महाराष्ट्र के नये सियासी समीकरण

महाराष्ट्र में नवगठित त्रिशंकु सरकार के गठन के बाद इस नयी सरकार के लम्बे समय तक टिके रहने को लेकर कई कयास लगाये जा रहे हैं। वहीं सरकार की तैयारियों और वादों को लेकर भी चर्चाओं का बाज़ार गर्म है। इसी तरह के अनेक असमंजस और सवालों को लेकर राजनीति विश्लेषक एस.एन. विनोद ने तहलका संवाददाता मनमोहन सिंह नौला को विस्तार से बताया

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महाराष्ट्र में सत्ता को लेकर यह जो नया समीकरण बना है, इसका असर पूरे देश में होगा। शिवसेना जो नेचुरल अलायंस थी भाजपा की, हिन्दुत्व के मुद्दे पर, विचारधारा के आधार, पर वह अलग होकर विपरीत विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बना रही है। बल्कि ऐसा कह सकते हैं कि शिवसेना को उद्धव ठाकरे को कांग्रेस और एनसीपी का साथ मिल रहा है यह बहुत महत्त्वपूर्ण है

देवेंद्र फडणवीस का यह कहना कि यह तीन चक्के वाली सरकार है वह अपनी जगह में राजनीतिक बयान के रूप में सही है लेकिन यहां पर मामला प्रतिष्ठा का नहीं अस्तित्व का भी है। ठाकरे परिवार पहली बार सत्ता की राजनीति में आया है जिसे छोडऩा नहीं चाहेगा और वह इसी के माध्यम से शिवसेना विस्तार करना चाहेगी; क्योंकि वह भाजपा से अलग हो चुकी है।  वहीं पर कांग्रेस और एनसीपी शिवसेना को सामने रखकर पूरी कोशिश करेगी कि वह भाजपा का सफाया करें यह उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है। स्टेट जो सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य है। देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई है, उस पर गैर-भाजपा का कब्ज़ा होना ही बड़ा संकेत है और इस अवसर को कांग्रेस एनसीपी छोड़ेगी नहीं।

आपसी टकराव नहीं

जब एक ही पार्टी की सरकार बनती है, तब भी उनमें आपस में टकराव होता है। यहाँ पर तो तीन पार्टियों ने मिलकर सरकार बनायी है; तो कहीं-न-कहीं यह बात सामने आयेगी। क्योंकि तीनों का अपना-अपना एजेंडा है और लक्ष्य है। बावजूद इसके ज़रूरत पडऩे पर जो कॉमन मिनीमम प्रोग्राम इन्होंने बनाया है, तीनों समझौता करने से नहीं चुकेंगे। किसी भी हालत पर सरकार पर आँच नहीं आने देंगे।

अमित शाह की रहस्यमय खामोशी

24 अक्टूबर को चुनाव परिणाम आये। यह वाकई एक रहस्य है कि भारतीय जनता पार्टी जो हर तरह से सक्षम मानी जा रही है, सरकार है, सब है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जो चाणक्य कहलाते हैं, जिन्होंने छोटे-छोटे राज्य जैसे गोवा, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और हरियाणा में भी उलटफेर करके सरकार बना दी; लेकिन महाराष्ट्र जैसे आर्थिक राजधानी वाले प्रदेश में, जहाँ पर सरकार बनाने की कवायद एक महीने तक चली शाह की खामोशी अखरन लायक है। इतना ही नहीं उनकी जो शेड्यूल मीटिंग थी, मुम्बई आकर उद्धव ठाकरे को मिलने की, वह भी कैन्सिल कर दी गयी। अमित शाह ने महाराष्ट्र मे प्रयास क्यों नहीं किये? चाहे ऑपरेशन लोटस हो या अन्य कोई स्ट्रेटजी, अमित शाह की सोच और उनके सहयोग के बिना सफल नहीं होती। भाजपा, जो सक्षम थी; हर तरह से उसने सरकार क्यों नहीं बनायी? यह वाकई सोचने वाली बात है।

केन्द्र में उनकी सत्ता है। प्रधानमंत्री ने अपने उस अधिकार का दुरुपयोग किया, जो आपातकालीन स्थितियों के लिए है कि वह कैबिनेट को बाईपास कर सकते हैं। कौन-सी ऐसी ज़रूरत थी या कौन-सी ऐसी आपात स्थिति थी कि राष्ट्रपति शासन रीवॉक करने के लिए राष्ट्रपति को रात को 2:00 बजे जगाया गया। यह सब करने के बावजूद अमित शाह का मौन उनका नदारद रहना, मैं कह सकता हूँ कि उन्होंने अपनी तरफ से कोई प्रयास नहीं किया। यह वाकई एक रहस्य है। आने वाले समय में ज़रूर परदा उठेगा। मैं मानता हूँ कि अगर गम्भीरतापूर्वक ऑपरेशन लोटस को सफल बनाने के प्रयास किये जाते, तो ऑपरेशन सफल होता। लेकिन इसके फेल होने के पीछे कुछ और कारण छिपे हुए हैं।

मोदी शाह और फडणवीस

देवेन्द्र फडणवीस ने जो पाँच साल सरकार चलायी कमोवेश बेदाग और अच्छी सरकार चलायी इसमें कोई दो राय नहीं। फडणवीस के ऊपर कोई आरोप और लांछन नहीं लगा। उन्होंने पाँच साल तक शिवसेना जैसे दल के साथ सरकार चलायी। उस दौरान बहुत सारे मुद्दे थे, जिनको उन्होंने बड़ी समझदारी से सुलझाया।

यह बिलकुल सच है कि अमित शाह इस बार मुख्यमंत्री के तौर पर किसी और को सामने लाना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र में आये और अपनी कैम्पेनिंग के दौरान उन्होंने नरेंद्र और देवेंद्र का फॉर्मूला सामने रख दिया। खुले तौर पर सार्वजनिक सभा में कह दिया कि अगले पाँच साल के लिए एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस को लाइए। सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री के तौर पर फडणवीस के नाम की घोषणा कर दी। ऐसे में शाह क्या करते? उन्होंने अपने आपको पीछे रखा एक यह वजह हो सकती है।

वरना त्रिपुरा, हिमाचल, गोवा जैसे छोटे स्टेट्स में आप डायरेक्ट पहुँच रहे हो, अपने मंत्रियों को डेप्यूट कर रहे थे। याद होगा गोवा में उन्होंने नितिन गडकरी को भेजा था, उन्होंने बैठकर रातों-रात सारा उलटफेर करवाया। त्रिपुरा अरुणाचल में उन्होंने सीधे-सीधे हस्तक्षेप किया और महाराष्ट्र में अमित शाह जैसा व्यक्ति मौन और शान्त रहा।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की गरिमा को ठेस

महाराष्ट्र प्रकरण में राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों के अधिकारों का दुरुपयोग किया गया। इस मामले में कितना भी स्पष्टीकरण देंं, कानून का हवाला देंं यह स्पष्ट है कि केन्द्र ने सीधे-सीधे राजभवन का इस्तेमाल गलत ढंग से किया। और तो और महामहिम राष्ट्रपति, मैं उनका सम्मान करता हूँ; लेकिन एक आलोचक, समालोचक के तौर पर यह टिप्पणी कर सकता हूं कि राष्ट्रपति भवन का भी भेजा इस्तेमाल इस बार केन्द्र ने अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए किया। कहीं-न-कहीं इसका कारण भारतीय जनता पार्टी के भीतर केन्द्र में आंतरिक खींचातानी भी रही है।

देवेंद्र फडणवीस जैसे व्यक्ति से दूसरी बार शपथ दिलायी गयी और 80 घंटे के भीतर ही उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह एक काला धब्बा उनके करियर पर। इसके पीछे कहीं-न-कहीं दिल्ली से कोई खेल हुआ है। हालाँकि वह बात सामने नहीं आ रही है। अन्दर के तहखाने में चला कोई खेल है, जिसके चलते सरकार बनाने से पीछे हटी भाजपा।

संघ ने दिखायी हैसियत

इस असफलता को आरएसएस वर्सेस अमित शाह नहीं लिया जा सकता, क्योंकि अगर संघ कोई चीज ठान ले तो उसकी सफलता 101 फीसदी निश्चित है। यहाँ पर देवेंद्र फडणवीस भी आरएसएस के हैं और नितिन गडकरी भी। और नितिन गडकरी के, जो सम्बन्ध आरएसएस के साथ है; उसकी तुलना और किसी से नहीं की जा सकती। लेकिन बिटवीन द लाइन ध्यान रखने वाली एक बात है, वह है डर। जिस तरह अमित शाह को डर था कि भविष्य में केन्द्र में फडणवीस उनके कंपीटीटर बन सकते हैं उसी तरह नरेंद्र मोदी को हमेशा इस तरह का भय रहता है कि नितिन गडकरी दिल्ली में  उनके कंपीटीटर बन सकते हैं।

देखिए यह अजीब संयोग है या दुर्योग या कुछ और। ऐसा रहा कि जितने भी लोग वरिष्ठ थे एक-एक करके अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, मनोहर पॢरकर, अनंत कुमार ये गुज़र गये और उनसे पहले के जो सीनियर थे, जैसे आडवाणी मुरली, मनोहर जोशी उनको किनारे किया गया। उनका रास्ता साफ होता गया। अब एक उनके सामने है तो वह हैं  नितिन गडकरी। लेकिन उन्हें  कुछ नहीं कर पाते, क्योंकि संघ उनके साथ है।

इसे कुछ अलग तौर पर संघ वर्सेस शाह का मामला या केन्द्र का मामला कहा जा सकता है। क्योंकि इस बार संघ ने भी कोई •यादा दखल नहीं दिया। चूँकि महाराष्ट्र का मामला था संघ उन्हें उनकी हैसियत दिखाना चाहता था कि तुम दिल्ली में बैठकर क्या कर सकते हो, कर लो।

गडकरी के घर गये थे अमहद पटेल

बात कहाँ से शुरू हुई देखते हैं। अहमद पटेल का दिल्ली में नितिन गडकरी के घर जाकर मिलना। जैसे महाराष्ट्र मेंं बोलते हैं मातोश्री से बाहर ठाकरे नहीं जाते थे। पहली बार ठाकरे  बाहर निर्के। कांग्रेस में अहमद पटेल एक ऐसी शिख्सयत हैं, जो कहीं नहीं जाते हैं। लोग उनके पास आते हैं मिलने के लिए, जबकि यहाँ वह नितिन गडकरी के पास जाते हैं और मुलाकात करते हैं। उसके बाद नितिन गडकरी दिल्ली से नागपुर आते हैं और संघ में घंटों चर्चा होती है। महाराष्ट्र मेंं रहते हुए भी गडकरी ने कोई टिप्पणी नहीं की। सिर्फ एक बार उन्होंने कहा क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी सम्भव है। मुझे लगता है खेल ऊँचे स्तर पर हुआ और उसके विक्टिम बने बेचारे देवेंद्र फडणवीस हर दृष्टि से अच्छा आदमी कुशल प्रशासक, ईमानदार साफ-सुथरी छवि वाले फडणवीस को सामने लाकर उसकी बेइज़्ज़ती करा दी गयी। छोटा-मोटा खेल नहीं है कभी-न-कभी परदा उठेगा। दिल्ली में बैठे पत्रकारों को मीडियाकर्मियों को इन बातों की जानकारी है? अभी तो नहीं। लेकिन बाद में इस सवाल खड़े करेंगे। नागपुर में मुझे यहाँ पर इतना पता है, तो उन्हें भी पता होगा ही। बातें धीरे-धीरे निर्केंगी िफलहाल नहीं लिख पा रहे होंं यह  पाठकों और दर्शकों के साथ बहुत बड़ा धोखा, विश्वासघात है।

शरद पवार किंगमेकर

शरद पवार शरद पवार हैं। और सच तो यह है कि जितने भी नेता हैं, सभी उनके सामने  बौने हैं। और उन्होंने इस बार दिखा भी दिया है। राजनीति में नया समीकरण आया है यह मज़ाक नहीं है। कभी किसी ने सोचा था शिवसेना कांग्रेस एनसीपी के साथ आएगी? शरद पवार ही हैं जिन पर विश्वास करके सभी लोग साथ में आये हैं। चाहे कांग्रेस  अध्यक्ष सोनिया गाँधी हों या शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे। आज की तारीख में वह किंग मेकर की भूमिका में हैं। ऐसा चाणक्य, जिसने केन्द्र की राजनीति को हिलाकर रख दिया।

सरकार पूरा कार्यकाल निभाएगी

मुझे लगता है कि कोई भी दल अपने ऊपर दाग नहीं लगने देगा, उसकी वजह से सरकार नहीं चल पायी। समझौते होंगे। जहाँ पर झुकना होगा तीनों दल झुकेंगे। उनका लक्ष्य एक ही है किसी भी हालत में भाजपा को सत्ता से बाहर रखना।

शुरुआत महाराष्ट्र से हो गयी है और इसके दूरगामी परिणाम होंगे। इसका असर झारखंड में होने वाले चुनाव पर भी होगा। चुनाव परिणाम से पता चलेगा उसके बाद दिल्ली और बंगाल के चुनाव हैं, वहाँ भी इसका असर दिखायी देगा। दिल्ली में बैठकर, जिसने भी पार्टी के अंदर चाल खेली है, केन्द्रीय नेतृत्व भाजपा पर ही इसका उलटा असर पडऩे जा रहा है।

क्षेत्रीय पार्टियों के लिए खतरा

दरअसल, भाजपा पर आरोप लगता ही जा रहा है कि वह अपनी सहयोगी क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करने का मौका नहीं छोड़ती। यह पाँच साल जो सरकार चली वह सचमुच तीन साल चली। आरम्भिक तीन साल 2014, 2015, 2016 और उसके बाद से ही भाजपा में बहुत अहंकार कर पैदा हो गया और दोबारा, जो 303 सीट के साथ जीतकर सत्ता में आयी, तो उन्होंने खुद को अजेय मान लिया और यह अहंकार उनके सर पर चढ़ गया कि हम जो चाहे वह कर सकते हैं। ऐसे में उन्होंने जिन क्षेत्रीय दलों के साथ उनके सहयोग से सरकार बनायी उन्हीं के पर काटने शुरू कर दिये। शुरुआत में बिहार में नीतीश कुमार के साथ किया। हालाँकि नीतीश की मज़बूरी थी; लेकिन आज वह भी उखडऩे लगे हैं। झारखंड असम गोवा सब जगह यही खेल खेला गया और शायद इसी का डर शिवसेना को भी था, जिसका •िाक्र ठाकरे ने भी किया की भाजपा शिवसेना को खत्म करना चाहती थी। एक वजह यह भी थी, क्यों शिवसेना ने अपने धुर-विरोधी एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाना ठीक समझा। और यहीं पर महाराष्ट्र की राजनीतिक तस्वीर बदल गयी। यहाँ पर जो पलटवार हो उसका असर सारे देश में दिखायी देगा। अब भाजपा नेतृत्व को इस मसले पर गम्भीर विचार-विमर्श करना पड़ेगा। चापलूसी, प्रशंसा और महिमामंडन छोडक़र। पार्टी हित में और देश हित में। सबसे पहले अहंकार का त्याग करके, प्रैक्टिर्क होकर, ज़मीन पर उतर के सच्चाई का सामना करके।

हकीकत

पिछले साल तीन बड़े स्टेट कांग्रेस के हाथ में आये राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक। कर्नाटक भी आ ही गया था, लेकिन ऑपरेशन लोटस ने खेल बिगाड़ दिया। छत्तीसगढ़ तो एक छोटा है; लेकिन राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद महाराष्ट्र यह इतनी बड़ी चोट है भारतीय जनता पार्टी के लिए और दोनों जोड़ी के लिए। यदि समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो भाजपा 80 वाले दशक में न पहुँच जाए?

यह तीन टायर नहीं, त्रिदेव की सरकार है

महाराष्ट्र में काफी उथल-पुथल के बाद शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की सरकार बन चुकी है। लेकिन कयास लगाये जा रहे हैं कि यह सरकार बहुत अधिक चलने वाली नहीं है। एक दूसरा नज़रिया भी है, जो कहता कि अगर इस त्रिकोणीय सरकार ने रोज़गार, कृषि आदि के क्षेत्र में ठीक से काम किया, तो पूरे पाँच साल चल सकती है। इन्हीं सब पहलुओं पर एनसीपी (मुम्बई) के जनरल सेक्रेटरी सत्यवान सोनावणे से मनमोहन सिंह नौला ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं कुछ अंश :

महाविकास अघाड़ी सरकार को 3 टायर वाली सरकार कहा जा रहा है। यह भी दावा किया जा रहा है कि यह •यादा नहीं चल पाएगी। आपकी क्या राय है?

यह तीन टायर नहीं, बल्कि त्रिदेव की सरकार है। एक खासतौर पर किसानों की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करेगी। दूसरी रोज़गार निर्माण, बेरोज़गारी और युवाओं की समस्या पर विशेष फोकस करेगी और तीसरे का काम होगा राज्य में कानून व्यवस्था की ओवरहॉलिंग करना। जिससे आम आदमी, चाहे वो किसान हों या व्यापारी या फिर कर्मचारी निडर और बेिफक्र होकर अपनी •िान्दगी गुज़ारें।

तीन पार्टियों की मिली-जुली सरकार बनी है; मुद्दों को लेकर मनमुटाव से इन्कार तो नहीं किया जा सकता!

मनमुटाव आपस में क्यों होगा? जब हमने निश्चय कर ही लिया कि महाराष्ट्र के विकास पर ही फोकस करेंगे, तो मनमुटाव का सवाल ही नहीं उठता। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम ऐसे ही नहीं तैयार हुआ है। हर पहलू पर गहराई से मंथन किया गया। मतभेद का सवाल ही नहीं उठता। अब विकास की बात होगी, बेरोज़गारी हटाने पर ज़ोर देंगे। नौजवान, जो देश का भविष्य हैं, उन्हें रोज़गार देंगे। रोज़गार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। किसानों का कर्ज़ माफ होगा। बीज, खाद और औज़ारों पर दी जाने वाली सब्सिडी शुरू होगी।

आपने राज्य में कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने की बात कही; क्या कानून व्यवस्था ठीक नहीं है?

मैं यह नहीं कह रहा; यह रिपोर्ट बताती है, जिसे सरकारी महकमा नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीबी) ही तैयार करता है। आज की तारीख में स्थिति विकट है। महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। साथ ही मासूम बच्चियों के यौन शोषण का ग्राफ भी बढ़ा है। पिछले वर्षों में सामाजिक ताने-बाने पर भी बुरा असर पड़ा है। सबसे बड़ी बात पुलिस महकमे की है। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को खाने-पीने की सुविधाओं के साथ-साथ पुलिस दल के आवासीय-व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। कोशिश होगी कि वे भी अपनी पारिवारिक •िान्दगी का बेहतरी से लुत्फ उठा सकें।

क्या यह सच नहीं है कि आरे प्रोजेक्ट को रोककर मुम्बई के विकास को रोकने की कोशिश की जा रही है?

मुंबई शहर की सबसे बड़ी समस्या है प्रदूषण, जो लगातार बढ़ती ही जा रही है। गाडिय़ाँ, फैक्ट्रीज, नवीन कंस्ट्रक्शन, मैट्रो कंस्ट्रक्शन आदि के प्रदूषण को रोकने का काम आरे की हरियाली कर रही थी। आप कह सकते हैं आरे मुम्बई का फेफड़ा है। विकास के नाम पर हज़ारों पेड़ों को काट डाला गया। वहाँ पर हज़ारों एकड़ बंजर ज़मीन थी; कार शेड बन सकता था। लेकिन निजी फायदे के लिए मेट्रो के नाम पर, विकास के नाम पर हरियाली का खात्मा किया जाना मुम्बई वालों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना ही था। अगर ऐसा होता रहा, तो वह दिन दूर नहीं, जब शहर-भर को श्वसन सम्बन्धी बीमारियों से जूझना पड़ेगा।

इसका मतलब विकास कार्यों को रोक दिया जाए?

बिल्कुल नहीं। विकास अपनी जगह है, नागरिकों का स्वास्थ्य अपनी जगह। स्वास्थ्य को हर हाल में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कानून बने कि हर तरह के कंस्ट्रक्शन साइट पर मुफीद तौर पर हर 10-15 फीट पर एक पेड़ लगाना अनिवार्य कर दिया जाए। पेड़ों की •िाम्मेदारी उन पर सौंप दी जाए और ऐसा न करने पर उनके िखलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।