मातम में मार्केटिंग

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उत्तराखंड की त्रासदी जहां अपनी भयावहता के लिए लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहेगी तो दूसरी तरफ यह राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से द्वारा मातम के इस मौके को भुना कर सस्ता प्रचार पाने की कोशिशों के लिए भी याद रखी जाएगी. इस तबाही के बाद से ही पूरे देश से लोग मदद के लिए आगे आए. विभिन्न राज्य सरकारों और नेताओं ने जहां शांतिपूर्वक और गरिमापूर्ण तरीके से सहायता राशि से लेकर राहत सामग्री उत्तराखंड पहुंचाई वहीं कुछ नेता ऐसे भी रहे जो इस मौके पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश करते दिखे. टीवी कैमरों के सामने एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हुए आंध्र प्रदेश के टीडीपी और कांग्रेसी सांसदों की तस्वीरें यह बताने के लिए काफी थीं कि मातम के इस मौके को भुनाने की जद्दोजहद किस हद तक पहुंच गई है.

हालांकि इसकी शुरुआत तो त्रासदी के साथ ही हो गई थी, लेकिन दिन गुजरने के साथ यह और गहरी होती गई. सस्ती लोकप्रियता पाने की इस राजनीति को एक अलग ऊंचाई पर ले जाने का आरोप गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लगा. इसकी शुरुआत उस खबर से हुई जिसके मुताबिक गुजरात सरकार ने एक दिन के भीतर ही उत्तराखंड आपदा में जगह-जगह फंसे 15 हजार गुजरातियों को सुरक्षित निकालकर उनके घर पहुंचा दिया था. इस काम के लिए मोदी को ‘रैंबो’ करार देते हुए एक अखबार ने दावा किया कि गुजरातियों को देहरादून के सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए 80 टोयोटा इनोवा गाड़ियां मंगाई गईं. लोगों को बचाने और सकुशल घर तक पहुंचाने के लिए चार बोइंग विमानों के साथ 25 लग्जरी बसों की भी सहायता ली गई. मोदी को महामानव बताने वाली यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई. विरोधी दल इस दावे को असंभव और हास्यास्पद ठहराते नजर आए तो मोदी समर्थक इसे उनकी काबिलियत का एक और प्रमाण बताते. गुजरात सरकार की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ था? सूत्रों की मानें तो 15 हजार लोगों को बचाने की खबर बड़ी हद तक कोरी अफवाह थी जो मोदी की पीआर एजेंसी एपको की तरफ से फैलाई गई थी. तहलका ने उत्तराखंड में राहत कार्य का काम देख रहे गुजरात सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदीप कुमार से बात की तो उनका कहना था, ’15 हजार का कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है. हां, हरिद्वार से अब तक लगभग 1,800 के करीब लोगों को गुजरात भेजा गया है. बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो राज्य सरकार नहीं बल्कि खुद के इंतजाम से वापस गुजरात गए हैं.’

हरिद्वार के शांति कुंज में गुजरात सरकार का सबसे बड़ा कैंप है. वहां के एक अधिकारी विष्णु पंड्या कहते हैं, ’15 हजार लोगों को निकाले जाने की बात तो हमें नहीं पता है. हां, हमारे यहां से लगभग 2000 के करीब गुजराती लोगों को गुजरात सरकार ने अब तक अपनी व्यवस्था से गुजरात भेजा है.’  हरिद्वार के अलावा देहरादून और ऋषिकेश में भी गुजरात सरकार के कैंप लगे हैं लेकिन ये कैंप हरिद्वार के कैंप से बेहद छोटे हैं. ऐसे में अगर हम बाकी दो अन्य कैंपों से भी 2000-2000 लोगों को जोड़ दें तो आंकड़ा छह हजार तक पहुंचता है, जो 15 हजार के आधे से भी कम है.

ऐसी खबरें भी आईं कि गुजरात सरकार ने गुजरात के लोगों को सीधा वहीं से बचाया जहां वे फंसे थे. लेकिन गुजरात सरकार की वेबसाइट पर 21 और 22 जून को बचाए गए जिन लोगों का नाम दर्ज है उनकी आपबीती कुछ और ही बताती है. उन्हीं लोगों में से एक विट्ठलभाई पटेल कहते हैं, ‘मैं गौरीकुंड में फंसा हुआ था. काफी संघर्ष के बाद सेना की मदद से किसी तरह हरिद्वार पहुंचा. वहां गुजरात सरकार के राहत कैंप में संपर्क किया. फिर वहां से उन्होंने आगे अहमदाबाद जाने के लिए मेरी मदद की.’ यही कहानी मयूर शाह की भी है. वे जोशीमठ में फंसे थे. शाह बताते हैं,’ वहां से हरिद्वार आने के लिए 15 हजार रुपये में प्राइवेट टैक्सी की. गुजरात सरकार के कुछ अधिकारियों से हमारी फोन पर जरूर बात हुई थी लेकिन हरिद्वार तक हम अपनी व्यवस्था से ही पहुंचे थे. बाद में सरकार के राहत शिविर की तरफ से हमें अहमदाबाद भेजने की व्यवस्था की गई.’

यही व्यवस्था लगभग हर राज्य सरकार ने की है. यानी सेना लोगों को जहां वे फंसे होते हैं वहां से बचाकर हरिद्वार और देहरादून जैसे बेस कैंपों तक लाती है. फिर वहां लोग अपने-अपने राज्यों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में जाते हैं या फिर अन्य  शिविरों में. गुजरात सरकार ने भी ऐसा ही किया. लेकिन विभिन्न माध्यमों से ऐसी खबरें आईं मानो बाढ़ में फंसे गुजरातियों को गुजरात सरकार ने चुन-चुन कर निकाला हो और फिर उन्हें उनके घर भेजा हो. अहम सवाल यह उठता है कि इस पूरे दुष्प्रचार में गुजरात सरकार की क्या भूमिका है. 15 हजार लोगों को बचाने का दावा न तो मोदी की तरफ से किया गया था और न ही गुजरात सरकार की तरफ से. वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकते हैं. लेकिन अगर उनकी तरफ से यह दावा नहीं था और इस दावे में उनकी सहमति नहीं थी तो जब इसको लेकर चारों तरफ चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने इसका खंडन क्यों नहीं किया?

सूत्रों की मानें तो ये सारा किया-धरा उस पीआर एजेंसी का है जिस पर गुजरात सरकार और मोदी की छवि को चमकाने की जिम्मेदारी है. कहा जा रहा है कि पीआर एजेंसी ने ही यह खबर मीडिया में प्लांट कराई जिससे गुजरात सरकार और मोदी को ‘रैंबो’ दिखाया जा सके. लेकिन आंकड़ों को लेकर गड़बड़ी हो गई इसलिए दावों का दांव उल्टा पड़ गया और स्थिति हास्यास्पद हो गई. उत्तराखंड पहुंचने के बाद मोदी के केदारनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश की भी विभिन्न हलकों में आलोचना हुई. भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रस्ताव पर मांगी गई प्रतिक्रिया के जवाब में मीडिया से कहा, ‘पहले लोगों को बचाना जरूरी है. घर बनाना जरूरी है. मंदिर बाद में भी बन जाएगा.’

मोदी की आलोचना इस बात के लिए भी हुई कि जो राज्य खुद के सबसे ज्यादा संपन्न होने का दम भरता है उसने उत्तराखंड की इस त्रासदी पर शुरुआत में सिर्फ दो करोड़ रुपये का सहयोग देने की घोषणा की. दूसरी तरफ देखें तो उत्तर प्रदेश ने 25 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा ने 10-10 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडि़शा जैसे राज्यों ने पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि भेजी. हरियाणा ने तो 25 गांवों को गोद लेने का भी एलान किया. इसके साथ ही वह पहला ऐसा राज्य भी बना जिसने इस त्रासदी में बराबर के शिकार बेजुबानों की सुध ली. हरियाणा ने आपदा से प्रभावित पशुओं के इलाज के लिए दवाओं के साथ डॉक्टरों की एक टीम भी भेजी है.

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने 25 करोड़ रुपये की सहायता राशि देने के साथ ही राज्य परिवहन की 300 बसें फंसे हुए यात्रियों को ले आने के लिए भेज दीं. साथ में डॉक्टरों का एक बड़ा दल भी प्रभावितों के इलाज के लिए उत्तराखंड रवाना किया. भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने त्रासदी के कुछ समय बाद ही राज्य के संस्कृति मंत्री के साथ एक सात सदस्यीय टीम को देहरादून रवाना किया. इसके साथ ही राज्य के लोगों को वहां से लाने के लिए सरकार ने ट्रेन के साथ ही सरकारी और प्राइवेट विमानों का भी इंतजाम किया. इस तरह से उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद राहत को लेकर विभिन्न राज्यों की भूमिका को देखें तो बाकी के राज्य राहत पहुंचाने के मामले में गुजरात से कहीं आगे दिखाई देते हैं. हां, यह जरूर है कि उन्होंने इसका ढिंढोरा नहीं पीटा और न अपनी ‘महानता’ की खबरें फैलाईं.

मातम की मार्केटिंग के लिए सिर्फ मोदी की ही आलोचना नहीं हुई बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी भी आलोचना के घेरे में आए. त्रासदी के आठ दिन बाद तक राहुल गांधी का न तो इस हृदयविदारक घटना पर कोई बयान आया और न ही वे कहीं दिखाई दिए. सोशल मीडिया से लेकर बाकी जगहों पर जब हो-हल्ला मचा तो कुछ दिन बाद वे सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस दफ्तर के पास राहत सामग्री लेकर जाने को तैयार ट्रकों को झंडा दिखाते दिखे. लेकिन इसके बाद खबरें आईं कि ट्रक तीन दिन पहले से राहत सामग्री लेकर तैयार खड़े थे, लेकिन राहुल के देश से बाहर होने के कारण उन्हें रवाना नहीं किया गया. खैर, ट्रक जैसे-तैसे गए, लेकिन आधे रास्ते में जाकर वे फिर से खड़े हो गए. उनके ड्राइवरों के हवाले से बताया गया कि उन्हें इतना ही डीजल दिया गया था.

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