मानसिक रोगियों से किनारा क्यों?

मैं पहले जिस अपार्टमेंट में रहती थी, वहाँ कभी-कभी किसी युवक के ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने, रोने की आवाज़ आती थी। पता चला कि एक घर में एक लडक़े की मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं रहती और जब वह बेक़ाबू हो जाता है, तो परिवार उसे रस्सियों से बाँध देता है। देश में ऐसे सैकड़ों क़िस्से हैं, जो मानसिक रोगियों के प्रति परिवार और समाज की सोच को सामने रखते ही हैं, साथ ही सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल भी खड़े करते हैं।

दरअसल बीमारियों और उनके इलाज को लेकर जब चर्चा होती है, तो उसका दायरा शारीरिक बीमारियों तक ही सिमटकर रह जाता है। मानसिक स्वास्थ्य का उसमें ज़िक्र नहीं किये जाने की प्रवृत्ति जगज़ाहिर है। ऐसा क्यों होता है? इसके कई प्रमुख कारण हैं; मसलन- मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का अभाव। इसे कलंक के तौर पर देखना। तनाव, अवसाद, चिन्ता को बीमारी के तौर पर स्वीकार नहीं करना। झाडफ़ूँक के चक्कर में पड़े रहना। सार्वजनिक रूप से इसे छुपाना। इसे परिवार के लिए परेशानी का सबब मानना। समाज की असंवेदनशीलता, सरकारों द्वारा भी इस मुद्दे को अधिक महत्त्व नहीं देना। इसकी भारी क़ीमत भुक्तभोगी व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र सबको चुकानी पड़ती है।

भारत में लोगों की मानसिक स्वास्थ्य का ख़ूलासा स्वास्थ्य मंत्रालय और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने कोरोना महामारी के शुरू होने से ठीक पहले दिसंबर, 2019 में जारी जिस रिपोर्ट में किया था, जिसके मुताबिक हर सात भारतीयों में से एक मानसिक रोगी है। इस हिसाब से भारत में अदांज़न 20 करोड़ लोगों को इलाज की ज़रूरत है।

कोरोना महामारी को क़रीब 15 माह हो गये हैं और अब मानसिक रोगियों की संख्या बढऩे की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। क्योंकि पिछली महामारियों का इतिहास यही बताता है कि ऐसे मुश्किल क़रीब में मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी कहना है कि मौज़ूदा समय यानी महामारी में मानसिक रोगियों की स्थिति और ख़राब हो सकती है। कोरोना संक्रमित मरीज़, इससे ठीक हो चुके लोग, गर्भवती महिलाएँ, युवा, बुजुर्ग, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता, खिलाड़ी, आपात स्थिति में काम करने वाले भी मानसिक तनाव के दायरे में शमिल हैं। यही नहीं, इस महामारी की वजह से पैदा अवसाद, चिन्ता का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गर्भवती महिलाओं और गर्भधारण के बारे में विचार करने वाली महिलाओं को विशेष सहयोग प्रदान करने की अपील की है। भारत में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च इस मुश्किल घड़ी में गर्भावस्था व प्रजनन वाले मुद्दे से सम्बन्धित शोध आधारित सूचनाएँ लोगों को मुहैया करा रही है।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर

प्राकृतिक आपदा हो या कोई अन्य त्रासदी उसका व्यक्ति, परिवार और समाज की मानसिक स्वास्थ्य पर अल्पकालिक या दीर्घकालिक असर पड़ता ही है। ताज़ा उदाहरण अफ़ग़ानिस्तान में तेज़ी से बदल रहे राजीनतिक हालात के सन्दर्भ में समझा जा सकता है। अफ़ग़ानिस्तान की अधिकांश जनता तालिबानियों के 20 साल पुराने ज़ुल्मों को याद करके डरी हुई है। अफ़ग़ानी लड़कियों, महिलाओं की ताज़ा मानसिक हालत उनके इन बयानों से जानी जा सकती है, जो रोज़ाना हम सुन, पढ़ रहे हैं। इसी तरह आतंकवाद से प्रभावित परिवारों की मानसिक स्वास्थ्य को समझने की ज़रूरत है।

भारत में सन् 1993 में महाराष्ट्र के लातूर और सन् 2001 में गुजरात में जो भूकम्प आया, उसमें कितने लोग मारे गये; आर्थिक नुक़सान भी विकट हुआ। मगर जो जीवित बच गये और उन्होंने यह सब अपनी आँखों से देखा, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर काफ़ी असर हुआ। भोपाल गैस त्रासदी को कौन भूल सकता है? जो ज़िन्दा बच गये, उनमें से अधिकांश शारीरिक रूप से बीमार हैं और अवसाद, चिन्ता से आज तक उनका पीछा नहीं छूटा है।

भारत में मानसिक पेशेवरों के द्वारा भोपाल गैस त्रासदी, बम ब्लास्ट, भूकम्प आदि त्रासिदयों का विस्तार से अध्ययन तो किया गया; लेकिन प्रशासकों के बीच इस मुद्दे को लेकर जागरूकता की कमी, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े धब्बे और पेशवरों की कमी के कारण मानसिक स्वास्थ्य पर कोई कामयाब हस्तक्षेप नज़र नहीं आता। तक़रीबन 135 करोड़ की आबादी वाले देश में महज़ 8,000 पेशेवर हैं और वो भी अधिकांश शहरी इलाक़ों में। गाँवों से भूत भागाने वाली ख़बरें बताती हैं कि वहाँ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों के बीच कितनी ग़लत धारणाओं ने जगह बनायी हुई है और इसके प्रसार को बल इसलिए भी मिलता है, क्योंकि वहाँ पेशेवर मनोचिकित्सकों की भारी कमी है। भारत सरकार ने 10 अक्टूबर, 2014 को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति लागू की थी और इसका उद्देश्य भारतवासियों की मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखना है। मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों के इलाज के वास्ते उन तक सेवाएँ पहुँचाना और इसके प्रति जागरूकता का प्रचार-प्रसार भी करना है। पर यह कितनी दुरस्त है? एक रिपोर्ट के मुताबिक, अंदाज़न 20 करोड़ देशवासियों को मानसिक बीमारियों के इलाज की दरकार है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का 2019 का एक अध्ययन बताता है कि देश में जिन लोगों ने अपनी ज़िन्दगी का अन्त ख़ुद किया, वे पारिवारिक दिक़्क़तों में थे। जिन लोगों ने अपनी ज़िन्दगी को ख़ुद मौत के हवाले किया, उनमें से एक-चौथाई दिहाड़ी मज़दूर थे। यह इस ओर भी इशारा करता है कि ग़रीबी और भावनात्मक परेशानियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। बहरहाल कोरोना-काल में मानसिक स्वास्थ्य के कई पहलुओं पर बहस छिड़ गयी है और समाज के भीतर इस बाबत जागरूकता फैलाने की दिशा में काम करने की बहुत ज़रूरत है।

हाल ही में जामा पैडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय शोध रिपोर्ट के मुताबिक, कोराना-काल के दौरान युवाओं में मानसिक परेशानियाँ दोगुनी हो गयीं। महामारी से पहले 10 में से केवल एक युवा में अवसाद व चिन्ता के लक्षण मिले थे; लेकिन इस महामारी में हर चार युवाओं में से एक को अवसाद का सामना करना पड़ा, तो हर पाँच में से एक युवा चिन्ता और चिड़चिड़ेपन का शिकार हुआ।