महासमुंद का महासमर

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छत्तीसगढ़ का महासमुंद लोकसभा क्षेत्र सबके आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. इसके कई कारण हैं. पहला तो यह कि यहां से प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी चुनाव लड़ रहे हैं. जोगी अपने राजनीतिक पैतरों के जाने जाते हैं. वहीं  दूसरा और दिलचस्प कारण यह कि यहां से भाजपा प्रत्याशी चंदूलाल साहू के सामने उनके ही दस हमनाम यानि दस चंदूलाल साहू चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं. ओडिशा की सीमा तक फैले इस लोकसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या उड़िया मतदाताओं की भी है. उन्हें रिझाने के लिए उम्मीदवार दिन रात पसीना बहा रहे हैं. शिशुपाल पर्वत तक फैले इस लोकसभा क्षेत्र में जब हम पहुंचे समझ आया कि भले ही राष्ट्रीय स्तर पर यह मुकाबला सुर्खियों में न हो लेकिन यह अपने आप में काफी रोचक बन चुका है. राजधानी रायपुर से सरायपाली (महासमुंद लोकसभा का एक हिस्सा) जाते वक्त केवल अजीत जोगी के पक्ष में स्लोगन लिखे दिखाई पड़ते हैं, कहीं भी भाजपा प्रत्याशी या अन्य स्थानीय दल के नारे नजर नहीं आते.

42 डिग्री तापमान में खस्ताहाल और जर्जर राष्ट्रीय राजमार्ग-6 पर चलते हुए जब आप छत्तीसगढ़ से ओडिशा की तरफ जा रहे होते हैं तो इस बात का अंदाजा बिलकुल भी नहीं लगता सकते कि यह वो इलाका है, जहां से जनप्रतिनिधि के रूप में चुनकर भेजे गए नेताओं का कद राष्ट्रीय स्तर का रहा है. इसी महासमुंद लोकसभा सीट से जीतकर छह बार विद्याचरण शुक्ल लोकसभा पहुंचे थे. 1970 से 1990 यानि तीन दशक तक यहां पर वीसी शुक्ल का एकछत्र साम्राज्य रहा. शुक्ल ने इंदिरा गांधी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए कई महत्वपूर्ण विभागों को संभाला. 1972 में महासमुंद सीट से विधायक चुनकर आए पुरुषोत्तम लाल कौशिक आगे चलकर केंद्रीय मंत्री बने.  रायपुर लोकसभा सीट से जनता पार्टी की टिकट पर जीतकर वे केंद्र सरकार में 1977 से 1980 तक कैबिनेट मंत्री रहे. 2004 में खुद अजीत जोगी यहां से सांसद बनकर लोकसभा पहुंचे. लेकिन महासमुंद जैसा था, आज भी वैसा ही है. सड़क के दोनों तरफ लगभग काटे जा चुके जंगल, “बारनवापारा” में आ रहे टाइगर प्रोजेक्ट के चलते विस्थापित लोगों के लिए बनाए गए आवास और लगभग सूख चुकी जोंक व महानदी के किनारे बिकते हरे-हरे तरबूजों के अलावा रास्ते भर आपको कुछ विशेष दिखाई नहीं देगा. यहां के उड़ीसा से सटे बलौदा जैसे गांव जहां नक्सल समस्या से ग्रस्त हैं, वहीं भंवरपुर, अर्जुंदा, सांकरा, जोंक, तोरेसिंहा जैसे गांव आज भी विकास को तरस रहे हैं.

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