महाभारत ही है अगला आम चुनाव

0
651

कांग्रेस के पूर्ण सत्र में महाभारत के अंदेशे के बारे में राहुल गांधी ने बड़े साफ तौर पर इशारा किया था। उन्होंने भाजपा को कौरव और कांग्रेस को पांडव बताया। राहुल ने अगले चुनाव के लिए अपना कार्यक्रम भी तय किया। अगले चुनाव को महाभारत बताने से यह बात साफ हो गई कि आगामी आम चुनाव भी कौरवों और पांडवों के बीच महाकाव्य में हुए महाभारत की ही तरह होगा। पांडव संख्या में कम ज़रूर थे लेकिन वे सही दिशा में थे।

राहुल गांधी अपनी बात में आक्रामक थे। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में भाजपा की भूमिका पर व्यंग्य किया, कथित क्रोनी पूंजीवाद और हिंदू मिथकों के संदर्भों को याद करते हुए उन्होंने भाजपा के उन्मादी रवैए को कौरवों का और खुद को पांडव बताया।

आगे हैे जबरदस्त लड़ाई

इसी से यह साफ हुआ कि हम बेहद कठिन चुनावी लड़ाई की ओर बढ़ रहे हैं। इसके पहले सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं के लिए रखे भोज में मेजें सजाते हुए यह संकेत दिया था। इसमें वे तमाम बातें थी जो राहुल गांधी के नेत्तृव में कांग्रेस के पुनर्जीवन को बताती थीं। उन्होंने बताया कि ‘भारत के विचारÓ मुद्दे पर और वर्तमान सरकार की शैली पर यह जंग होगी। भारत क्या भय और धमकी की संस्कृति बर्दाश्त करेगा, हिंसा पर उतारू भीड़ को सहेगा और वैज्ञानिक चेतना का उपहास उड़ाना पसंद करेगा। उन्होंने उपचुनावों में भाजपा की परेशानी बढ़ाते हुए अभी हाल हुए उप चुनावों में उसकी हार का उल्लेख भी किया।

अब राहुल गांधी ने खुद को उनकी तरह ही सोचने वाली पार्टियों के समर्थन से प्रधानमंत्री को चुनौती देने वाला बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर निजी हमले करते हुए उन्होंने यह भी साफ किया कि कांग्रेस बिना थके प्रचार करेगी और मोदी सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरेगी।

मोदी के नेतृत्व में भाजपा की अजेयता

सभी यह मानते हैं कि इस साल कर्नाटक, राजस्थान में होने वाले और इसी साल के अंत में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में होने वाले चुनावी नतीजों पर ही निर्भर करता है आम चुनाव। भाजपा के अजेय रहने के मिथक पर उत्तरप्रदेश में अभी हाल हुए उपचुनाव से सवाल उठा है। कांग्रेस का पूर्ण सत्र तब हुआ जब भाजपा और कांग्रेस का विरोध कर रही पार्टियों ने आपस में तालमेल बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी। जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने गैर भाजपा औैर गैर कांग्रेसी मोर्चा बनाने का प्रस्ताव दिया और तत्काल उनके प्रस्ताव को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाथों-हाथ लिया। इसके साथ ही यह बात साफ हुई कि सभी दल इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। हालांकि ममता की तृणमूल कांग्रेस और राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति पार्टी ज़रूर भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ होने के अलावा कई मुद्दों पर एक जान पड़ती है। इससे कांग्रेस को भी भाजपा विरोधी तमाम पार्टियों से तालमेल करने और भाजपा के 2014 के ‘अच्छे दिनÓ के वादे की सच्चाई बताने का मौका मिलता है।

सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी अब वाकई उस दौर में आ गए हैं जहां से वे चुनौती दे सकें? या आज भी वे पार्टी की वंशवादी विरासत के ही प्रतीक हैं? या क्या वे ऐसे राजनेता के तौर पर विकसित हो गए हैं कि वे राजनीति में युवाओं को साथ लेकर चल सकते हैं। अभी हाल गुजरात में उनकी यानी एक व्यक्ति की मेहनत दिखी थी जिसके बाद ही कांग्रेस का पूर्ण सत्र हुआ था। इसमें उन्होंने कुलीन नेता होने की अपनी छवि बदल दी थी। वे एक कार्यकर्ता के रूप में दिख रहे थे।

हाल में उनके प्रयासों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 132 साल पुरानी कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी अब जनता की आकांक्षाओं को समझने लगे हैं और संभावित सहयोगियों की पहचान भी उन्हें होने लगी है। इस पूर्ण सत्र में वे अगले आम चुनावों में कांग्रेस की रणनीति को बड़े ही साफ तरीके से समझा सके और उन्होंने संयुक्त मोर्चे की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। नए नेतृत्व की योजना है कि वे राजनीतिक सृजनात्मकता को और तेज़ करें। ‘डिजिटलÓ के लिहाज से सतर्क हों और पार्टी की आंतरिक मज़बूती को और अधिक बढ़ा सकें जिसे सभी देखें और परखें।

कांग्रेस पार्टी की चुनावी युद्ध की तैयारी से यह साफ है कि वे चाहते हैं कि वैचारिक मतभेदों को दरकिनार रखते हुए भाजपा के सहयोगियों के सीमित हो रहे आधार क्षेत्रों का उपयोग कर सकें। राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब था जब उन्होंने अपनी चुप्पी छोड़ दी और मां सोनिया गांधी की छाया से अलग हो गए। सोनिया ने उस पर कहा था ‘आज वे मेरे भी बॉस हैंÓ। इसे लेकर कहीं कोई ऊहापोह नहीं होना चाहिए। यह एक रणनीतिक बयान था जिसके जरिए पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया गया कि वे राहुल गांधी को अपना समर्थन दें।

राहुल ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बयान दिया जिसमें उन्होंने यह माना कि कांग्रेस लोगों की उम्मीदों को समझ नहीं पाई और उससे गलतियां हुई। यह कहने के पीछे आशय था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को यह जता देना कि उन्हें नए सिपहसालार से अब चुनौती मिल रही है।

कांग्रेस ने आगे की चुनावी लड़ाई के लिए अपने कार्यकर्ताओं में खासी स्फूर्ति भरी। यह भी जताया कि यह पार्टी ही भाजपा का विकल्प है। साथ ही यह बात भी साफ हुई कि वह उन सभी पार्टियों के साथ सहयोग की इच्छुक है जो मोदी सरकार को2019 के लोकसभा चुनावों में सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं।

पार्टी कार्यकर्ताओं से राहुल गांधी ने वादा किया है कि उनकी शिकायतों पर ध्यान दिया जाएगा। चुनाव में टिकट देने के समय बहुधा वास्तविक समर्पित कार्यकर्ताओं की बजाए नेताओं को टिकट बांट दिए जाते हैं। इस प्रक्रिया पर अब रोक लगेगी। उन्होंने कहा कि पार्टी नेताओं से कार्यकर्ताओं का मिलना अब ज़्यादा सहज होगा और युवाओं को ज़्यादा टिकट दिए जाएंगे। यह भी सच्चाई है कि कई राज्य इकाइयों में कांग्रेस में ही खासी गुटबाजी है और वे पुराने ढर्रे पर ही चलना चाहते हैं। राहुल ने इस पर संकेत दिया कि वे अनुशासन चाहते है। जिससे पार्टी की जीत के आसार किसी भी तरह कम न हों। दूसरा बदलाव जो दिखा वह था कार्यकर्ता को केंद्र में रखा जाना। राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने मंच को इसीलिए खाली रखा है जिससे पार्टी के अंदर के और बाहर के नौजवान जिनमें योग्यता हैं, वे यहां आएं। मंच पर इस बार लोग बैठे नहीं थे। सिर्फ नेतागण भाषण देने आते और भाषण देकर लौट जाते।

तालमेल का प्रयास