मुलायम सिंह यादव: मैं हूं और नहीं भी

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इसके बाद मुलायम सिंह के तीन साल रक्षा मंत्रालय और विपक्ष की राजनीति में बीते. अब 1999 का साल आ गया. तेरह महीने पुरानी अटल बिहारी वाजेपयी की केंद्र सरकार गिर गई. सोनिया गांधी तमाम विपक्षियों के समर्थन की चिट्ठी लेकर राष्ट्रपति भवन पहुंची थी. इसमें मुलायम के समर्थन की चिट्ठी भी थी.  इस समय मुलायम ने विचित्र कारनामा दिखाया. उनके समर्थन की चिट्ठी सोनिया लहरा रही थीं और वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके घोषणा कर रहे थे कि कांग्रेस को समर्थन नहीं देंगे. वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस वाकये का जिक्र अपनी किताब ‘माइ कंट्री माइ लाइफ’ में किया है. उन्होंने लिखा है कि दिल्ली के सुजान सिंह पार्क में 20 अप्रैल, 1999 को उनकी गुप्त मुलाकात मुलायम सिंह के साथ हुई थी.

अक्सर मुलायम सिंह का अवसरवाद विरोधाभास पैदा करता है. मसलन जिस लेफ्ट के साथ 1989 और 1996 में वे सरकार बना चुके हैं उसी को ठेंगा दिखाकर 2008 में वे परमाणु करार के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार को अभयदान दे देते हैं. इससे पहले वे परमाणु करार का जमकर विरोध कर रहे थे. इसी तरह मई महीने में वे उस यूपीए सरकार का तीन साल का रिपोर्ट कार्ड जारी करने पहुंच गए जिसमें उनका रत्ती भर भी योगदान नहीं था.

भविष्य में केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने के लिए मुलायम सिंह को कांग्रेस के समर्थन की दरकार होगी इसलिए वे कांग्रेस को ज्यादा नाराज नहीं करना चाहते

एक समय ऐसा भी आया जब उनका यादव-मुसलिम समीकरण ध्वस्त होता दिखा. 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने उन कल्याण सिंह को सपा में शामिल कर लिया जो घूम-घूम कर खुद को बाबरी मस्जिद विध्वंस का नायक बताते फिरते थे. इसका खमियाजा भी उन्हें चुकाना पड़ा. सपा 39 से 22 सीटों पर आ गई और उनके सारे मुसलिम प्रत्याशी चुनाव हार गए. हालांकि मुसलिम मानसिकता पर उनकी पकड़ चमत्कारिक है. सिविल न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर लेफ्ट उन्हें यह कह कर कांग्रेस से दूर करने की कोशिश करता रहा कि मुसलमान अमेरिका विरोधी है, पर मुलायम सिंह का आकलन कुछ और ही था. उनके हिसाब से मुसलमान अमेरिका से नहीं मोदी से घबराता है और इस मामले में उन्होंने कल्याण सिंह के अलावा कभी कोई गलती नहीं की है. वे मीडिया को कोई भी ऐसा मौका नहीं देते जिससे कि उनके ऊपर भाजपा के करीबी होने का ठप्पा लगे. जबकि राजनीतिक हलकों में यह बात मशहूर है कि अटल बिहारी वाजेपयी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बेहद मधुर थे. 2003 में उन्होंने भाजपा के अप्रत्यक्ष सहयोग से ही प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी. 2012 में उनका आकलन सच भी साबित हुआ. पश्चिम बंगाल से मुसलमानों ने लेफ्ट को गायब कर दिया, जबकि उत्तर प्रदेश में सपा को अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल हुई है. 45 मुसलमान विधायक उनके दल में हैं.

इसी 2012 ने मुलायम सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को नया जीवन दिया है. उनका बेटा किसी देश के आकार वाले प्रदेश का मुख्यमंत्री है. बहू, भाई, भतीजा सांसद हैं. अगले लोकसभा चुनाव तक रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव भी चुनाव लड़ने के योग्य हो जाएंगे. अगर सभी चुनाव जीत गए तो परिवार में सांसदों की संख्या पांच हो जाएगी.  हिमाचल और गोवा जैसे राज्यों में लोकसभा की कुल सीटें इतनी हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री पद की आकांक्षा रखना कोई गलत बात भी नहीं है. इसी उधेड़बुन में हाल के दिनों में उन्होंने एक के बाद एक फैसले किए और बदले हैं. राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने ममता बनर्जी के साथ स्टैंड लिया और फिर अगले ही दिन पलट गए. एफडीआई के मसले पर विपक्षी पार्टियों के साथ जाकर वे भारत बंद भी करते हैं और बयान देते हैं कि सरकार को कोई खतरा नहीं है. कभी वे जंतर-मंतर पर तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाशते हैं और अगले ही दिन उसे नकार देते हैं.

मुलायम सिंह 2014 को आखिरी मौके के रूप में देख रहे हैं. यह सही भी है. उनका स्वास्थ्य भी इसकी बड़ी वजह है. एक पुराने समाजवादी बताते हैं कि उनके ऊपर अल्जाइमर्स का हल्का-सा असर होने लगा है. वे आगे बताते हैं, ‘केंद्र में मुलायम सिंह या तीसरे मोर्चे की सरकार बिना कांग्रेस या भाजपा के समर्थन के बन नहीं सकती.’ इसी दुविधा में वे पल में तोला पल में माशा वाला रंग अख्तियार कर रहे हैं. वे कांग्रेस को इतना नाराज नहीं करना चाहते कि अवसर आने पर कांग्रेस उन्हें ठेंगा दिखा दे. उनकी राजनीति का जो चरित्र है उसमें भाजपा से समर्थन की कल्पना नहीं की जा सकती. जहां तक सड़कों पर उतर कर विरोध करने का सवाल है तो जनता के बीच एलपीजी-डीजल की बढ़ी कीमतों का विरोध करना जन-हितैषी चेहरा बनाए रखने की मजबूरी है.

सरकार को बनाए रखने के पीछे की एक और मजबूरी है उत्तर प्रदेश की सरकार. अभी इसे सत्ता में आए सिर्फ छह महीने  हुए हैं. इसका कामकाज संतोषजनक नहीं रहा है. ऊपर से छह-छह सांप्रदायिक दंगों ने सरकार का चेहरा बिगाड़ कर रख दिया है. अखिलेश यादव के कोर ग्रुप के एक सदस्य बताते हैं, ‘हमारे घोषणापत्र की योजनाएं अभी तक लागू नहीं हो सकी हैं. इन्हें लागू करके सरकार जनता के बीच एक अच्छा संकेत दे सकती है. इसके लिए हमें केंद्र सरकार की मदद की जरूरत पड़ेगी. हमारी रणनीति यह है कि फरवरी तक इस सरकार को बनाए रखा जाए. लेकिन अगला आम बजट इसे पेश नहीं करने दिया जाएगा. वरना यह सरकार फिर कोई नया गुल खिला सकती है.’

सरकार को समर्थन देने की मुलायम सिंह की मजबूरी उनके और अखिलेश के ऊपर चल रहे आय से अधिक संपत्ति के आठ मामलों के कारण भी है. इनकी जांच सीबीआई कर रही है. कहा जाता है कि पिछले कई मौकों पर केंद्र सरकार ने उन्हें इसी के बूते अपने पाले में खड़ा किया है. यही समस्या मायावती पर भी लागू होती है. यही वजह है कि तीनों पार्टियां उत्तर प्रदेश में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं और केंद्र में एक ही पाले में खड़ी हो जाती है. कांग्रेस के पाले में जाने की मुलायम सिंह की मजबूरी के पीछे एक बड़ी वजह मायावती भी हैं. न तो वे राज्य में सत्ता में हैं न ही केंद्र में. अगर मुलायम सिंह समर्थन वापस ले लेते हैं तो भी सरकार नहीं गिरने वाली क्योंकि तब मायावती केंद्र की सरकार में शामिल होने के लिए तैयार बैठी हैं. मुलायम सिंह की रणनीति यही है कि अगले चुनाव चाहे जब भी हों बसपा के पास जनता को दिखाने के लिए कुछ न रहे. इसलिए वे कांग्रेस-बसपा के बीच किसी तरह के प्रेम प्रसंग को पनपने नहीं देना चाहते. पार्टी की एक सोच यह भी है कि जिस तरह का केंद्र सरकार का रवैया है उसमें दिनों-दिन इसकी दुर्गति तय है इसलिए सरकार से दूर रहकर इसे सहारा देते रहने में ही फायदा है.

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