मी टू के बहाने मानव पर हावी होना

''गांधी प्रत्येक नर को ''अर्द्धनारीश्वर’’ और प्रत्येक नारी को अर्द्धनरेश्वर बनाना चाहते थे।’’रामधारी सिंह ''दिनकर’’

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भारत में मी-टू अभियान के आगमन के साथ ही स्त्री-पुरुष संबंधों में हो रहे घालमेल और यौन शोषण को लेकर तीखी बहस के साथ, आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया है। गंभीरता से शुरु हुआ यह अभियान धीरे-धीरे फूहड़ता की ओर अग्रसर है, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज इतनी गहरी और सीधी चोट सह पाने की स्थिति में नहीं है। वहीं कुछ दिन पहले लिव-इन को लेकर चली बहस भी कमोवेश बिना किसी नतीजे के हल्ले गुल्ले की भेंट चढ़ गई थी। उपरोक्त दोनों ही परिस्थितियों अर्थात ”मी-टू और लिव-इन’’ को क्या नई चेतना की अनिवार्यताओं के तौर पर देखा जा सकता है ? मी-टू एक ऐसा आंदोलन है जो समाज में परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। वही लिव-इन व्यक्तिगत आंकाशओं को मूर्तरूप देने का प्रयोग है। समाज में आ रहा खुलापन जितना व्यापक दिखाई पड़ रहा है, उतना वास्तव में है नहीं, साथ ही इसमें वैचारिक स्पष्टता का अभाव नजर आ रहा है और यह तात्कालिक अभिव्यक्ति अधिक प्रतीत हो रहा है।

ऐसे तमाम महान लोग जिनके बारे में हम लगातार चर्चा करते रहते हैं, उनमें गांधी ही एकमात्र व्यक्ति नजर आते हैं, जो कि अपने यौन जीवन को लेकर चर्चा करते हैं। उस पर सार्वजनिक तौर पर बहस भी करते हैं और जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में ब्रह्मचर्य को लेकर बेहद गंभीरता से व्यावहारिक प्रयोग भी करते हैं ! इस वजह से वह निंदा के पात्र भी बनते हैं। वे विवाह को बहुत आवश्यक नहीं समझते और विवाह के भीतर रहते हुए भी ब्रह्मचर्य की वकालत करते हैं और एक हद तक उसका पालन भी करते हैं। वे कहते हैं कि व्यभिचार के लिए किसी बाहरी साथी की आवश्यकता नहीं है और यह विवाह के भीतर भी संभव हो सकता है। वे केवल सन्तोत्पत्ति के लिए ही यौन संबंधों की आवश्यकता महसूस करते हैं। उनका मानना था, ”ब्रह्मचर्य का अर्थ है, मन-वचन-काया से समस्त इन्द्रियों का संयम। इस संयम के लिए ऊपर बताये (आँख, कान, भोजन संबंधी) त्यागों की आवश्यकता है, इसे मैं दिन प्रतिदिन अनुभव करता हूँ। त्याग के क्षेत्र की सीमा ही नहीं है, जैसे ब्रह्मचर्य की महिमा की कोई सीमा नहीं है। ऐसा ब्रह्मचर्य अल्प प्रयत्न से सिद्ध नहीं होगा। करोड़ों लोगों के लिए वह सदा केवल आदर्श रूप रहेगा।’’ वे तो यहां तक कहते हैं कि ”जब तक विचारों पर इतना अंकुश प्राप्त नहीं होता कि इच्छा के बिना एक विचार भी मन में न आए, तब तक ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता।’’ यहां यह उल्लेख भी आवश्यक है कि गांधी सत्य व अहिंसा के बाद तीसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्रत ब्रह्मचर्य को ही मानते हैं। उनके अनुसार किसी ने भोग-विलास से सत्य पाया हो ऐसी एक भी मिसाल हमारे सामने नहीं है। वे कहते हैं कि पूर्ण अहिंसा का पालन भी ब्रह्मचर्य के बिना संभव ही नहीं है। 5 अगस्त 1930 को यरवदा जेल, जिसे उन्होंने यरवदा मंदिर का नाम दिया था में ब्रह्मचर्य पर प्रवचन देते हुए कहते है, ”जनन-इन्द्रिय (लिंग-योनि) के विकारों पर काबू पाना ही ब्रह्मचर्य का पालन है, ऐसा माना गया है। मुझे लगता है यह अधूरी और गलत व्याख्या है। तमाम विषयों पर रोक, काबू ही ब्रह्मचर्य हैं जो दूसरी इंद्रियो की हवसों को जहां तहां भटकने देता है और एक ही इन्द्रिय को रोकने की कोशिश करता है, वह निकम्मी कोशिश करता है, इसमें क्या शक है ?’’

हम मी-टू जैसे अभियानों की विवेचना करते हैं तो पाते हैं कि यह अंतत: एक मनुष्य की दूसरे मनुष्य पर सत्ता बनाए रखने की प्रवृत्ति का ही परिणाम है। दुखद तो यह है कि अब इस मी-टू अभियान में पुरुषों की व्यथा भी सामने आने लगी है। उनके यौन शोषण के किस्से पहले सुनने में तो आते थे पर मी-टू के बाद कुछ पुरुष पीडि़त भी खुलकर सामने आए हैं। इसने इस समस्या को नया स्वरूप प्रदान कर दिया है। उधर यदि हम तमाम सामाजिक सर्वेक्षणों एवं राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो पाते हैं कि भारत के 50 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चे कभी न कभी (18 वर्ष की उम्र के पूर्व) यौन शोषण एवं यौन प्रताडऩा का शिकार हुए हैं। इससे हमें समझना चाहिए कि भारत की आधी से ज़्यादा आबादी आज प्रत्यक्ष तौर पर मी-टू आंदोलन का हिस्सा है। यह अलग बात है कि पारिवारिक व सार्वजनिक वर्जनाएं उन्हें अपने ऊपर हुए अत्याचार की अभिव्यक्ति का मौका नहीं देती। परंतु यह एक कटु सत्य है।

गांधी जिस संयम व यौन पवित्रता के हिमायती रहे हैं, उसमें संभवत: लिव-इन जैसे किसी संबंध की कोई गुंजाइश ही नहीं है। उनका पहला बड़ा अनशन (7 दिन) दक्षिण अफ्रीका में उनके अपने बेटे एवं एक विवाहित स्त्री के यौन संबंधों के खिलाफ ही था। भारत में साबरमती आश्रम में भी उन्होंने इसी बात को लेकर दो दिन का अनशन किया था। यह तय है कि समय के साथ स्थितियां बदलती हैं, लेकिन जीवनमूल्य तो शाश्वत बने रहते हैं। जहां एक मत यह मानता है कि किसी एक के साथ बंधे रहना, भले ही वह विवाह ही क्यों न हो, मानव स्वभाव के सर्वथा अनुकूल नहीं है। ऐसा मत अधिकतर यौन इच्छाओं को लेकर दिया जाता है। वहीं गांधी कहते हैं कि सम्पूर्ण मानवता से प्रेम करना हो तो आप किसी एक के ही साथ हमेशा के लिए प्रेम में बंध कर नहीं रह सकते। हमें अपने प्रेम का विस्तार करना होगा। माक्र्स कहते हैं, ”दुनिया में शोषण की शुरुआत पुरुष द्वारा स्त्रियों के शोषण से हुई है।’’ मी-टू अभियान इसे आज प्रमाणित भी कर रहा है। आखिकार सारा खेल अपनी सत्ता को स्थापित करने का ही है। मी-टू को लेकर जो तमाम उदाहरण अभी हमारे सामने आ रहे हैं, वे काफी पढ़े-लिखे व प्रभावशाली लोगों के हैं और आरोपी भी वैसे ही वर्ग के हैं। परन्तु यह स्थिति वहीं तक सीमित नहीं है। कभी अपने शहर के उस चैराहे पर जाइए जहां मजदूर सुबह काम की तलाश में झुण्ड में खड़े रहते हैं। वहां ध्यान से सुनिए कि जो लोग मजदूर लेने वहां आते हैं, वे महिला श्रमिकों के लिए किस तरह की भाषा का खुलकर सार्वजनिक तौर पर प्रयोग करते हैं और उनसे मजदूरी के अलावा और क्या-क्या उम्मीद रखते हैं। यह पूरा मामला आखिर पुरुष वर्चस्व का ही तो है। जबकि गांधी कहते हैं, ”स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का कोई समझौता नहीं कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए जो पुरुषों पर न लगाया गया हो। पुत्रों और पुत्रियों में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। स्त्री पुरुष दोनों के साथ समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए।’’ परंतु यह समानता आज भी दुर्लभ ही है।

आज हम जिस समय में रह रहे हैं उसमें किसी भी प्रकार के नियंत्रण फिर वह यौनेच्छा पर ही क्यों न हो, को अप्रासंगिक मान लिया गया है। ऐसे में गांधी का ब्रह्मचर्य का विचार क्रांतिकारी नहीं बल्कि दकियानूसी की श्रेणी में आ जाता है। परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। गांधी स्वयं मानते रहे कि पूर्ण ब्रह्मचर्य बहुत थोड़े से लोगों के लिए संभव हो सकता है। परंतु यदि हम इसे संयम का नाम देें तो काफी हद तक लोग इसका पालन कर पाएंगे। आज हम जो कुछ प्रचार माध्यमों आदि के द्वारा देख व सुन रहे हैं, वह हमें विचलित कर रहा है। हमारा वर्तमान आहार, बदलाव की अपेक्षा कर रहा है। हमारी दिनचर्या भी बदलाव की मांग कर रही है। तमाम बीमारियां हमें इसी अनियमितता की वजह से घेर रही हैं। और वैश्विक व भारत के स्तर पर बढ़ती मानव तस्करी, पोर्नोग्राफी, यौन पर्यटन, बच्चों का दैहिक शोषण जैसी तमाम व्याधियां हमें समझा रहीं है कि वस्तुत: हमारा जीवन संयम में ही सुरक्षित रह सकता है। गांधी जी ने कभी नहीं कहा कि उनके पास भारत की सभी समस्याओं का हल है। परंतु वे अपनी तरफ से समाधान सामने रखते रहे। उनके पोते गोपाल कृष्ण गांधी उनकी जिन अनूठी विशेषताओं का जि़क्र करते हैं, उनमें प्रमुख है, ”उन्हें मृत्यु से भय नहीं था। वे पराजय से डरते नहीं थे। उन्हें मूर्ख दिखने में भी भय नहीं लगता था और चौथी व सर्वाधिक महत्वपूर्ण कि उन्हें अपनी गलती मानने में डर नहीं था।’’ गांधीजी ने ब्रह्मचर्य की अपनी बात को कभी गलत नहीं माना था। हम आज अपने असंयमित व्यवहार, आचरण व उपभोग से इस पृथ्वी के लिए जोखिम बढ़ाते जा रहे हैं। गांधी को नकारना और स्वीकारना दोनों ही फैशन बनते जा रहे है। जबकि आवश्यकता उनके विचारों को अपनाने की है। हमारा नज़रिया क्या हो, कैसा हो यह महत्वपूर्ण है। वे ऐसी दुनिया की कल्पना करते थे जिसमें न्यूनतम विवाद हों। और यदि होते भी हैं तो उनका अहिंसात्मक समाधान निकल सके। वे चाहते थे कि स्त्री-पुरुष दोनों एक दूसरे की ”मुक्ति’’ में सहयोगी बने! ब्रह्मचर्य का प्रयोग इसी हेतु उठाया गया प्रयास था। भगवान सिंह, गांधी और दलित भारत जागरण में लिखते हैं, ”भारत में बेटे को ही बुढ़ापे का सहारा माना जाता रहा है। लेकिन, गांधी ने जीवन के अंतिम दिनों में चलने के लिए आभा एवं मनु का सहारा लेकर इस स्त्री विरोधी समाज को यह संदेश दिया कि लड़कियां भी लड़के की तरह बुढ़ापे का सशक्त सहारा हो सकती हैं। फिर जो राष्ट्रपिता (गांधी) को सहारा दे सके, ऐसी शक्ति भला राष्ट्र के निर्माण में कैसे उपेक्षित की जा सकती है।’’