महाराष्ट्र: गरीब, किसान लाचार हर तरह से पड़ रही मार

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महाराष्ट्र के किसानों पर हर तरह से मार पड़ रही है और वे निरीह की तरह लाचार होकर सहने को मजबूर हैं। पिछली सरकारों ने किसानों की कभी नहीं सुनी, ऐसे में इस बार उन्हें हमेेशा की तरह आशा थी कि कोई नयी सरकार बनेगी और उनकी समस्याओं का कोई समाधान निकलेगा। मगर इस बार के चुनाव परिणाम ऐसे आये कि किसी एक पार्टी की सरकार बन ही नहीं सकती। यही कारण है कि वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू भी हुआ। परन्तु जब राष्ट्रपति शासन लगा था, तब उसका असर राजनीतिज्ञों की •िांदगी से ज़्यादा उन गरीब रोगियों पर पड़ा है, जो अपनी महँगे इलाज के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा दी जाने वाली आर्थिक मदद पर आश्रित हैंं। इसके अलावा अतिवृष्टि और बेमौसम बारिश की वजह से फसलों से हाथ धो बैठे किसानों के सामने भी समस्या मुँह फाड़े खड़ी हो गयी कि उनकी मदद कौन करेगा? क्योंकि मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को इलाज के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है, जो राष्ट्रपति शासन लगते ही बंद हो गयी थी। मुम्बई ही नहीं महाराष्ट्र के दूरदराज क्षेत्रों से इलाज के लिए आर्थिक मदद चाहने वालों की लम्बी कतार मंत्रालय के इस कक्ष के बाहर लगी रहती थी। लेकिन इस कार्यालय के बन्द होने से तकरीबन साढ़े पाँच हज़ार से अधिक लोग प्रभावित हो गये।

 मिली जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री के इस विभाग द्वारा पिछले पाँच साल में 21 लाख रोगियों को सहायता दी गयी और ज़रूरतमंद रोगियों को 1600 करोड़ से अधिक राशि का आवंटन किया गया। लेकिन जैसे ही महाराष्ट्र में  राष्ट्रपति शासन लगा, विभाग को इस कक्ष पर ताला लग गया।

हालाँकि, इस फंड से आर्थिक सहायता मिलना बहुत आसान नहीं है। कागज़ात की लम्बी फेहरिस्त और लम्बा समय कभी-कभी मरीज़ों की आस तोड़ देता है। ऐसे कई वाकये सामने आये हैं, जब फंड मिलने से पहले ही बीमारों ने दम तोड़ दिया है।

हालाँकि,  इलाज के लिए आर्थिक सहायता की आस लगाये बैठे लोगों को विश्वास है कि नई सरकार के गठन के बाद उन्हें आर्थिक मदद मिल जाएगी। यहाँ पर कई गैर-सरकारी संस्थान, ट्रस्ट और चैरिटेबल ट्रस्ट भी हैं, जो गरीबों के इलाज के लिए आर्थिक मदद करते हैं। महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन में ऐसे ट्रस्ट पर भीड़ भी बढ़ी।

दूसरी ओर किसान इस बात को लेकर परेशान हैं कि बेमौसम बारिश के चलते, जो उन्हें नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा और कब? हालाँकि देवेंद्र फडणवीस ने अपने कार्यकाल के दौरान ही किसानों के लिए 10 हजार करोड़  की घोषणा की थी। और वे पुन: मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। लेकिन अभी भी सियासी ऊँट करवट बदल सकने की शंका से घोषणा को काफी समय बीत गया और राज्य के फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास इस बाबत किसी प्रकार का प्रस्ताव नहीं पहुँचा। 6 से 7 नवंबर तक महाराष्ट्र में किसानों को हुए नुकसान की रिपोर्ट पेश करने की बात की गई थी, लेकिन राज्य के कई •िालों में अभी तक यह काम पूरा नहीं हुआ है। नुकसान का पूरा विवरण •िालाधिकारी के मार्फत सम्बन्धित आयुक्तों से सम्बन्धित महकमे के पास पहुँचेगा। राज्य सरकार ने आपातकालीन निधि के लिए इस साल 6400 करोड़ की राशि आवंटित की है। इसमें से 3200 करोड़ रुपये की मदद एवं पुनर्बसन विभाग को वित्त विभाग द्वारा दे दी गयी। जुलाई में बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए यह राशि विभागीय आयुक्तों के मार्फत प्रभावित •िालों तक पहुँचाया गया, जिसमें से 2400 करोड़ रुपये ही खर्च हुए 800 करोड़ की राशि बिना खर्चे दिख रही है।

 महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उस समय फडणवीस सरकार ने 6800 करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी। पता चलता है कि उसमें से आधे निधि का भी वितरण नहीं हुआ है। बेमौसम बारिश की मार झेल रहे किसानों की मदद के लिए सम्बन्धित विभाग के पास लगभग चार हज़ार करोड़ रुपये उपलब्ध हैं। यदि बाढ़ पीडि़त किसानों को इसमें से मदद देनी पड़ी, तो बेमौसम बारिश से पीडि़त किसानों को देने के लिए अतिरिक्त 10,000 करोड़ का प्रावधान करना होगा; जिसके लिए यह ज़रूरी है कि वित्त विभाग के पास  इस प्रावधान का प्रस्ताव भेजा जाए। लेकिन ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा। राष्ट्रपति शासन के बाद से निधि के आवंटन के कार्यान्वयन को लेकर परेशानियाँ खड़ी हो रही हैंं। यह कहा जा सकता है कि निधि के प्रस्ताव से लेकर आवंटन तक के लिए •िाम्मेदार सम्बन्धित महकमे का समन्वय तंत्र सुषुप्त अवस्था में है। राज्य में किसान इतनी बुरी तरह परेशान हैं कि पिछले कुछ महीने के भीतर ही तकरीबन 70 किसानों ने आत्महत्या कर ली है।