

यही तो हमारा भारतीय समाज का ताना-बाना है। जो कोशिशों के बाद भी नहीं टूट पाता है।

क्योंकि हम जान चुके हैं कि हम एक दूसरे के बिना न रह सकते हैं न जी सकते हैं। यही हमारा सच है। यही हमारी पहचान है। यही हमारा ईमान है। यही हमारा संविधान है।

 

(लेख हिंदीवाणी ब्लॉग से साभार)