महात्मा गांधी के डेढ़ सौ साल मसला, कैसे याद करें राष्ट्रपिता को [विकास संवाद का बारहवां आयोजन सेवाग्राम, वर्धा में]

विकास के मुद्दों के बरक्स गांधी और 150 वर्ष

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मध्यप्रदेश का एक पैरवी समूह जो विकास, कुपोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर गत 15 वर्षों से प्रदेश में कार्यरत है, प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर एक मीडिया संगोष्ठी करता रहा है जिसमें वह देश भर के लीडिंग पत्रकारों को बुलाकर किसी एक विषय पर फोकस करते हुए चर्चा, बहस और मुद्दों को सामने रखता है साथ ही यह उम्मीद होती है कि ये पत्रकार साथी यहां से लौटकर अपने अखबारों, पत्रिकाओं या चैनलों में जाकर इन मुद्दों की पैरवी करें; यह भी कोशिश होती है कि पत्रकार सिर्फ अपने बीट से संबंधित ही नहीं – बल्कि व्यापक स्तर पर अपनी समझ बनाएं और पढ़े लिखे; ऐसा नहीं कि पत्रकार पढ़े-लिखे नहीं है परंतु अपने दैनंदिन कामों में उन्हें कई बार इतना समय नहीं होता कि वह विभिन्न संदर्भ टटोलकर पढ़े-लिखे, विश्लेषण करें, मंथन करें या अपने साथियों के साथ बैठकर खुले और मुक्त भाव से चर्चा कर सकें। गत 12 वर्षों से आयोजित होने वाला यह मंथन इस वर्ष गांधी जी के सेवाग्राम जिला वर्धा में आयोजित था. उल्लेखनीय है कि यह गांधीजी का 150 जयंती वर्ष होगा जिसमें सरकार ने घोषणा की है कि इसे धूमधाम से मनाया जाएगा यह संयोग ही है कि यह कस्तूरबा का भी 70 वां जन्म वर्ष है, विकास संवाद ने अपना बारहवां मीडिया विमर्श अबकी बार सेवाग्राम वर्धा में दिनांक 17 से 19 अगस्त तक किया था जिसमे देश भर से करीब 130 पत्रकार आये थे

निश्चित ही इस तरह के आयोजन बहुत श्रम साध्य होते हैं और इन की तैयारी लगभग 3 से 4 माह पूर्व आरंभ करना होती है जिसमें नाम छाँटने से लेकर स्थान का चयन, आरक्षण, सामग्री तैयार करना, वक्ता तय कर उन्हें बोलने के लिए तैयार करना और फिर उन सब को निमंत्रित करना और अंत में आयोजन सफल और सिद्ध हो जाए इसके लिए भरसक प्रयास करना; विकास संवाद की पूरी टीम इस काम में अपना समय, ऊर्जा और तन-मन-धन झोंक देती है तब कहीं जाकर आयोजन असली रंग रूप ले पाते हैं। इस काम में टीम के साथ – साथ विकास संवाद के साथ जुड़े सहयोगी साथी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए एक बड़ा समूह इस महती कार्य को पिछले 12 वर्षों से लगातार पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता से करता आ रहा है, निश्चित ही इसके लिए सब बधाई के पात्र हैं साथ ही वह पत्रकार जो माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे और आज एक दो बच्चों के पप्पा है – से लेकर देश के विभिन्न बड़े अखबारों और न्यूज़ चैनल्स में काम कर रहे हैं बड़े पदों पर आसीन साथी भी धन्यवाद के पात्र है – जिन्होंने प्रतिवर्ष इसे एक रस्मी आयोजन ना मानकर शिद्दत से अपनी जिम्मेदारी समझकर इसमें शिरकत की है और विकास तथा शिक्षा स्वास्थ्य और कुपोषण से जुड़े मुद्दों को मीडिया की मुख्यधारा में लाकर खबर बनाया है

यह बात तसल्ली देती है कि हर वर्ष नए साथी इस में जुड़ते हैं और जो नहीं आ पाते वह अपनी टीस बाहर से व्यक्त करते हैं, कितने अफसोस की बात है कि इस तरह के आयोजनों के लिए भी मीडिया संस्थानों में दफ्तर की छुट्टी का प्रावधान नही हो पाता है और किसी किसी को झूठ बोलकर या छुट्टी लेकर आना पड़ता है

युवाओं की सीखने की लगन और बहस करने की भावना को देखा जाना चाहिए जो बहुत स्वाभाविक रूप से प्रश्न पूछते है, पढ़ते है, बहस करते है और जाते समय बहुत भावुक होकर जाते है. इस पूरी यात्रा में देशभर के पत्रकारों में एक सार्थक चर्चा हुई है और सामंजस्य भी पैदा हुआ है वे साल भर अपने मुद्दे शेयर कर चर्चा करते है और लगभग पारिवारिक रिश्तों में तब्दील हो चुके इन संबंधों की ऊर्जा हर संवाद में स्पष्ट दिखाई देती है

एक शिकायत अक्सर सबको रहती है कि समय कम है या सत्र दिन दिन भर के बहुत लंबे और बोझिल हो जाते है जिसे इस बार कई मित्रों ने औपचारिक रूप से आयोजकों को दर्ज किया है और यह खुशी की बात है कि सचिन जैन ने इसे स्वीकारा भी है और आश्वस्त किया है कि अगली बार से कुछ समानांतर रूप से चर्चा सत्र और व्याख्यान सत्र आयोजित किये जायेंगे अलग अलग विषयों पर ताकि सबको आपस मे बातचीत और अपनी बात कह के सुनने का मौका भी मिलें

सेवाग्राम और बापू

बहुत सारी खराब बातों के बावजूद भी बहुत सारी अच्छी बातें अभी भी सेवाग्राम के आश्रम में मौजूद हैं, इनमें से प्रमुख हैं – स्वच्छता, प्रार्थना और स्वावलंबन; पूरे परिसर में स्वच्छता अपने आप में बहुत बड़ी बात है जो आपको हर जगह नजर जायेगी, दिनभर कर्मचारी आपको सफाई करते नजर आएंगे

बापू की धरोहर भी महत्वपूर्ण हिस्सा है इस विरासत का – जिस तरह से गांधी की सारी सामग्री को एक परिसर में संजोया गया है वह वह अकल्पनीय है, हर कुटी का अपना इतिहास और अपनी कहानी है; हर कुटी में तख्तियां लगी है कि यहां कौन आया था, इनका क्या उपयोग हुआ था और इनका क्या संदर्भ है। बापू की धरोहर – यथा टाइपराइटर, पेन, घड़ी, चश्मा, कपड़े, छड़ी, संडास, टेलीफोन, बर्तन, बाल्टियां, टब, टेबल पलंग, मसाज टेबल आदि बहुत सावधानी से रखे भी गए हैं और सुरक्षित भी किए गए हैं ताकि आने वालों को सारी चीजें तसल्ली से देखने को मिले और वह स्वतंत्रता के इस मसीहा की उपयोग की हुई सामग्री को देख सकें

बापू की कुटी बनाने के लिए मीरा बहन को कहा गया था कि यदि वह सौ रुपए से अधिक सामग्री की होगी तो बापू नहीं रहेंगे अस्तु मीरा बहन ने सारी सामग्री आसपास से जुटाई – बांस, मिट्टी, पत्थर, घास और फिर उस पर गोबर से लिपाई करके इतना मजबूत बनाया कि आज का सीमेंट और बालू के ढाँचे भी उसके सामने टिक नहीं पाते प्रबंधकों ने बताया कि दुनिया के बेहतरीन 3 आर्किटेक्ट को बुलाकर जब हमने नए ढांचे बनवाने के लिए कहा था तो आग्रह किया था कि बापू की कुटी को जरूर देखा जाए; उनमें से एक विश्व विख्यात आर्किटेक्ट की आंखों में पानी आ गया कि कैसे इतना मजबूत काम मात्र 100 रुपए में हो गया

प्रतिदिन सुबह शाम होने वाली प्रार्थनाएं यहां का प्रमुख आकर्षण है जिसमें बीच मैदान में बैठकर शाम को ठीक 5:45 पर सांध्यकालीन प्रार्थना होती है सुबह की मैं अटेंड नहीं कर पाया था, इसलिए नहीं कहूंगा पर शाम वाली प्रार्थना आत्मा के कोर कोर को जागृत करने का कार्य अवश्य करती है कोई आडंबर नहीं कोई पूजा पाठ नहीं हार फूल नहीं मात्र गांधी का फोटो और एक चरखा रखा होता है सर्व धर्म प्रार्थना जापानी प्रार्थना से शुरू होती है और अंत गुरुवाणी से होता है, इसके बाद एक भजन होता है – तत्पश्चात रघुपति राघव राजा राम की धुन गाई जाती है और किसी एक किताब के एक पृष्ठ का वाचन होता है हमने भगवान सिंह द्वारा लिखित किताब ‘अंबेडकर और गांधीÓ के तीन पन्ने 3 दिन तक रोज़ सुने मुझे याद आया कि जब यह किताब छप कर आई थी तो हंस के संपादक स्व राजेंद्र यादव ने इस किताब पर एक लंबा संपादकीय लिखा था और इस बहाने दलित और हरिजन शब्द के मायने सामने रखते हुए एक नए सिरे से बहस को प्रस्तुत किया था पूना पैक्ट, अम्बेडकर गांधी की बहस को हमने समझा था

स्वालंबन – सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक सिद्धांत है जो सेवाग्राम ने अभी तक अपने अंदर बनाए रखा है अच्छी बात यह है कि आश्रम में प्रवेश से लेकर देखने और फोटो खींचने शूटिंग करने की निशुल्क सुविधा है कहीं भी कोई शुल्क नहीं लिया जाता, कोई रोकटोक नही और बिल्कुल भी डाँट फटकार नही, कोई भी आपको विशाल वृक्षों के नीचे घूमने से एओक नही सकता, मौलश्री से लेकर नीम पीपल बरगद के इतने घने और ऊंचे पेड़ है कि अब अगर हम बोयें भी तो इन्हें बड़ा होने के पहले ही विकास नामक भस्मासुर निगल जाएगा

दूसरा भोजनालय में जो भी सामग्री बनाई जाती है वह सादी, शुद्ध और सात्विक होती है; मांसाहार का प्रयोग सर्वथा अनुचित है, पूरे परिसर में गुटखा, सिगरेट, पान, तंबाकू, शराब और मांसाहार पर कड़ा प्रतिबंध है; यात्री निवास या गेस्ट हाउसेस के कमरों में यदि कोई करता भी होगा तो संभव है छुप कर करता हो, पर मुझे लगता है यहां आने पर सबके मन में एक पवित्र भाव आ ही जाता है जो उन्हें इस तरह के कर्म करने से रोकता है

भोजनालय में कार्यकर्ताओं से पूछने पर उन्होंने बताया कि लगभग सारा अन्न, दूध, मसाले और सब्जियां आसपास की ही हैं और सब जैविक खेती से उपजाई जाती हैं; महिला बचत गट अर्थात महिलाओं के स्व सहायता समूह बने हैं जो यह काम करते हैं और आश्रम में प्रतिदिन सप्लाई करते हैं, खाने में दोनों समय गुड रखा होता है साथ ही दही या छाछ जरूर होता है जो बापू को प्रिय था। हमें पहले दिन भोजन में मीठा नहीं परोसा गया था क्योंकि देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी का देहावसान हो गया था और यह राष्ट्रीय शोक का विषय था इस बात को लेकर हमें अच्छा लगा कि भोजन में भी इस तरह से सावधानी बरती गई थी

पूरे परिसर में यह तीन सिद्धांत आज भी हर कसौटी पर खड़े हैं इसलिए गांधी भी है सेवा आश्रम भी है और लोग भी हैं पूर्ण सभ्यता, शुचिता और संस्कृति को बचाते हुए

देश के गांधी अड्डे और सिद्धांत

एक ही है सेवाग्राम देश में, एक है कस्तूरबाग्राम इंदौर में और फिर देशभर में फैले है – गांधी चबूतरे और गांधी आश्रम, पीठ, अध्ययनकेन्द्र और पुस्तकालय नुमा अड्डे जिनमे अब ना गांधी जिंदा है और ना गांधी के सिद्धांत या मूल्य, बचा है तो झगड़ा, तर्क – कुतर्क, हिसाब – किताब, श्रेय लेने की पागल दौड़ और खादी के झब्बे पहनें नकली लोग – जो ना कुछ कर पा रहें और ना इन अड्डों की कुर्सियां छोड़ रहें; अपने पोपले मुंह और नकली बत्तीसी से देश का ज़मीनी गांधी चबाते अब सिर्फ येन केन प्रकारेण अनुदान डकारने की फिराक में रहते है; हाँ – यह अभी संतोष की बात है कि मोदी सरकार के पांच करोड़ अनुदान लौटाकर मॉरल बनाये रखते है और छबि भी जिसमे सेवाग्राम भी शामिल है

मुझे व्यक्तिगत रूप से लगने लगा है पिछले 32 वर्षों में देश भर गांधी विनोबा या अन्य सर्वोदयी महान संतों के आश्रम, अकूत चल अचल सम्पत्ति देखकर कि या तो ये सब राजसात करके नया कुछ किया जाये या इन्हें पुनरुद्धार करके नवसृजन किया जाये क्योकि अब ये सिर्फ बड़े – बड़े ढाँचें है जो बड़ा तगड़ा मेंटेनेंस मांगते है और इतना रुपया इस देश मे नही कि गरीबी, भुखमरी, बीमारी, मलेरिया, कुपोषण या रोजगार के बदले इन्हें बनाएं रखने के लिए धन उपलब्ध करवाया जाए

शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, पशु पालन, खेती, स्वाध्याय, सौर ऊर्जा, खादी उत्पादन और ग्रामीण विकास के सभी क्षेत्रों में ये जिन तरीकों को अपना रहें है वे महज पुराने होने से असफल नही है, बल्कि अब उन तौर तरीकों में प्रतिबद्धता, मूल्य और सिद्धांतों का गहरा घालमेल है और अंदर ही अंदर इन जगहों पर बैठे लोगों में कुर्सियों से चिपके रहने का भी बड़ा लालच है और उम्र के आठवें, नवमें दशक में पदों के प्रति लालसा खत्म नही हो रही; ये लोग वो दीमक बन गए है जो गांधी का चरखा चबा गए, भरे पेट पर देश खा गए, फिर भी ये भूखे के भूखे – मांग रहें अनुदान

सेवाग्राम में नई तालीम के प्रबंधक हो या ट्रस्टीगण सबने अपनी अपनी जगह पर बड़े बड़े धंधे खोल रखें है और यहां ईमानदारी के चोगे ओढ़ रखें हैं इंदौर कस्तूरबा ग्राम से हम सब वाकिफ ही है कि कैसे यह संस्थान एक व्यवसायिक केंद्र बन गया कुल मिलाकर

मुझे हर जगह देशी विदेशी लोग बहुतायत में दिखते है, यात्रियों के झुंड दिखते है, गांधी को लेकर झंडा उठाएं अपना एजेंडा लिए लीगों के हुजूम नजर आते है अधिकाँश युवा है जिनके पास विकल्प है वे कर्मशील भी है सम्भवत: दृष्टि ना हो पर दृढ़ इरादे जरूर है पर कोई भी प्रबंधन इन्हें जगह नही देना चाहता – मसलन सेवाग्राम में मगा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि है [जैसा भी है कच्चा – पक्का, उसकी चर्चा कल] जहां गांधी अध्ययन के युवा छात्र है अभी तक दर्जनों पी एच डी कर निकल चुके है पर कोई भी इस पैतृक संस्थान में टिकते हुए नजर नही आया आखिर क्यों

बातें थोड़ी ज़्यादा ही कड़वी है पर इधर तीन चार बरसों में लगातार गांधी आश्रमों में गया हूँ सेवाग्राम सहित इसलिए प्रश्न उठते है दिमाग़ में, कचोटते है और लगता है कि मुझे कम से कम सिलसिलेवार लिखना तो चाहिए ही कि कही कोई तो सोचे और इस बात से भी मैं मुतमईन हूँ कि कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और राजनैतिक सत्ता गांधी को इस्तेमाल सब करेंगे पर गांधी चाहता कोई नहीं

विकास के चरण पड़े सेवाग्राम पर

सेवाग्राम में सरकार ने 145 करोड़ की विकास योजना बनाई है वर्धा विकास प्राधिकरण लागू कर रहा है, पोस्ट आफिस तोडऩे की फिराक में है उसके ठीक सामने पक्की नाली बनाई है जो सात करोड़ की है और पीछे सार्वजनिक शौचालय बन रहे है .मगन भाई संग्रहालय की विभा ने बताया कि लोगों के विरोध के बाद भी सरकार हस्तक्षेप करके सेवाग्राम को विकसित कर मूल स्वरूप बिगाड रही हैं और सौ रुपये में बना बापू का मकान आज करोड़ों रुपयों की बर्बादी देख रहा है

संस्थान के प्रबंधकों में एका नही है और आपस मे स्वार्थवश झगड़ते रहते हैं जिससे गांधी आश्रम की हालत खराब होती जा रही है, देश भर के सौ पत्रकारों को विभा जी ने जिस दर्द के साथ दास्तान सुनाई विकास, 145 करोड़ रुपयों की कहानी वह दर्द से ज़्यादा व्यक्तिगत कुंठा ज़्यादा लगी मुझे. क्या बात है कि जिस पोस्ट आफिस का उपयोग गांधी करते थे वहां प्रबंधन ने एक व्यक्ति को गत 35 वर्षों से क्वार्टर के रूप में रहने को दिया है – क्या यह है गांधी की विरासत को संवर्धित करने का तरीका और सदुपयोग

तीन दिन पत्रकारों की गोष्ठी में आश्रम में खादी भंडार होते हुए नई तालीम के प्रबंधन ने नागपुर के चलते फिरते खादी भंडार को बुलाकर रखा था और बिक्री करवाई जोकि अपने आपमें सवाल है, क्यों नही आश्रम की खादी की दुकान को प्रमोट नही किया लगभग दो लाख की बिक्री हुई है क्या इससे आश्रम के खादी बनाने वालों को लाभ नही मिलता

सवाल कई है – गांधी के 150 साल पूरे होने पर 2 अक्टूबर से देशभर में आयोजन होंगे पर इसकी अभी कोई तैयारी दिखाई नही देती सर्वोदय सेवा संघ कलेक्टिव के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी भयानक बूढ़े और अक्सर बीमार रहतें हैं ऐसे में क्या उम्मीद की जाएं कि ये लोग गांधीवाद और गांधी के मूल्यों, सीखों को आम जन तक ले जाएंगे और देश मे भयमुक्त साम्प्रदायिकता मुक्त माहौल बनेगा, सिर्फ मेकेनिकल ढँग से नित्य प्रार्थनाएँ गाने से काम नही चलेगा अब और खादी के झब्बे पहनने से भी देश गाँधीमय हो जाएगा ?

मगा अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विवि और गांधी

अशोक वाजपेई की प्रतिभा से हम सब वाकिफ हैं, हम सब जानते हैं कि वह एक बेहतरीन कवि, विचारक, आलोचक और गद्य विधा के लेखक हैं, सम्पादकीय हुनर है, साथ ही उनके पास जो विरल दृष्टि है वह इस समकालीनता में दुर्लभ है. अशोक वाजपेई मूलत: टीकमगढ़ मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं जो बुंदेलखंड का इलाका है और बुंदेलखंड ने देश को तीन विलक्षण व्यक्ति दिए; एक – अशोक वाजपेयी, दो – प्रोफेसर कृष्ण कुमार और तीसरे – नवगीतकार स्वर्गीय नईम जो देवास में मृत्यु पर्यंत रहें। अशोक वाजपेई ने सेंट स्टीफंस कॉलेज से अंग्रेजी में एम ए करने के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में काम करने का ठाना और आजीवन वे मध्यप्रदेश काडर में विभिन्न वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर रहे, इस दौरान उनका कविता और साहित्य से रुझान बराबर बना रहा. यह सौभाग्य ही है कि मध्यप्रदेश में अशोक वाजपेई, स्व सुदीप बनर्जी, अशोक जी के भाई डाक्टर उदयन वाजपेई ने कविता की एक अलग जमीन बनाई और उसे पोषित करते रहे. अशोक जी ने ना मात्र कविता रची, बुनी -गुनी, बल्कि कविता के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भी रहे . मध्य प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में साहित्यकारों के नाम से पीठ स्थापित की, तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह के कार्यकाल में भारत भवन जैसे विशाल सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना भोपाल में की – जो आज देश-विदेश में संगीत और ललित कलाओं के लिए प्रसिद्ध है. सेवानिवृत्ति के बाद अशोक जी सक्रिय भी रहे और उन्होंने सेवाग्राम के समीप महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की और प्रथम कुलपति रहे.

दुर्भाग्य की उस विश्वविद्यालय में आज गांधी तो है परंतु गांधी के मूल्य छात्रों में एक सिरे से नदारद है, विशुद्ध गुंडे और मवाली किस्म के छात्र वहां शोध और अध्ययनरत है। किस्सा यूं है कि सेवाग्राम में जब गांधी से संबंधित राष्ट्रीय मीडिया संगोष्ठी चल रही थी तो पहले दिन से ही पत्रकारिता के छात्र गोष्ठी में भाग लेने के लिए आए थे पत्रकारिता विभाग के कुछ प्राध्यापक भी वहां मौजूद थे यह सभी छात्र या तो एम फिल कर रहे थे या पीएचडी, इनके साथ – साथ हिंदी तथा गांधी अध्ययन और बौद्ध अध्ययन के छात्र भी थे

पहले दिन उन्होंने पंजीयन के समय पत्रकारों को दी जानेवाली किट की मांग की जिसमें एक खादी का झोला प्रमुख था, साथ ही एक लेटर पैड, एक पेन और गांधी दर्शन से संबंधित विकास संवाद का प्रकाशन था, चूंकि झोले निश्चित मात्रा में ही बनवाए गए थे वह भी कर्नाटक के बेंगलुरु से मंगवाए गए थे इसलिए निश्चित संख्या में ही उपलब्ध थे और ये सिर्फ पंजीकृत और आमंत्रित पत्रकारों के लिए ही थे, झोले को छोड़कर शेष सामग्री सभी छात्रों को भी निशुल्क दी गई थी – छात्रों को बताया गया कि ये झोले आपके लिए नहीं है, सीमित संख्या में है और यदि फिर भी झोले बचते हैं – कोई नही आया तो तो आखिरी दिन दिए जा सकते हैं।

बड़ी संख्या में विवि के छात्र रोज सुबह शाम आते – खाना खाते, नाश्ता करते, चाय पीते और शाम को कार्यक्रम समाप्त होने के पूर्व ही चले जाते हैं. इस बात का इनसे कोई धेला नही लिया गया सब कुछ निशुल्क था और यह जताया भी नही गया था, आखरी दिन जब वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के साथ-साथ अन्य लोगों का व्याख्यान था और देशभर के पत्रकारों को वर्धा या नागपुर से वापसी के लिए ट्रेन और हवाई जहाज पकडऩे थे – तो भोजन के समय पहले आमंत्रितों को भोजन करने दिया गया और छात्रों को निवेदित करते हुए कहा गया कि वे थोड़ा रुक जाएं क्योंकि वे स्थानीय हैं और सब के साथ बाद भोजन कर सकते हैं, विकास संवाद के साथ वरिष्ठ लोगों ने भी सबसे अंत मे ही भोजन किया था उस दिन, भीड़ होने से अक्सर अव्यवस्था हो रही थी लगातार, इस बात पर छात्रों को बहुत गुस्सा आया कि हमें भोजन कक्ष में जाने से रोका गया और यह हमारा अधिकार है, यह हमारा शहर है आदि आदि बकवास करने लगें और उन्होंने पंजीयन पर बैठे विकास संवाद के महिला कार्यकर्ताओं के साथ बदतमीजी से झगड़ा किया और मांग की कि हमें खादी के झोले तत्काल दिए जाएं, आयोजकों ने उन्हें भरसक समझाने की कोशिश की और खाने के लिए भी मनाया – परंतु वे विशुद्ध गुंडई और दादागिरी पर उतर आए और कहने लगे कि हम बच्चे नहीं हैं, हम शोध छात्र हैं, हम देख लेंगें और हमें सब मालूम है – यहां क्या हो रहा है. एक समाज सेवी संस्था – जो अपने न्यूनतम संसाधनों, सीमित साधनों और आर्थिक प्रयासों से और लोगों की सहभागिता से ऐसे नेक आयोजन करती है – उसकी मंशा पर सवाल उठाना और नाजायज मांग करना कहां तक छात्रों के लिए जायज है।

अफसोस यह है कि विश्वविद्यालय के कोई भी जिम्मेदार प्राध्यापक वहां थे नहीं, अधिकांश लोग शनिवार – रविवार होने से अपने घर चले जाते हैं और इनमें से भी बहुत से लोग अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में हिस्सेदारी करने के लिए मॉरीशस गए हुए थे, खैर – जैसे तैसे वरिष्ठ लोगों के हस्तक्षेप से छात्रों को मनाकर खाना खिलाया गया और वापस विवि में रवाना किया गया – परन्तु अफसोस यह है कि छात्रों का यह उज्जड रवैया बेहद शर्मनाक और घटिया था। बाद में कुछ लोगों ने बताया (जो यही से पूर्व में पीएचडी है) कि आजकल विवि में नेतागिरी आम है और कक्षा में छात्रों को पढ़ाना मुश्किल ही नही नामुमकिन है, इतना माहौल खराब है कि प्राध्यापक कक्षाओं में जाना ही पसन्द नहीं करतें और दलित – सवर्ण की लड़ाईयों के साथ छूटभैया राजनीति भयावह रूप से हावी है, कबीर पहाड़ी पर तमाम अनैतिक कार्य होते है और वीसी भी रोक नही पा रहें, पूरा विवि तदर्थ और कार्यवाहकों के भरोसे चल रहा है और गांधी के मूल्य तो दूर सामान्य सदाचार और शिष्टाचार भी विवि में नही है, हॉस्टलों में पूर्व छात्रों का अवैधानिक कब्जा है और विवि के पास स्थित पंजाबी कॉलोनी में छात्रों के कमरे है जहां से कई प्रकार की अनैतिक गतिविधियां चलाई जाती है

यह दर्शाता है कि अशोक जी ने जिस स्वप्न और दृष्टि के साथ हिंदी विवि की परिकल्पना की थी – उसकी त्वचा पर गुंडई और राजनीति की कितनी कलई चढ़ चुकी है सवाल यह है कि इसे कौन और कैसे और कब उतारेगा, गांधी के देश और गांधी के संस्थान में विश्व शान्ति हेतु द्वितीय विश्व सम्मेलन जिस हॉल में हुआ था – उसके ठीक सामने यदि युवा छात्र नाजायज मांगों के लिए किसी एनजीओ के लोगों से सरकारी संस्थान मानकर लड़ाई करें, बात सुनने और समझने को तैयार ना हो तो उनकी शिक्षा – दीक्षा का क्या महत्व है, शर्म आती है कि हमने एक ऐसी पीढ़ी पैदा की हैं – जो बेहद लापरवाह, उज्जड और गंवार है – बावजूद इसके की इनके पास सरकारी छात्रवृत्ति पाकर पाई हुई पीएचडी की डिग्रियाँ है।