मसरूफ़ियत में महानायक से मुलाक़ात

जब मैं इस कॉलम को पूरा ही करने जा रही थी कि तभी मुझे दिग्गज फ़िल्म स्टार दिलीप कुमार के निधन की ख़बर मिली। पुरानी यादें एकदम से ताज़ा हो गयीं। यादें मुझे सन् 1999 की गर्मियों में वापस ले गयीं, जब मैं उनसे और उनकी पत्नी सायरा बानो से मिली थी।
मुझे जानकारी मिली थी कि सायरा बानो और दिलीप कुमार नई दिल्ली पहुँचे हैं और मैं उनका साक्षात्कार करने के लिए बेहद उत्साहित थी। सभी सम्भावित स्रोतों से कोशिश की, तो पता लगा कि वे उस होम्योपैथ के विशेषज्ञ के क़रीबी हैं, जिनको मैं भी जानती थी। वही इसमें मेरी मदद कर सकते थे और बता सकते थे कि दिलीप कुमार दम्पति किस फाइव स्टार होटल में ठहरे होंगे। मैं होटल की लॉबी में पहुँची, लेकिन इससे पहले कि मैं उस विशेष मंज़िल की ओर पहुँच पाती, मैंने काँच की लिफ्ट में देखा कि सायरा बानो और दिलीप कुमार नीचे भूतल की ओर जा रहे हैं।
मैं उनकी ओर दौड़ी। लेकिन मुझे उनके सामने अपने सभी सवालों को अच्छी तरह रखने का उतना मौक़ा नहीं मिला, जिसकी मैंने कई बार रिहर्सल की थी। मैंने होम्योपैथ कनेक्शन के साथ जैसे बात शुरू की, तो दिलीप कुमार के चेहरे के भाव बहुत कुछ कह गये। यह सभी जानते हैं कि वह इस तरह के जबरन मिलने को नापसन्द करते थे और ख़ालिस उर्दू में अपनी बात रखते थे। बहुत बढिय़ा इतनी मधुर और स्पष्ट आवाज़ को वह नापतौल कर बोलते थे, मानो किसी नाटकीय तरीक़े से कहे हों। कहने का मतलब यह है कि मुझे आने से पहले उनसे अप्वाइंटमेंट (मिलने का समय) लेना चाहिए था; क्योंकि वह बहुत मसरूफ़ थे। वे ख़ुद कई राजनेताओं से मिलने वाले थे और पता नहीं कौन-कौन थे। आख़िरकार, दम्पति के लिए वह समय बेहद और तनाव वाला था। उस समय बड़ा सियासी तूफ़ान खड़ा हो गया; क्योंकि दिलीप कुमार ने पाकिस्तान सरकार की ओर से सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ को वापस करने से इन्कार कर दिया था।
दिलीप कुमार साहब ने तब कुछ देर बात की थी और यह भी कहा था कि शायद हम इसी हफ़्ते बाद में औपचारिक मुलाक़ात के लिए मिल सकते हैं। साथ ही उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि सायरा बानो उनकी ओर से एक साक्षात्कार देंगी…। यह सब कहकर, वह सायरा बानो और कई अन्य लोगों के साथ लॉबी से बाहर निकले, जो आसपास जमा हुए थे। शायद उस रोज़ शाम में उनकी कई नेताओं के साथ मुलाक़ात होनी थी। बाद में मैंने एक राष्ट्रीय अख़बार के लिए सायरा बानो का साक्षात्कार लिया था। मैंने उनसे पुरस्कार विवाद और उनकी प्रतिक्रियाओं के बारे में सवाल किये थे, जिनका मैं पूर्व के कॉलम में उल्लेख कर चुकी हूँ। मैंने उनसे इस अहम मुद्दे पर भी टिप्पणी जाननी चाही थी कि मुम्बई में कुछ दक्षिणपंथी सियासी दल 1992-1993 के मुंबई दंगों के बाद उनके द्वारा किये गये समाज-सेवा कार्यों से ख़ुश नहीं थे और शायद इसी वजह से वे निशाने पर आ गये?
इस पर सायरा बानो ने कहा था कि पूरा मुद्दा साम्प्रदायिकता से भरा है; लेकिन यहाँ मैं यह जोडऩा चाहती हूँ कि हम तमाम समुदायों के सभी लोगों के लिए समाज सेवा करते हैं और जो भी ज़रूरतमंद है, उस तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं और ऐसा बहुत पहले से करते आ रहे हैं। क़रीबी दोस्तों का समूह, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग हैं; उनमें से अधिकतर दोस्त हिन्दू हैं। हम बिल्कुल भी हाई प्रोफाइल नहीं हैं। लेकिन शान्त तरीक़े से सेवा करने की कोशिश करते हैं। जो हो रहा है, उससे मैं बहुत परेशान हूँ। उन दंगों को देखना एक बुरा सपना था और बढ़ते फासीवाद और साम्प्रदायिकता ने मुझे आहत किया है; मेरे दिल को चकनाचूर कर दिया। मुझे ऐसा दु:ख होता है, जैसे मेरा सपना टूट गया हो, मेरा शीशा टूट गया हो। हम आशा करते हैं कि आपसी सौहार्द बना रहे, यह बढ़ती साम्प्रदायिकता और फासीवाद नियंत्रित हो, ताकि हम सभी अमन से और मिलजुलकर रह सकें।
मैंने उनसे यह सवाल भी किया कि संकट के समय फ़िल्मी सितारे एक साथ खड़े होते हैं; लेकिन जिस संकट का आप और आपके पति सामना कर रहे थे, इस पर अधिकांश फ़िल्मी सितारों ने किसी-न-किसी तरह की चुप्पी साध रखी है। इस पर उन्होंने कहा कि मैं यही कहना चाह रही थी। मुझे बताओ कि क्या वे किसी के साथ खड़े हुए हैं? आजकल कोई खड़ा नहीं होता। यहाँ तक कि जब संजू (संजय दत्त) को परेशान किया जा रहा था, तो उनके लिए बोलने वाले केवल दो लोग- शत्रुघ्न सिन्हा और मेरे पति थे। यहाँ तक कि जब फ़िल्म आग चल रही थी, तब भी मेरे पति ने बात की थी। इससे हटकर मैंने उनसे सवाल किया कि दिलीप कुमार से आपकी शादी को वर्षों हो गये हैं। आप उसका वर्णन किस तरह करेंगी? उन्होंने बड़ी सहजता से कहा कि वह सम्मानित व्यक्ति हैं और सम्मानित व्यक्ति का सम्मान किया जाना ज़रूरी है।

 

हमारे क़ैदियों के साथ क्या हो रहा है?


फादर स्टैन स्वामी के निधन की ख़बर आने के साथ ही उदासी और बेचैनी महसूस होने लगी, साथ ही व्यवस्था पर भी सवाल उठना लाज़िमी है। 84 साल के बीमार पादरी को भी नहीं बख़्शा! व्यवस्था की निर्ममता कभी भी इतनी बेरहमी से मार सकती है? दरअसल, फादर स्टैन स्वामी को भीमा कोरेगाँव मामले में आरोपी बनाकर जेल में डाल दिया गया और उन पर आतंकी वाली धाराएँ लगा दीं। जेल जाने के बाद से उनकी तबीयत ख़राब हो गयी, फिर भी उन्हें जमानत नहीं मिली। क्यों?
आश्चर्य है कि मामले के सभी सह-अभियुक्तों के साथ कैसा सुलूक हो रहा है। ख़ास बात यह है कि इनमें से कोई भी युवा नहीं है, न ही अच्छी सेहत वाले हैं। स्वास्थ्य की हालत ख़राब होने के साथ ही पिछले कई महीनों से जेल में हैं। क्या वे इस हालात में जेल में ज़िन्दा बचेंग़े? जीवित और अक्षुण्ण रहें, और कब तक? अगर वह नहीं रहे, तो कौन जवाबदेह होगा? क्या उनकी मौत के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा? इन पुरुषों और महिलाओं को क़ैदी क्यों बनाया जाता है? जबकि उनसे बिना बेडिय़ों के भी पूछताछ
की जा सकती है। क्या शासन करने वाले जवाबदेह होंगे?
दरअसल मैं पिछले कुछ समय से क़ैदियों के हालात पर नयी किताब पढ़ रही हूँ। इस किताब का शीर्षक ही है- ‘बेगुनाह क़ैदी’ (इनोसेंट प्रिजनर्स)। 7/11 ट्रेन धमाकों और अन्य आतंकवादी मामलों (फेरोस मीडिया) में मुस्लिम युवाओं को झूठा फँसाने की कहानियाँ हैं। इसमें फँसाये और क़ैदी बनाये गये लोगों की सच से भरी कड़वी कथाएँ हैं। इस किताब को पूर्व क़ैदियों में से एक अब्दुल वाहिद शेख़ ने लिखा है, जिन्हें ख़ुद 11 जुलाई, 2006 मुम्बई ट्रेन बम विस्फोट मामले में फँसाया गया था। उन्हें नौ साल जेल में बिताने पड़े, तब जाकर अदालत से निर्दोष साबित हुए और बाइज़्जत बरी किये गये। और इस पुस्तक में उन्होंने जेल में और अपने साथी क़ैदियों के अनुभवों को पुलिस और जाँच एजेंसियों और जेल कर्मचारियों के सुलूक के बारे में हालात बयाँ किये हैं। 500 पेज की यह किताब तथ्यों से भरी है, साथ ही इसमें विशिष्ट तिथियों, नामों और विशेष उदाहरणों के साथ उल्लेख है।
यह स्कूल के एक पूर्व शिक्षक की कहानी है, जो मुम्बई के एक स्कूल में पढ़ा रहे थे। वह जेल के जीवन और उसके बाद की जेल की जानकारी को लिखते रहे और फिर उसे शब्दों में उकेर दिया है। वास्तव में एक फ़िल्म निर्माता के बारे में कहा जाता है कि वह इस आदमी के धैर्य से इतना प्रभावित हुआ कि अब्दुल वाहिद शेख़ के जीवन और समय पर एक फीचर फ़िल्म पूरी की जा रही है। आख़िरकार इस पूर्व क़ैदी के पास बताने और पेश करने के लिए बेहद स्पष्ट वर्णन है। इस पुस्तक की प्रस्तावना से उद्धृत करने के लिए निर्दोष होने के बावजूद जब हमें 7/11 विस्फोट मामले में गिरफ़्तार किया गया था, तो कई दिनों तक हमें समझ में नहीं आया कि वास्तव में हमारे साथ क्या हो रहा था। हमें लगा कि पुलिस ने हमें ग़लती से गिरफ़्तार कर लिया है और जल्द ही हमें रिहा कर देगी। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गये, हमारी उम्मीदें धूमिल होने लगीं।
इस पुस्तक के पहले अध्याय के पहले पैराग्राफ से शुरुआती पंक्तियों की बात करें, तो उसमें लिखा है कि हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि राजनीतिक आकाओं ने हमेशा निहित स्वार्थ के लिए पुलिस का इस्तेमाल किया है। दुर्भाग्य से पुलिस इतनी अनियंत्रित रूप से मज़बूत हो गयी है कि आज वह पूरी तरह से निर्विवाद हो गयी है। राष्ट्र व्यावहारिक रूप से एक पुलिस राज्य बन गया है…। राज्य का आतंकवाद कैसे समाप्त होगा? यह कब समाप्त होगा? इस पर गम्भीरता से विचार करने की ज़रूरत है। जब तक हम राजकीय आतंकवाद को समाप्त करने के बारे में नहीं सोचते, वास्तविक शान्ति और प्रगति केवल एक सपना ही रहेगी। सरकार जितनी जल्दी इसे समझ ले, देश के लिए उतना ही अच्छा है।