मर्दों के खेला में औरत का नाच | Page 2 of 2 | Tehelka Hindi

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मर्दों के खेला में औरत का नाच

चाहे रमणिका गुप्ता का नीली आंखों वाला आदमी हो या अश्वेत पुरुष, चाहे गीताश्री का गोरिल्ला प्यार का यौन साथी हो या एक पुत्री द्वारा पिता के लिए खरीदी गई युवती, चाहे जया जादवानी की स्त्री वेश्या हो या जयश्री रॉय का पुरुष वेश्या, चाहे सहजवाला के फेसबुक वाले युवक-युवती हों और चाहे मैत्रेयी पुष्पा के लल्लू कैलासी और दूर के रिश्ते की भौजाई.  ये सारे पात्र अजनबियों के साथ यौन संसर्ग करते हुए निरूपित किए गए हैं. ये केवल शरीर हैं, हृदयविहीन शरीर. ये कहानियां पोर्न आख्यान हैं.  इन संसर्गों के लिये सेक्स या सहवास संज्ञा का प्रयोग करना इन शब्दों का अपमान करना है.

यूनान में साहित्य और कला की देवी म्यूज कहलाती है. म्यूज कलाकारों की प्रेरणा मानी जाती है. वह पूजनीय थी. भारत में प्रेरणा के लिए नवाबों-शायरों ने तवायफों को गढ़ा. तहजीब की रक्षा के नाम पर वहां केवल गाना-बजाना ही नहीं था, नाज-नखरा और अदाएं उसका प्रमुख हिस्सा थीं. उनका काम था रिझाना. नपुंसक तथा निकम्मे नवाबों को रिझाने के लिए नियुक्त तवायफों और उत्तेजित करने वाले पुरुष हिचकारों के रोचक वृत्तांत हमारे लखनऊ के ही प्रतिष्ठित इतिहासकार योगेश प्रवीण की पुस्तकों में उपलब्ध हैं. समकक्षता के इस युग में स्त्रियों का उद्देश्य स्वयं को अभिव्यक्त करना है या चुके हुए संपादकों-समीक्षकों को रिझाना?

महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित वर्धा विश्वविद्यालय में अपना छद्म साम्यवाद लाने के लिए कटिबद्ध उम्र के छठे दशक में विद्यमान कुलपति विभूति नारायण राय ने एक लेखिका को यौन केंद्रित गाली दी. उम्र के सातवें दशक में चल रहे रवीन्द्र कालिया ने गाली को नया ज्ञानोदय के सुपर बेवफाई अंक में छापा. उम्र के आठवें दशक में विद्यमान राजेंद्र यादव ने राय को कुलपति पद से हटाने की मांग को तालिबानी बताते हुए कहा, ‘दोस्तों, लोकतंत्र का भी कुछ सम्मान करना सीखो. आखिर हम इक्कीसवीं सदी में रह रहे हैं. यह शुद्ध मर्दवादी अहंकार कब तक हुंकारता रहेगा कि हम अपनी महिलाओं का अपमान नहीं सहेंगे.’ (हंस, सितंबर 2010 ). और उम्र के नवें दशक में विद्यमान साम्यवादी प्रोफेसर नामवर सिंह ने मौन सहमति दी.

मैत्रेयी पुष्पा रिटायर्ड पुरुष पुलिस अधिकारी से यौन केंद्रित गाली खाने के बाद भी उन्हीं के साथ चर्चारत दिखाई दीं (पाखी). उस छिछली चर्चा में क्षमाप्रार्थी होने के बजाय राय ने बड़ी निर्लज्जता से वरिष्ठ मैत्रेयी पुष्पा की तुलना अत्यंत फूहड़ लेखन करने वाली कनिष्ठ ज्योति कुमारी से कर दी. कोई सैद्धांतिक प्रतिरोध करने की जगह वे ‘ऊंऽऽ, आप लोग तो बड़े वैसे हैं’ की तर्ज पर कुनमुनाती नजर आईं. यह सब कैसे संभव हुआ? मैत्रेयी पुष्पा के आचार-विचार से तमाम असहमतियों के बावजूद मेरा मत है कि वे एक समर्थ लेखिका हैं. यदि यौन सक्रियता के वृत्तांतों से उनका सशक्तीकरण हो चुका होता तो क्या यह संभव था कि एक औसत से भी बदतर कहानी-उपन्यास लिखने वाला पुरुष इतनी वरिष्ठ लेखिका को इस तरह अपमानित कर दे और वह निरुत्तर रह जाए? यह मर्दों के खेला में नाचने के लिए तैयार होने का ही प्रतिफल है कि साहित्य में और समाज में लेखिकाएं मखौल का पात्र बन रही हैं.  इस बीच कुछ बेहतर लेखन भी अवश्य हुआ होगा मगर इस खेल में शामिल न होने के कारण वह अचर्चित रहा.

हिंदी लेखन अब तक भयंकर रूप से पितृसत्तात्मक है. अपने पुरुषवर्चस्ववादी स्वत्व की रक्षा करते हुए पिछली पीढ़ी के दंभी वयोवृद्ध पुरुषों ने पूरी तरह नकली औरतें गढ़ ली हैं. हर आयु वर्ग और आकार-प्रकार की ये बार्बी डॉल्ज हिंदी लेखन के बाजार में उपलब्ध हैं. इन्हें पूंजीवादी विदेशियों ने नहीं देसी जनवादियों ने तैयार किया है. चाबी से चलने वाली चीनी गुडि़यों की तरह इनके भीतर एक प्रोग्राम भरा है. चाबी लगाने पर ये वही बोलती हैं जो इनके निर्माताओं ने इनके भीतर भरा है. ये गुडि़यां बच्चों के लिए नहीं, हिंदी के प्रगतिशील वयोवृद्धवृंद की क्रीड़ा के लिए हैं.

रमणिका गुप्ता की ट्रेन में अजनबी सहयात्री से सहवास करने वाली स्त्री कहती है, ‘वे आंखें भी तो अपनी नीलिमा से मेरी देह को सहला ही तो रही हैं. कल जो दिन चढ़ेगा उसमें यह विलक्षण क्षण अलग से जुड़ जाएगा. इजाफा हो जाएगा तुम्हारे अनुभवों की फेहरिस्त में.’

इन चर्चित लेखिकाओं ने अनुभवों की फेहरिस्त में इजाफा करते हुए स्त्री-पुरुषों के वेश्याओं और अजनबियों के साथ यौन संसर्गों को अपना विषय बनाया है ताकि उन्हें मन, बुद्धि, चेतना, आत्मा और सारे मानवीय संबंधों से रहित शरीर के वर्णन का वितान मिल जाए. यह हिंदी में साहित्य के नाम पर चल रहा देह व्यापार है, जहां स्त्री, और अब तो पुरुष भी मांस का टुकड़ा हैं, बेचेहरा और हृदयहीन.

छद्म विमर्शकार बड़ी बेहयाई से पूछ रहे हैं कि क्या स्त्री को वह लिखने का अधिकार नहीं जो पुरुष लिख रहे हैं. मगर मूल प्रश्न इससे गंभीर है- आखिर लिखा क्या जा रहा है? स्त्री कौन-सा हक मांग रही है? मानव शरीर के अपमानित और विमानवीकृत चित्रण का हक? भावना विहीन देह वृत्तांत कहने का हक? यदि स्त्री तथा पुरुष के रचे में भिन्नता है ही नहीं तो स्त्री लेखन को अलग से रेखांकित क्यों किया जाए? प्रियंवद की ‘गंदी’ कहानी में नायक की भूतपूर्व सखी उसके घर ठहरी. वह कहती है- ‘बस मैं नहा लूं फिर बैठते हैं….अंदर से नल की धार की आवाज आ रही थी. दो कदम आगे बढ़ कर मैं झुका और गुसलखाने की दरार से आंख लगा दी. उसकी पीठ मेरी तरफ थी. लपटें फेंकते हुए दो अग्निकुंडों की तरह उसके नितंब चमक रहे थे’ (कथादेश, दिसंबर 2012). नायक एक प्रौढ़ पुरुष है, कोई किशोर बालक नहीं.

‘छुट्टी का दिन’ कहानी भी जयश्री रॉय ने पुरुष की ओर से उत्तम पुरुष में लिखी है,’ सच पूछो तो भारी नितंबों वाली स्त्री के पीछे पीछे रोज एकाध घंटे चलना मुझे बुरा भी नहीं लगता था. वह आगे आगे बतख की तरह कूल्हे मटकाती नाजो अदा से चलती थी.’ पुरुष घर आ कर ‘नौकरानी कांता बाई के नितंब निहारता.’ प्रौढ़ दंपति में से पति रोशनदान से झांकता हुआ पड़ोस की अमला भाभी को नहाते हुए देखता है, और प्रौढ़ पत्नी पड़ोस के त्रिपाठी भाई साहब को.

सहज स्वाभाविक संबंधों का विवरण साहित्य में कभी समस्याप्रद नहीं रहा. यह स्वस्थ साहचर्य का चित्रण है ही नहीं, यह तो ‘वाइकेरियस प्लेजर’ देने वाला ‘की-होल जर्नलिज्म’ है. गुदगुदी और सनसनी पैदा करने के लिए लेखक-लेखिका दरारों से झांक रहे हैं. पोर्नोग्राफर स्त्री को अपने ही शरीर का अवयवीकरण और अपमान करना सिखाता है. जयश्री रॉय पुरुष बन कर मर्दों के खेला में नाचती हुई भारी नितंबों वाली स्त्री के पीछे-पीछे चल रही हैं , नौकरानी कांता बाई के नितंब निहार रही हैं, गुसलखाने के रोशनदान से पड़ोस की अमला भाभी को बिना टाट का पर्दा डाले ही नहाते हुए झांक रही हैं और उपहास की भाषा में स्त्री अवयव वर्णन कर रही हैं. बहुत खूब.

इंटरनेट पर चैट करने वाले, मॉर्निंग वाक करने वाले मध्यवर्गीय प्रौढ़ दंपति ऐसे किस मुहल्ले में रहते थे जहां पड़ोसी त्रिपाठी दंपति आंगन में टाट का पर्दा डाल कर और कभी कभी बिना पर्दा डाले ही नहाता होगा? गीताश्री की कहानी का परिवार, जहां होमसर्विस देने वाली वेश्या तक इंग्लिश बोलती है, ऐसी किस सोसाइटी के टावर्स में रहता होगा जहां फर्स्ट फ्लोर की बाल्कनी में ‘बताऊं क्या-क्या गिरते हैं?..यूज्ड कॉन्डम और सैनिटरी नैपकिन्स’ ( ताप ). जुगुप्सा जगाने की प्रतियोगिता में एक -दूसरे को पछाड़ती इन लेखिकाओं की कहानियों में पात्रों और पृष्ठभूमि की विश्वसनीयता की अपेक्षा करना धरती पर चांद मांगने जैसा है.

दशकों के प्रयासों से यह समूह साहित्य की मुख्यधारा को पोर्न आख्यानों से बदल चुका है. ऐसे आख्यान अब अपवाद नहीं नियम हैं जिनमें यौन संसर्ग आकस्मिक और भावना विहीन है और स्त्री एक पूर्णतः यौनीकृत वस्तु.

जयश्री रॉय की देह, नदी और रात सीरीज की एक अन्य कहानी ‘समन्दर, बारिश और एक रात’ (कथादेश) में ‘फुलमून नाइटडांस में डॉनी अपनी बांहों में दो लड़कियों को एक साथ भींचे झूम रहा था. स्कारलेट 14 वर्ष की ब्राजीलियन लड़की थी जो पिछले तीन महीनों से अपनी प्रेमिका नीकीबार्नो के साथ एक कमरा लेकर रह रही थी, कभी कभी अपना स्वाद बदलने के लिए पुरुषों के साथ भी हो लेती थी. आज की रात उसका डेट अफ्रीकन युवक था.’ वह बलिष्ठ अफ्रीकन युवक के कंधे पर से उतर कर जेनी नामकी लड़की का जबरदस्ती यौन शोषण करती है. जहां सभी लोग स्वेच्छा से एक साथ अनेक अजनबियों के साथ यौन संसर्ग में लिप्त थे वहां सामूहिक बलात्कार की गुंजाइश कहां थी? मगर जयश्री रॉय ने जगह निकाल ली और सामूहिक बलात्कार की पूरी प्रक्रिया का वर्णन इतने विस्तार और इतनी तटस्थता से किया मानो ‘सामूहिक बलात्कार कैसे करें’ की दिशानिर्देशक हैंडबुक तैयार कर रही हों. न स्त्री की यातना का लेशमात्र वर्णन, न पुरुष की दरिन्दगी के प्रति क्षोभ. 75 वर्षीय वृद्ध परमानन्द श्रीवास्तव ने लेखिका की ऐसी कहानियों को कविता बताते हुए कसीदे काढ़े हैं (पाखी, दिसम्बर 2011) दरिंदगी के ऐसे बढ़ते अपराधों से समाज दहल रहा है मगर हिंदी लेखन में उत्सव चल रहा है.

इस परंपरा में ज्योति कुमारी की ‘अनझिप आंखें’ में पति द्वारा उत्पीड़ित नायिका के आगे उसका मामा यौन संसर्ग का प्रस्ताव रखता है फिर कार्यस्थल पर अखबार का संपादक. वह एक समाज सेविका से मदद मांगती है जो उसका हौसला बढ़ाती है, ‘चल कल मूवी चलते हैं.’ मूवी चल रही है. इंग्लिश बोल्ड लव स्टोरी. बड़ी तेजी से मेरे पैरों पर फिसलता हुआ एक हाथ बढ़ा चला आता है-‘अरे यह तो मैम का हाथ है.’ मैं हकला कर रह गई…’ मैम मैं वैसी लड़की नहीं हूं…मैम आइ एम नाट लेस्बियन.’..’ओह’, अचानक ऊपर आता मैम का हाथ रुक गया..’अच्छा तो तुम मर्दख़ोर हो’ और आंख दबा कर मुस्करा दीं.’ (हंस, अगस्त 2012)
जिस तरह हिंदी की मसाला फिल्मों में लंबे रेप सीन स्त्री पर होने वाले अत्याचार के प्रति करुणा जगाने के लिए नहीं मर्दों को रेप करने का वाइकेरियस प्लेजर देने के लिए रखे जाते हैं, उसी तरह इन कहानियों में स्त्री शोषण के सारे आयाम एक ही स्थान पर उपलब्ध करा दिए गए हैं. यह बूढ़े मर्दों की फरमाइश पर पेश किया गया ‘मेड टु ऑर्डर’ व्यंजन है, इसीलिए उनके द्वारा प्रकाशित, प्रशंसित, अनुशंसित और पुरस्कृत है. यहां मर्दवादी लेस्बियन होमोफोबिया भी मौजूद है. पितृभाव दिखाते हुए पुरानी पीढ़ी के घोर पुरुषवादी लेखकों ने पिछले दो तीन दशकों में स्त्री की जो विमानवीकृत छवि गढ़ी उसी के अनुरूप स्वयं को ढालती हुई ये गुड़ियाएं खुद को अपने शरीर से अलग करके लेखन में स्त्री शरीर परोस रही हैं.

गीताश्री की कहानी ताप इस प्रवृत्ति का शास्त्रीय उदाहरण है. उसमें मां बेटी से कहती है, ‘मैं ठंडा गोश्त हूं जिसे गर्म नहीं किया जा सकता. अपने पापा के लिए किसी लड़की का इंतजाम कर दे.’ यही बात उसका सहकर्मी विप्लव उससे अपने पिता के विषय में कहता है, ‘बुड्ढा बहुत सेक्सी है. मिलवाऊंगा तो आफत आ जाएगी. फिर न कहना कि देखो तेरे पिता ने क्या कर दिया. नॉट जोकिंग यार सीरियसली. मेरी मां अब बहुत बूढ़ी हो गई है. पिता अब भी फफन रहे हैं. सोचता हूं उनके लिए किसी लड़की-वड़की का इंतजाम कर दूं. विप्लव हंसते हुए बता रहा था. न कोई संकोच न कोई शर्मिंदगी.’ (इरावती पृ.126)

वृद्धा मां और युवा विप्लव दोनों ‘लड़की-वड़की का इंतजाम’ की भाषा बोलते हैं. युवा बेटा अपने बाप के लिए लड़की का इंतजाम करता है और युवा बेटी अपने बाप के लिए. वृद्ध पिता कहता है’, ‘पांच-पांच हज़ार में एक से एक मिलती हैं.’ मां ‘ठंडा गोश्त’ है, पिता अब भी ‘फफन रहे हैं’ और लड़कियां बिक रही हैं. एग्रेसिव मेन और सब्मिसिव वुमन की सेडोमेसोचिस्ट छवि को अब पुरुष नहीं स्त्री पुख्ता कर रही है. ‘स्त्री आकांक्षा के मानचित्र’ की चितेरी इन गीताश्री की शान में राजेंद्र यादव संपादकीय लिख चुके हैं. मर्दों के खेला में यही स्त्री विमर्श है. वृद्ध पुरुष यौन बुभुक्षित हैं और युवा स्त्रियां उनका आहार. औरतों ने भी यही छवि आत्मसात कर ली है.

स्त्री की इस आत्मछवि के निर्माण में उन पुरस्कारों का भी हाथ है जो ऐसा लेखन प्रोत्साहित करने के लिए दिए जाते रहे. पुरस्कारों का अर्थ केवल 51 या 51 लाख रुपये, एक शॉल तथा नारियल, जिसे कविगण मंच से श्रीफल कहते सुने जाते हैं, ही नहीं होता. इसका मतलब यह भी है कि उन समयों में वैसा लेखन समाज में उत्कृष्ट माना जा रहा था. यही लेखन पीढ़ी के लिए नजीर बनता है और भावी पीढ़ी उसका अनुसरण करती है. लोकप्रियता ही श्रेष्ठता का आधार नहीं होती. इसी कारण उत्कृष्ट कला फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता है भले ही वे लोकप्रिय न भी हुई हों. हिंदी लेखन में कलावस्तु के स्थान पर पोर्न वस्तुओं का पुरस्कृत होना गहरी चिंता का विषय है.

आज सभी क्षेत्रों में स्त्रियां पुरुषों के बराबर खड़ी दिखाई दे रही हैं. आज वे केवल परीक्षाओं में सफल होकर डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापिका ही नहीं बन रहीं, राष्ट्रीय और निजी क्षेत्र के बैंकों की चेयरमैन कम मैनेजिंग डारेक्टर, कॉरपोरेट हाउसेज की मालकिन और अंतरिक्ष यात्री भी हैं. गांवों और शहरों में लाखों स्वास्थ्यकर्मी, एएनएम, आशा बहुएं, आंगनवाड़ी और प्राथमिक पाठशालाओं में काम करने वाली स्त्रियां खुद कमा रही हैं और घर चला रही हैं. अध्ययन बताते हैं कि एक तिहाई घरों की अकेली कमाने वाली सदस्य स्त्रियां हैं. परिवार के मुखिया के रूप में भले ही रजिस्टर में पुरुष का नाम लिखवा दिया जाए पर इन घरों में बच्चे अपने निखट्टू पिता की जगह कर्मठ मां की ही सत्ता मानते हैं.

खेद है कि हिंदी लेखन में सारी सत्ता ऐसे मर्दों के हाथ में है जिनके अपने निजी जीवन में स्त्रियों का न कोई आदर- सम्मान है न ही स्थान. वे प्रोफेसर हैं, संपादक और चयनकर्ता भी. इन मठाधीशों ने रमणिका गुप्ता जैसे लेखन को साहसिक बता कर अनुकरणीय बनाया और हिंदी लेखन में आलिंगन चुंबन द्वारा सत्ता हस्तांतरण की प्रणाली स्थापित होती चली गई. यह समकक्षता नहीं है. अवनतिशील वृद्धवृंद प्रगतिशीलता के प्रमाणपत्र बांट रहा है और  बार्बी डॉल्ज प्रमाणपत्र पाने को पंक्तिबद्ध खड़ी हैं.

इन हेय और उपेक्षणीय रचनाओं को उद्धृत करना मेरे लिए एक कष्टप्रद अनुभव रहा. मेरा उद्देश्य रचनाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करना नहीं बल्कि पाठकों के सामने स्त्री लेखन के नाम पर चल रही दुर्भावनापूर्ण पोर्न परंपरा की बानगी प्रस्तुत करना है. अंतिम निर्णय तो पाठक करेंगे और आने वाला समय.

जनवादियों द्वारा अतिनिंदित वेदों में एक प्रार्थना है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’. साहित्य को समाज के आगे मशाल ले कर चलते हुए समाज का पुरोधा होना चाहिए. आदिकाल, वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिककाल के बाद छद्म जनवादियों द्वारा निर्मित यह नवरीतिकाल का अंधायुग है. इस अंधे युग के ‘हर पल गहरे होते जाते अंधियारे’ में आबाल-वृद्ध (छोटी-बड़ी) बार्बी डॉल्ज से प्रगतिशीलता के रैंप पर कैटवॉक करवाई जा रही है- उजाले से अंधेरे की ओर.

जो पोर्न छवियां पूंजीवाद के बाजार में इंटरनेट पर क्रेडिट कार्ड द्वारा पेमेंट करके खरीदी जाती हैं, प्रगतिशील जनवादियों के बाजार में वे ही छवियां मुफ्त में उपलब्ध हैं. इस बाजार को ही हिंदी साहित्य बताया जा रहा है. यह बाजार युवाओं द्वारा नहीं मर्दों के वृद्धवृंद द्वारा संचालित, पोषित और नियंत्रित है. इसमें वृद्ध, प्रौढ़ और युवा बार्बी डॉल्ज नृत्य में अव्वल आने के लिए एक-दूसरे से होड़ ले रही हैं. यह स्त्री विमर्श के नाम पर चल रहा उन्मादग्रस्त आनंदनृत्य है .

धार्मिक रूढि़वाद के विरुद्ध स्त्रीमुक्ति की आवाज उठाते बहुत समय हो गया. जनवादियों का यह पोर्न अनुष्ठान उससे ज्यादा खतरनाक है क्योंकि इसे प्रगतिशील स्त्री विमर्श के रूप में पेश किया जा रहा है. आज यह आवाज छद्म जनवाद के खिलाफ उठा रही हूं, इसलिए कि अब और चुप रह पाना मुमकिन नहीं और इसलिए भी कि मुझे पूरा यकीन है इस आवाज को जरूर सुना जाएगा.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 1, Dated January 6, 2014)

85 Comments

  • लेकिन यह आनंद-नृत्य अब बहुत ही बोर करता है. आपने सही ही पोर्नोग्राफिक राइटिंग की संज्ञा दी है. इनलोगों में एक अच्छी इरोटिका लिखने की भी सलाहियत नहीं है.

  • हर्फ़ हर्फ़ सहमत हूँ. साथ ही और समझ पा रहा हूँ कि ये गीताश्रीयायें मुज़फ्फरनगर से गुजरात तक के बलात्कारों पर ऐसे चुप कैसे रह लेती हैं.

  • बेहतरीन आलेख.. बहुत रिसर्च किया है आपने.
    बधाई.

  • दूसरे के लेखन को पोर्न कहते-कहते शालिनी माथुर खुद अपनी भाषा में पोर्न के हद तक अशालीन और फूहड हो गई हैं। सामाजिक सरोकार के नाम पर किसी को किसी पर कीचड़ उछालने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। साहित्य समीक्षा के बहाने निजी जीवन पर अशोभन टिपण्णी करने की मैं भर्त्सना करता हूँ। दूसरों पर सनसनी का आरोप लगनेवाली शालिनी माथुर खुद सनसनी बटोरना चाहती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब किसी का character assassination नहीं होता। तहलका को इसे छापने के पहले सोचना चाहिए था। इसके साथ छपे चित्र भी अश्लील हैं। इन चित्रों पर शालिनी माथुर की राय जानना भी दिलचस्प होगा।

    • बहुत ही चतुराई और बारीकी से लिखी गयी बाहियात लेख ! सिर्फ वाहवाहियों के लिए और ध्यानाकर्षण के लिए ! शैलेश जी ! तहलका के मालिक ही जब लाजवाब रंगीन मिजाज वाले थे तो पोर्न पोर्न तो खेलेंगे ही…!

  • एक बहुत ही महत्वपूर्ण अभूतपूर्व लेख .गंभीर चिंतन और भाषा की इतनी शालीनता अब
    कम ही देखने को मिलती है। समकालीन हिन्दी लेखन पर पिछले कई दशकों में लिखा गया सबसे प्रभावशाली लेख। यह लेख लोगों पर नहीं प्रवृत्तियों पर प्रहार करता है। लेख में ना एक भी व्यक्तिगत टिप्पणी है ना ही एक भी फूहड़ शब्द। इतने जटिल विषय पर बहुत परिश्रम से तय्यार किया गया लेख और बहुत ही संयमित शब्दावली में किया गया प्रस्तुतीकरण। यह लेख इस अंक की उपलब्धि है।

    वैसे पूरा अंक ही सुरुचिपूर्ण है।बधाई
    मुकेश ओझा

  • शालिनी जी,
    इस बेहतरीन लेख के लिए आपको बधाई. स्तन कैंसर विषय पर कुछ कविताओं को लेकर हुए विवाद पर आपका लेख भी मैंने पढ़ा था. वह भी शानदार था. शरीर को भावनाओं से अलग-थलग करने का प्रयास बाजारवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति का एजेंडा है. यह कतई जनवादी नहीं हो सकता. जो तथाकथित जनवादी आलोचक ऐसी रचनाओं को सराह रहे हैं, उनका आपने अच्छा परदाफाश किया है. धन्यवाद.
    सत्य प्रकाश चौधरी
    जन संस्कृति मंच, रांची

  • स्त्री कथाकारों की कहानियों पर बात करते हुये एक स्त्री समीक्षक सामान्य मर्यादा की सारी सरहदें लांघ कर कहानियों के बहाने उन स्त्री कथाकारों के व्यक्तित्व पर ही गैरज़रूरी और अशोभन टिप्पणी करने लगती हैं, दूसरी शिशुमना स्त्री इस सनसनीखेज लेख को मसालेदार चित्रों से सजाकर परोसने लायक बनाती है और इन सबसे ऊपर एक पुरुष संपादक अपने संपादकीय में इन दोनों स्त्रियॉं की तारीफ करता है… सच में यह पुरुषों के खेला में औरत का नाच है! विमर्शों का यही हश्र होता है बाज़ार के दबाव में। एक गंभीर विषय पर उतना ही अगंभीर लेख!

  • हैरान नहीं हूँ, क्योंकि जानता हूँ उत्तेजना पैदा कर जो सफलता की सीढियाँ ढूंढी जा रही हैं ..वो बहुत आसान है| किन्तु इसे बेबाकी बिल्कुल भी नहीं कही जा सकती| ये एक तय ढर्रा है| स्त्री विषय-वासना से उठकर भी एक विषय है इसका प्रयास सबसे पहले स्त्री को ही करना पड़ेगा| शालिनी माथुर जी को इस गंभीर लेख के लिए साधुवाद और उम्मीद करते हैं स्त्री मर्यादा को बचाए रखने के लिए साहित्यिक और पाठक ऐसी रचनाओं की भर्त्षणा करेंगे|

  • शालिनी माथुर जी ,
    आपका आभार , आपका यह विश्लेषित लेख हतप्रभ करता है सच पूछा जाय तो यह स्त्री विमर्श का एक्स रे रिपोर्ट है । आपकी बेबाक दृष्टि को सलाम ।

  • mein maitreyi pushpa k chaak ki bare me kehna chahti hu jiske bare me aapne kuchh kaha h…aapnje us upanyas me bass wahi panne padhe h jinke bare me aapne zikr kiya h..mujhe to aisa hi lagta h..kya saarang ko sreedhar aae se pehle gaanv me koyi nhi mila hoga kya shareerik samband k liye…chak k pehle pannon ko padhiye we apne pati se bahut pyaar karti h..woh pyaar tab badalta h jab ranjit pradhan logon k changul me fansta h..fir b woh nyay k liye ladti h..deh ko saunpkar nhi..jab sreedhar master aata h tab usko us ladaayi me ladne k liye ek saathi milta h..sreeedhar se woh kitne baar mile..kya unke sath dehik sambandh hua jo ho sakta tha…?aur jab sreedhar se pyaar ho jata h..uske bad jab woh beemar padta h usko zindagi me wapas lane k liye jo hua kya woh galat h?stree ka jiske sath sex hona h ya nhi uske bare me woh to nirnay kar sakti h na?kya isse achha kaam h balatkaar ya kanya bhroon hatya?agar pati uska sath deti to kya sreedhar k sath uska sambandh hota?ant me kya hota h woh sreedhar k sath aisa hi karte karte veshya ban jaati h kya?woh gaanv k chunav me pradhan k viruddh ladti h…aisi stree k us shareerik sambandh k bare me matr zikr karke us charitr ko andekha karna ya aisi sakriy stree patr ko chhota karna uchit nhi h..maitreyi ji ne aisa abhi tak apne upanyason me nahi likha h jo samaj me nhi hota h..kuchh cheezein aisi h ki hamein maloom h ye sab hota h uar sach h fir b koyi kahe to hum sweekar nhi karna chahte..maitreyiji ne b aise vishayon ka zikr kiya h jo samaj ko khalta h..agar sirf apne laabh k liye we purushon k sath gayi hoti to chaak k liye minimum 10 puraskaar milte..aur yeh b zikr karna chahti hbu ki itne logon ke priya upanyas chaak ko ek b puraskaar nhi mila…

  • शालिनी माथुर ने जो लेख से बताना चाहा है वो चिंतनीय तो है ही……परत- दर- परत काफी कुछ उद्‍घाटित किया…..ऐसा सबके बस की बात नही. शुक्रिया शालिनी जी.

  • जो लोग इसे स्त्रियों के विरुद्ध लिखा गया लेख या इस लेख के बहाने स्त्रियों पर आरोप लगाने का बहाना ढूँढ रहे हैं, उन्हें ज्ञात हो कि शालिनी ने शीर्षक में ही स्पष्ट किया है कि यह ‘पुरुषों का खेला’ है और कि अपनी धूर्तता से पुरुष ही स्त्रियों को ‘नचा रहे’ हैं। पुरुषों ने जैसे स्त्री के लिए कभी बाजार बनाया था तैसे ही अब इन धूर्तों ने साहित्य का बाजार ऐसा बना दिया है कि लेखिकाएँ उस बाजार में खड़ी प्रतीत होती हैं और समाज के तथाकथित आप सभ्य लोग उन पर थू-थू करने में लगे हैं।

    लेख आँखें खोलने वाला नहीं, अपितु रुलाने वाला है, स्त्री की दशा पर रो सकने का माद्दा बचा हो तो रो लीजिए उनकी इस दुर्दशा पर, कि वे पोर्नो-ग्राम में परिवर्तित हो चुके साहित्य-समाज में पुरुषों के रचे व्यूह में फँस उन हथकंडों के लिए बाध्य की जाती हैं जिसे आप हम स्वेच्छा से अपनाया गया मार्ग कह कर पुनः स्त्री को ही तिलांजलि देते हैं।

    पुरुषों द्वारा साहित्य में रची गई ही नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन में अपनाई गई पोर्नोग्राफ़ी और साहित्य समाज में फैलाए गए व्यभिचार पर आँख मूँदने वालों को इस लेख की आड़ में स्त्रियों को धिक्कारना बिलकुल वैसा ही है जैसे स्त्री को विवश व बाध्य कर अपनी शर्तों पर नचाना और फिर उस नाच के कारण ही उसे नीचा प्रमाणित कर तिलांजलि देना, या समाज बहिष्कृत करना।

    शालिनी के इस लेख का अर्थ समझने के लिए उद्धरणों में मत अटकिए अपितु लेख के मर्म तक पहुँच सकने जितनी समझ विकसित करिए। …. और वह विकसित करने की सामर्थ्य न हो तो शीघ्र ही शालिनी के नए लेख की प्रतीक्षा कीजिए।

    अजीब हाल है कि इसकी आड़ में स्त्रियों को धिक्कारने का ठेका उठा लिया है पुरुष-सत्तात्मक स्त्रीविरोधी कुंठित लोगों ने। लेख का उद्देश्य यह कदापि नहीं है। जो ऐसा आकार रहे हैं वे संदर्भ से काट कर लेख को पढ़ रहे हैं।

  • (पूर्व टिप्पणी में वर्तनी की एक भूल रह गई है अतः उसे हटा दें। उसके स्थान पर पुनः यह टिप्पणी )

    जो लोग इसे स्त्रियों के विरुद्ध लिखा गया लेख या इस लेख के बहाने स्त्रियों पर आरोप लगाने का बहाना ढूँढ रहे हैं, उन्हें ज्ञात हो कि शालिनी ने शीर्षक में ही स्पष्ट किया है कि यह ‘पुरुषों का खेला’ है और कि अपनी धूर्तता से पुरुष ही स्त्रियों को ‘नचा रहे’ हैं। पुरुषों ने जैसे स्त्री के लिए कभी बाजार बनाया था तैसे ही अब इन धूर्तों ने साहित्य का बाजार ऐसा बना दिया है कि लेखिकाएँ उस बाजार में खड़ी प्रतीत होती हैं और समाज के तथाकथित आप सभ्य लोग उन पर थू-थू करने में लगे हैं।

    लेख आँखें खोलने वाला नहीं, अपितु रुलाने वाला है, स्त्री की दशा पर रो सकने का माद्दा बचा हो तो रो लीजिए उनकी इस दुर्दशा पर, कि वे पोर्नो-ग्राम में परिवर्तित हो चुके साहित्य-समाज में पुरुषों के रचे व्यूह में फँस उन हथकंडों के लिए बाध्य की जाती हैं जिसे आप हम स्वेच्छा से अपनाया गया मार्ग कह कर पुनः स्त्री को ही तिलांजलि देते हैं।

    पुरुषों द्वारा साहित्य में रची गई ही नहीं, बल्कि उनके अपने जीवन में अपनाई गई पोर्नोग्राफ़ी और साहित्य समाज में फैलाए गए व्यभिचार पर आँख मूँदने वालों को इस लेख की आड़ में स्त्रियों को धिक्कारना बिलकुल वैसा ही है जैसे स्त्री को विवश व बाध्य कर अपनी शर्तों पर नचाना और फिर उस नाच के कारण ही उसे नीचा प्रमाणित कर तिलांजलि देना, या समाज बहिष्कृत करना।

    शालिनी के इस लेख का अर्थ समझने के लिए उद्धरणों में मत अटकिए अपितु लेख के मर्म तक पहुँच सकने जितनी समझ विकसित करिए। …. और वह विकसित करने की सामर्थ्य न हो तो शीघ्र ही शालिनी के नए लेख की प्रतीक्षा कीजिए।

    अजीब हाल है कि इसकी आड़ में स्त्रियों को धिक्कारने का ठेका उठा लिया है पुरुष-सत्तात्मक स्त्रीविरोधी कुंठित लोगों ने। लेख का उद्देश्य यह कदापि नहीं है। जो ऐसा कर रहे हैं वे संदर्भ से काट कर लेख को पढ़ रहे हैं।

  • एक गंभीर और आँखें खोल देने वाला लेख जिसे मैं तो मील कापत्थर ही कहूंगी| शायद महिला साहित्यकार अब भी चेते और अपने को बार्बी डाल्ज बनाने से बचाने की जुगत करें | क्या कहूं एक ही बैठक में पूरा पढ़ गयी और अब प्रिंट लेकर अपने उन मित्रों को पढ़ने के लिए देरही हूँ जो नेट पर आना नहीं चाहते अथवा ऐसे लेखो को पढ़ने का ख़तरा मोल लेना नहीं चाहते |

  • ”पुरुषो के खेला” के कारण ही अनेक लेखिकाएं साहित्य की काल गर्ल-सी लगने लगी है शालिनी खन्ना का यह लेख समकालीन स्त्री विमर्श की पोल खोल कर रख देता है। ये लेखिकाएं बोलडनेस के नाप पर साहित्य को और स्त्री-समाज को कहाँ ले जा रही है? साहित्य का अर्थ है सबका हित साथ ले कर चलना, मगर यहाँ तो अहित ही अहित नज़र आ रहा है और इसके पीछे पुरुषो का भयानक खेला रहा है, यह खेल आज भी जारी है , काश इस खेल को ये औरते समझ पाती। मैं शालिनी खन्ना को नमन करता हूँ

  • विचार का विषय है कि रिश्ते के ननदोई की लुंगी खींच कर उसे फुल बॉडी मसाज देने वाली अधेड़ भाभी के लल्लू कैलासी के साथ स्वच्छंद यौनाचार का विशद वर्णन करने वाली 1944 में जन्मी वयस्क लेखिका ने 2008 में एकाएक ‘गुड़िया’ बनकर लकड़ी के दरवाजे को छू कर राजेंद्र यादव कैसे समझा? यही नहीं, कैसे उन्होंने इस प्रसंग को इतना अधिक महत्वपूर्ण समझा कि उसे अपनी आत्मकथा का हिस्सा बनाया. यौन सक्रियता के वर्णन में सारे लेखकों को पीछे छोड़ कर इस क्षेत्र की पुरोधा के रूप में प्रतिष्ठा पा चुकी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा संपादक के आगे चाइल्ड वुमन बन जाती हैं, उन्हें छूने को लालायित. क्यों?

    ध्यान से पढ़ें। शालिनी जी ने सारंग के चरित्र का नहीं मैत्रेयी के गुड़िया बनने का विरोध किया है।
    यह बहुत गंभीर समीक्षा है उसे मैत्रेयी पुष्पा पर केन्द्रित ना करें। लेखिका ने बड़े कष्ट से उद्धरण दिये हैं। उन्हें छोड़ दें केवल लेख पढ़ें . आप समझ जायेंगे की लेख व्यक्ति परक नहीं विचार परक है। ऐसे उत्कृष्ट लेख बरसों में एक लिखे जाते हैं। गिरोहबंदी से बाहर आ कर साहित्य की बात करें।आशा है आप पुनः पढ़ लेंगे।

  • ये कहानियां औऱ उपन्यास हो सकता है मन की वो बातें हो जो जीवन में न होने के कारण किताबों में आई होंगी। कुछ कहानियां निजी जीवन की सच्चाई रही हैं। मगर इसका मतलब ये नहीं है कि ये साहित्य समाज के आगे मशान लेकर चल रहा है। आज आम आदमी प्रेमचंद के बाद किसी साहित्यकार को नहीं जानता। चंद लोगो कि किताबों लाइब्रेरी में खरीदी किताबें आने वाले समय में उसी तरह किनारे पड़ी रहेंगी और उन्हं कोई नहीं पूछेगा जैसे आज भी आम आदमी नहीं पूछता।

  • ऐसे ही आलोचना की जरुरत हिंदी साहित्य को है ताकि हिंदी साहित्य सही रास्ते पर आ सके.

  • लेख में किसी का भी चरित्र हनन नहीं है न ही कोई व्यक्तिगत टिप्पणी।इतनी शालीनतापूर्वक लिखे गये लेख पर अशालीनता का आरोप लगने वाले शैलेश प्रभाकर और शैलजा रस्तोगी जी को सिद्ध करना होगा की कौन सा शब्द अशालीन है और चरित्र हनन किसका हुआ। लेख में किसी का भी चरित्र हनन नहीं है न ही कोई व्यक्तिगत टिप्पणी।इतनी बेहतर हो लोग इसे गंभीरता से पढ़ें और अपनी व्यक्तिगत कुंठा और भड़ास निकलने के लिये राजनीति न करें। चित्रों का चयन और रेखांकन पत्रिका करती है लेखक नहीं । चीज़ों को नई दृष्टि से देखने का प्रयास करने कि जगह गैरज़िम्मेदार निराधार कमेन्ट दुर्भाग्यपूर्ण है।

    सच तो यह है की पूरा हिन्दी संसार व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोपों और पक्षपात से भरा हुआ है। ऐसे में मैं तो बहुत खुश थी कि कम से कम एक लेख तो ऐसा आया जो विचार की बात करता है .लेख पूरे अध्ययन और समझ के साथ लिखा गया है। ऐसे लेखन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये कविता जी से सहमत हूँ .

  • बहुत अच्छा लेख है,इसे गंभीरता से पढ़ने की ज़रूरत है…

  • बेहतरीन और सार्थक लेख.. बहुत दिनों बाद हिंदी में एक अच्छा और उच्च कोटि का लेख पढ़ने को मिला।

  • पूरी तरह सहमत

  • सामान्य पाठक और एक विवेकशील आम नागरिक होने के नाते मैं इस लेख पर यह कहना चाहूँगा कि शालिनी माथुर ने समाज के जिन प्रसंगो, लेखकीय दृष्टान्तो के खिलाफ लिखा उन्ही से मेरी सहानुभूति है. संक्रमण काल में मूल्यों की तलाश कदाचित धरती पर चाँद देखने जैसा ही है. अंत में तमसो मा ज्योति पर लाकर छोड़ देना यही दिखाता है कि धार्मिक संस्कार ही उनका प्रमुख चश्मा है जिसमे उनका प्रथम दुश्मन प्रगतिशील ताकते है न कि कार्पोरेट पूंजी…बेहतर होता कि शोभा दे जैसी अंग्रेजी लेखको और खुशवत सिंहो का हवाला दिया जाता तब भारतीय समाज की एक समग्र छवि सामने आती. पुरातन मूल्यों की छिटकन-दरकन से भला कौन परेशान हो सकता है ? मुझे खुशी है उन विषयों पर अब लिखा जा रहा है जो वर्जित थे ..बूढ़े लोगो के जिस चाल चलन पर शालिनी माथुर को दिक्कत है उन्हें पश्चिम में औरतो की हैसियत अगर वैसी ही दिखे मिले तब कौन से राजेंद्र यादव और नामवर सिंह को दोष देंगी? स्त्री मुक्ति मानव मुक्ति के संघर्ष से अलग नहीं है, बूर्जूआ चिंतन में स्त्री मुक्ति उसकी उद्दण्ड स्वछंदता को बाजार में परोस देती है ठीक उसी रूप में जिस तरह पितृ सत्ता के तहत उत्पन्न हुए धर्मो ने औरत को मर्द का गुलाम बनाने का दर्स दिया.

  • manniya ji
    namasty
    yeh lekh sachmuch prabhavshali hai- yeh sach kaha hai–

    लेख आँखें खोलने वाला नहीं, अपितु रुलाने वाला है–

    1. lekhak bhai samaj ka ang hain- par lekhak ko samaaj ko raah dikhane wala ”purodha” hona chahiye–
    2. LEKHAN KO SO-UDHESHYA-PURAN HONA CAHIYE !

    SAADAR-
    OM SAPRA, DELHI-9

  • विचारोत्तेजक एवं समसामयिक आलेख लिखने की हिम्मत को सलाम।

  • Ek behad behad zarrori sach likhne kaa sahas kiya hai aapne Shalini ji!!! Aapko salaam!!

  • निश्चय ही शालिनी जी का यह आलेख तथाकथित साहित्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर परोसी जानेवाली स्वच्छंदता को उजागर करने वाला एक जीवंत दस्तावेज़ है.. उन्होंने अपने गहन अध्ययन से जो सृजन के नाम पर रचे गए सोदाहरण जो वीभत्स सत्य अपने इस आलेख में सामने रखें हैं.. न केवल विचारणीय है अपितु हमारे साहित्य सरोकारों की आँखे खोल देनेवाला भी है अगर वे आँखे रखते हों..शालिनी जी को बधाई और पढ़वाने के लिए आभार!

  • मर्दों के खेला के नाम से किसी मर्द ने नहीं बल्कि मैडम शालिनी ने एक औरत हो कर दूसरी औरतों का दू:सासन की तरह चिर हरण किया है.इस लेख की भाषा फूहड़ और अश्लील है!इसमें रचनाकारों की रचनाओं पर नहीं उनके व्यक्तिगत जीवन पर टिप्पणी की गयी है, उनका चरित्र हनन किया गया है. मर्यादा की दुहाई दे-दे कर मर्यादा की सारी हदें पार कर दी गयी है. क्या गाली-गलौज और व्यक्तिगत आलोचना को ही अब समीक्षा कहा जायेगा? अश्लील तस्वीरों के साथ लेखिकाओं पर कीचड उछालना… साहित्य की एक विधा समीक्षा का यह घोर पतन काल है जिसकी जननी शालिनी माथुर हैं!

  • जिन सब लिखिकाओं,लेखकों एवं समीक्षकों का वर्णन लेख में आया है,ज्यातर का नाम मैं ने शायद इस आलेख के जरिये ही पढा। खुद को ’हिन्दी वाला’ मानता हूँ, धिक्कार है,उन पर जो हिन्दी साहित्य के नाम पर ’नंगापन’ परोसें,खरीदें,सराहें और महिमा मन्डित करें!

    अब या तो वह सब ’हिन्दी’नहीं थी,जो अब तक पढता,पढाता,कहता,सुनाता और लिखने का प्रयास करता रहा,या फ़िर मैं,’आधुनिक’ नहीं हुँ!

    आप निश्चिंत रहें इस तरह का लेखन,पाठन,व महिमा मंडन वहीं हो रहा हैं जहाँ,’उपभोक्तावाद’ पूरी तरह जड जमा चुका है!

    निश्चित ही जो लोग ’वस्तुयें’ ढूँडते,बेचते और खरीदते रहे ता उम्र,एक दिन खुद “चीज़” बन कर,बिक जाँये,खरीदे जायें,नीलाम हो,या कुर्की के मार्फ़त ’जब्त हो जायें तो अचरज कैसा?

  • भयंकर असहमतियों के बावजूद इन लेखिकाओं को पढ़ते रहना, याद (रिकॉर्ड) रखना और इस शानदार प्रवाह में लिखना – असाधारण है। लोग लिखने,पारिश्रमिक, पैसे, नाम, ईनाम और तमाम उद्देश्यों से लिखते हैं पर आपका लिखा पढ़कर लगता है आपने पढ़वाने के लिए लिखा है। जो छोड़ सकता है छोड़ दे। हिन्दी की दुनिया में क्या हो रहा है इसका भी अंदाजा लग जाता है। सलाम। शुक्रिया।

  • आज के भयाबल स्थिति में युवतियों की सुरक्षा एक बहुत बड़ी चिंता बन गई है। इस स्थिति से निपटने के लिए सही युक्ति से सही चिंचन करना होगा तभी स्थिति में बदलाव होगा। अन्यथा आने वाले समय में स्त्री को अत्याचार से और ज्यादा रूबरब होना पड़ेगा.

  • अजीब है ये लेख! पढ़ कर लगता नहीं इसका उद्देश्य सामाजिक सरोकार है! समीक्षक(?) जैसे चरित्र हनन करने निकली हैं। साहित्य की मीमांसा नहीं, व्यक्तिगत आक्षेप अधिक है। बड़े अधिकार से शालिनी देवी स्थापनाएं देती हैं, फतवा जारी करती हैं और बताती हैं क्या उचित है क्या अनुचित। वे चरित्र का प्रमाण पात्र भी बड़ी उदारता से बांटती चलती है। एक तरह से वे moral police बनी हुई हैं। किस अधर पर वे कह रही हैं की जो ये लेखिकाएं लिख रही हैं वह संपादकों के इशारे पर? Public forum में जो कह रही हैं उसे substanciate भी करती चलें।
    मुझे अचरज है ऐसे चरित्र हनन और दुष्प्रचार को अब समीक्षा का नाम दिया जा रहा है। सचमुच यह साहित्य का पतन काल है! हम साहित्य पर बात करें, साहित्यकार के निजी जीवन पर क्यों? मुझे हैरत है कि ये प्रतिष्ठित लेखिकाएं अब तक चुप क्यों बैठी हैं! उन्हें जवाब देना चाहिए। ये सनसनी, अफवाह, गाशिप हिंदी साहित्य को किस गर्त में ले जायेगा यह सोच कर चिंतित हूँ!

  • शालिनी माथुर् जी इस दुख से मरी जा रही है कि औरतो ने वह लिख दिया जो वर्जित है और जिसकी अनुमति इस समाज ने उसे नहीँ दिया. यह मानसिकता घोर सामँतवादी है. इनका लेख पढ कर मुझे उन मोराल पुलिस वालोँ की याद आ रही है जो वेलेन टाइन डे पर प्रेमी युगलोँ को दौडा-दौडा कर मारते हैँ. शाहित्य को पवित्र होना चाहिये, उपदेशात्मक होना चाहिये, चरित्र निर्माण करना चाहिये… इसके नारी पात्र सीता जैसी हो, सावित्री हो… साहित्य ना हुआ नैतिक शिक्षा का पाठ हो गया! ग्रो अप मैम! अपने त्रेता युग से बाहर आइये और समय के साथ चलिये. साहित्य के नाम पर कब तक हितोपदेश परोसा जायेगा? वी वाँट सम रीयल मैच्योर स्टफ! इन साहित्यकारोँ को कुछ अच्छा-सच्चा लिखने दिजिये, दुनिया को सुधारने के लिये इतने सारे सँत, पैगम्बर, महात्मा हैँ ना! और ऊपर से आप भी!

    • यह बात बार-बार की जा रही है कि लेखक की रचना पर बात करो, लेकिन उस लेखक के जीवन की तरफ से आँख फेर कर रहो… यह वो पूंजीवादी दृस्टि ही है जो लेखन और जीवन के बीच फांक चाहती है। कोइ प्रतिबध्धता मूल्य नहीं,,, सिर्फ प्रतिष्ठा मूल्य ही बना रहे… ये चारित्रिक दोगलेपन को छुपाने की चालाकी है,,। हिंदी में ये बहुत हो रहा। . एक भ्रष्ट भी सामाजिक बौद्धिक स्वीकृती का जीवन जीना चाहता है,,, लेखक कोई सुर्खाब के पर वाला नहीं है। यह कैसा द्वेत है कि गरीब की रोटी की कीमत पर ऊँचे स्वर में रोना रो रहे है। और पांच सितारा होटल में बैठ कर हज़ारों की शराब पी जाते है–लेखक सेक्स का चटखारे ले रहा है।और कह रहा है कि वो औरत को मुक्ति दिला रहा है…इस्के साथ ही निजता कि बात भी करना चाहता है …कैसॆ और कौनसी निज्ता। ये वही व्यक्तिवाद है, जो पूंजीवाद का प्रथमिक मूल्य बनता रहा है। ये सामूहिकता के खिलाफ छल-छद्म की ही गली है जो उसी जगह लेजा कर छोड़ती है। जहां व्यक्ति -और समष्टि के प्रश्न खड़े होते ह.…। शालिनी माथुर ने शालीन और चिकने चेहरों कि बदसूरती उजागर कर दी बस उसी का सारा रोना-धोना और दिक्कत है। ये देह के गोपन को तो खोलना चाहती है. लेकिनअपने लेखकीय चरित्र के द्वेध और को गोपन बनाये रखना चाहती है,,,,,, में कहता हूँ कि उसको क्यों गोपनरीय माना और बनाया जा रहा है। शालीनी माथुर ने मुक्तिबोध की इस बात की तस्दीक ही की है।कि जो है उसे से बेहतर चाहिये। इस देश को एक मेहतर चाहिये… औ र अब एक समझ दार औरत के हाथ में असली झाड़ू आयी है…गन्द्दगी बहुत हो गयी है …

  • और हाँ! मैँने सब तो नहीँ मगर यहाँ जिन कहानियो का ज़िक्र हुआ है उनमेँ से कुछ कहानियाँ ज़रुर पढी है. खास कर गीताश्री की गोरिल्ला प्यार और जयश्री राय की कहनी देह के पार-शीर्षक से ही ज़ाहिर है इसमेँ देह से आगे की बात की गई है- विशुद्ध प्रेम की स्थापना! जिस तरह पुण्य की बात करते हुये पाप को समझना ज़रुरी हो जाता है उसी तरह इस कहानी मेँ प्रेम के सँदर्भ मेँ सेक्स का ज़िक्र आया है. प्रेम और वासना के बीच के फर्क को स्पष्ट करने के लिये, प्रेम की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिये! इस मेँ पशुवत देह वादिता का नकार है. इस कथा की नायिका कभी किसी पुरुष वेश्या को नहीँ खरीदती. हाथ कंगन को आरसी क्या! कोई भी इस कहानी को पढ कर देख ले! इस मिथ्या प्रचार का मतलब क्या है!

  • Nice work with a outlook

  • aapne ek bahut he jabardast lekh likha hai. hum hindi sahitya likha rahe hain ya fir aanewali reedhi ko sex ke baare mein bata rahe hain. kya yahe hindi sahitya hai.lekhakon ko he sayad dos dena uchit nahen hoga. hindi ki patrikayen bhi dosi hain.aisi rachnaaon ko padah kar purus aur aurat sex to kar sakti hain lekin bhavisya nahin sudhar sakata

  • The article written by Shalini mathur is of a very poor taste.She got every right to critisize a literary work but her main interest seems to be soiling and tarnishing the image of of those authors. She has crossed all the limits of decency and snooped into the private life of autors. This is illigal loathsome and simply not done. In a democratic natipn like ours one has every right to live the way he/she wants to. We should not be interested in pipping through the key wholes to invade their personal life. This is pervert and sick!Ms Shalini writes confidentaly about everyone’s personal life. As if all the ladies confide in her every secret of their life! Has she put some surveillance on them? It’s a very dengerous trend. We should put a hold on such melacious writing. All those who keeping quiet just to be on safe side should realize if it’s happening to some one to day, tomorrow it can happen to them too! Fudal man not only surpress women folk through wrong means and physical power but also through the other women over whom they rule through centuries of conditioning. Women like Shalini mathur are nothing but slaves of these fudal mentality.

  • Kahte hain na ki ek naari ki sabse baadi dushman ek naari hi hoti hain. Salini Mathur ne aapne ghatiye lekh se yeh 100% saabit kar diya hain. Kya auraton ko mard ke barabar hona koi paap hai? Shrimati Mathur ne aapne lekhan se Bharat ke naariyon ka sirr lazza se jhuka diya hai.

  • एक साथ अनेक प्रायोजित कमेंट्स आ गए। एक बहुत उच्च कोटि की समीक्षा पर उल्टे सीधे और गलत कमेंट लिख कर दो चार लोग विचार को हरा नहीं सकते. लेख में किसी का भी चरित्र हनन नहीं है न ही कोई व्यक्तिगत टिप्पणी। लेख व्यक्ति परक नहीं है. इतनी शालीनतापूर्वक लिखे गये लेख पर अशालीनता का आरोप लगने वाले को सिद्ध करना होगा व्यक्तिगत कमेंट किस लेखिका पर है। किस के जीवन या चरित्र पर है। कौन सा शब्द अशालीन है और चरित्र हनन किसका हुआ। लेख में किसी का भी चरित्र हनन नहीं है न ही कोई व्यक्तिगत टिप्पणी।
    लेख पूरे अध्ययन और समझ के साथ लिखा गया है और चीज़ों को नई दृष्टि से देखने का प्रयास करने की बात करता है ।ऐसे ही आलोचना की जरुरत हिंदी साहित्य को है. । ऐसे उत्कृष्ट विचार परक लेख बरसों में एक लिखे जाते हैं। लेख ने आम लोगों के विचारों को ज़ुबान दी है। अनेक अखबार इसे उद्धृत कर रहे हैं। इन टिप्पणियों की भाषा से पता चल रहा है कि अपनी व्यक्तिगत कुंठा और भड़ास निकलने के लिये ये दुर्भावना से एक साथ लिखी जा रही हैं।

  • शालिनी माथुर का लेख शायद कमलेश्वर के ऐय्याश प्रेतों का विद्रोह के बाद लिखा गया दूसरा ऐसा लेख ऐसा लेख है, जिसने साहित्य में sextualization की विकृति के तरफ उंगली उठायी है। …। हिंदी कहानी लगभग इंडस्ट्रियल वेजाइना के सच को साहित्यिकृत कर रही थी …बूढ़े जिनको medicos कहा करते है …PROSTATE , उसके शत-प्रतिशत उदाहरण प्रतुत हो रहे थे । सर्जरी में ऐसे मनोविकार ग्रस्त लोगों के लिए बहुत मारक टिपण्णी कही गयी है। it is the only state of equality when the master and his dog come on same plane …… ये साहित्य के लार टपकाते hounds थे
    निश्चय ही जिस तरह फैशन की दुनिआ में काम करने वाले पुरूष के इशारे पर औरत अपने कपडे खुशी खुशी उतार ती रही थॆ… हिंदी कहानी में लेखिकाएं अपने पात्रों को नंगा करने के अभियान में मुब्तिला थी…उन बूढो का Maange More वाला हाल था …।कहानियोन में लीटरों वालl स्खलन हो रहा थl…जबकि उन कहानियों का मूल्यांकन वालों
    कि हक़ीक़त बूँद भर की भी नहीं थॆ… निराला जी के शब्दों में कहा जाए रेत -सा ज्यो तन रह गया का ही सच thaa..

    शालिनी पर वोही हमला कर सकते हैन।जो industrial vagina के कारोबारी हैन।

  • यह बात बार-बार की जा रही है कि लेखक की रचना पर बात करो, लेकिन उस लेखक के जीवन की तरफ से आँख फेर कर रहो… यह वो पूंजीवादी दृस्टि ही है जो लेखन और जीवन के बीच फांक चाहती है। कोइ प्रतिबध्धता मूल्य नहीं,,, सिर्फ प्रतिष्ठा मूल्य ही बना रहे… ये चारित्रिक दोगलेपन को छुपाने की चालाकी है,,। हिंदी में ये बहुत हो रहा। . एक भ्रष्ट भी सामाजिक बौद्धिक स्वीकृती का जीवन जीना चाहता है,,, लेखक कोई सुर्खाब के पर वाला नहीं है। यह कैसा द्वेत है कि गरीब की रोटी की कीमत पर ऊँचे स्वर में रोना रो रहे है। और पांच सितारा होटल में बैठ कर हज़ारों की शराब पी जाते है–लेखक सेक्स का चटखारे ले रहा है।और कह रहा है कि वो औरत को मुक्ति दिला रहा है…इस्के साथ ही निजता कि बात भी करना चाहता है …कैसॆ और कौनसी निज्ता। ये वही व्यक्तिवाद है, जो पूंजीवाद का प्रथमिक मूल्य बनता रहा है। ये सामूहिकता के खिलाफ छल-छद्म की ही गली है जो उसी जगह लेजा कर छोड़ती है। जहां व्यक्ति -और समष्टि के प्रश्न खड़े होते ह.…। शालिनी माथुर ने शालीन और चिकने चेहरों कि बदसूरती उजागर कर दी बस उसी का सारा रोना-धोना और दिक्कत है। ये देह के गोपन को तो खोलना चाहती है. लेकिनअपने लेखकीय चरित्र के द्वेध और को गोपन बनाये रखना चाहती है,,,,,, में कहता हूँ कि उसको क्यों गोपनरीय माना और बनाया जा रहा है। शालीनी माथुर ने मुक्तिबोध की इस बात की तस्दीक ही की है।कि जो है उसे से बेहतर चाहिये। इस देश को एक मेहतर चाहिये… औ र अब एक समझ दार औरत के हाथ में असली झाड़ू आयी है…गन्द्दगी बहुत हो गयी है …

  • किसी लेखिका की कृति पर बात करते हुए उसे तवायफ, नाचनेवाली, देह व्यापार करनेवाली कहना यदि अशालीनता, फूहड़पन नहीं है तो यह एक शालीन लेख है। जो आलोचक दूसरों को भाषा और सरोकार की तमीज सिखा रहा है क्या उसे खुद आराजक हो जाने की छूट है? कहानी के सन्दर्भ और कथानक से विलगा कर किसी पंक्ति विशेष को कोट करने का यह आलोचकीय विवेक सनसनी बटोरने का माध्यम भर है। कहानी के facts को tamper करके कहानी को उद्धृत करने का यह प्रयास घोर निंदनीय है। साहित्य और पोर्न का अंतर समझनेवाली शालिनी माथुर बेबाकी और बदतमीजी के अंतर को कब समझेंगी? यह लेख अपनी स्थापनाओं में घोर मर्दवादी है। गीताश्री की किताब के कवर पर टांगों की तस्वीर शालिनी माथुर को नागवार गुजरती है। अपने लेख के साथ छपी तस्वीर पर उनकी क्या राय है?

  • This article is a loathsome piece of filth. incredibly insensitive disgusting and insulting . Shalini Mathur has no manners this way of writing is actually expression of her own needs and values her misson disgracing the brilliant autors won’t happen anytime anyhow, they will keep on achieving their achievements, accomplishments and success will continue. The value and worth of the pretty fabulous autors doesn’t decrease based on Shalini Mathur’s inability to see the essence of their work and their worth, it’s your loss Shalini Mathur not their. Remember Shalini Mathur your cheap and nasty attempt to get attention wont get you anywhere..dont get out of balance, it’s such wasting of time..you seem to count others blessings instead of you own..your opinion seems to be a confession of your character, what you critize we celebrate..we are very fond of the autors they are adorable , fascinating and they have countless fans too. Just remember.. your today’s drama is tomorrow’s bin liner.

  • अभी लेख पर मेरी प्रतिक्रिया के ज़वाब में शीलेश जी की प्रतिक्रिया पढ़ी। मेने लेख को फिर से पढ़ा
    लेखिका ने किसी भी लेखिका को तवायफ नहीं कहा है। .एक सार्थक प्रतिरोध को खारिज करने की कोशिश नहीं
    होना चाहिये… सही बात तो ये है कि जो नारी विमर्श भूमंडलीकरण के बाद आया ,वो सेक्स मुक्ति के सहारे से
    अंततः बाज़ार के ही अधीन ही चलता रहां। हमारी सृजनकर्मी लेखिकाएं भी इस की ठीक से शिनाख्त
    नहीं कर पायी और वे विच्छिन रूप से इधर -उधर छपे-लिखे के आधार पर अपनी रचनात्मकता आगे
    बढ़ाती रही। और यदि लेखिकाएं शालिनी के लेख का आधिकारिक समीक्षा ही नहीं मानती तो उनको इसका
    नोटिस ही नही लेना चाहिये…

  • After reading the most ridiculous article of Shalini Mathur I felt shame and disgust throughout the article, any one can easily filter out her problem she reveal what she lacks. It’s stunning, her excessive flowing desire to write only vulgar spill over actually she focussed on what she enjoyes what fascinates her she put all her energy into it. A competent and good person is incapable of such silly spiteful thing anyway it’s a symptom of neurotic insecurity. I really sympathize with her and my advice not to waste time and creat an illusion that the authors are going to be affected with all these nonsence. They are so good that you can’t ignore them, behind every successful person there are a pack of haters! I am sure the authors are going to give Shalini Mathur many more reasons to hate them, we know jealousy is the tribute mediocrity pays to genius.

  • वाह! क्या शानदार तर्क दिए जा रहे हैं। यदि किसी रचना में कोइ बेडरूम दृश्य लिखा जाय तो सारे ज़माने को यह हक़ हो जाता है कि रचनाकार के बेडरूम में साधिकार झांक सके। यह समष्टि का खाप पंचायती न्याय है। घोर सामंती मानसिकता है। काल्पनिक रचनाओं में किसी का व्यक्तिगत अपमान नहीं हो सकता। क्या सिर्फ इसलिए की कोई कुछ ऐसा लिख रहा है जो किसी को या कुछ लोगों को पसंद नहीं तो उन्हें हक़ मिल जाता है को वे उसकी निजता में दखल दें? किस तालिबानी समाज में हैं हम? और ये कुछ लोग जो खुद को नैतिक चरित्र का पञ्च मान रहे हैं ये कौन है ? क्या इन लोगों ने अपना सारा ब्लैक एंड व्हाईट घोषित कर दिया है? किस तथ्य की बात की जा रही है यहाँ? समीक्षक ये साबित करे कि ये लेखिकाएं सम्पादकों के इशारे पर लिखती है! मुंह उठा कर इलज़ाम लगा देने से ही हो गया सब सबित?दूसरे अगर सम्पादकों के इशारे पर लिखते हैं तो वे किन सम्पादकों के इशारे पर लिख रही हैं? झाड़ू चलनेवाले इस बात की भी फिक्र करें की एक दिन ये झाड़ू उनके मुंह पर भो फिर सकता है। सब केजरीवाल की तरह सेल्फ proclaimed honest और moral बने फिर रहे हैं!

  • जब द्रौपदी की साड़ी उतारी जा रही थी, पूरा कौरवों का समाज तमासा देख रहा था। इस सामंती समाज की प्रवृति यही है कि जब किसी स्त्री का अपमान होता है तो सब मजा लेने तमाशाई बन कर जुट जाते है। हाल में आसाम में जब कुछ नैतिक गुंडों ने बीच सड़क एक लड़की के कपडे इस लिए उतर लिए क्योंकि वह डिस्को गयी थी तो उन लोगों का साथ देने और उस लड़की को सजा देने एक पूरी भीड़ उनके साथ उतर आई थी सडक पर। यही है नैतिकता और मर्यादा का हाल इस पाखंडी देश में! औरतों को विवस्त्र करके उन्हें मर्यादा का पाठ पढाओ! अज बंगाल में भी एक ‘अनैतिक’ स्त्री को नैतिकता का सबक सिखाने खाप पंचायत के आदेश पर तीस मर्दों ने उसके साथ बलात्कार किया। शालिनी माथुर का नंगी तस्वीरों से सजे लेख में नैतिकता का यही खाप पंचायती रूप दीखता है।

  • वाह! क्या शानदार तर्क दिए जा रहे हैं। यदि किसी रचना में कोइ बेडरूम दृश्य लिखा जाsaurabhय तो सारे ज़माने को यह हक़ हो जाता है कि रचनाकार के बेडरूम में साधिकार झांक सके। यह समष्टि का खाप पंचायती न्याय है। घोर सामंती मानसिकता है। काल्पनिक रचनाओं में किसी का व्यक्तिगत अपमान नहीं हो सकता। क्या सिर्फ इसलिए की कोई कुछ ऐसा लिख रहा है जो किसी को या कुछ लोगों को पसंद नहीं तो उन्हें हक़ मिल जाता है को वे उसकी निजता में दखल दें? किस तालिबानी समाज में हैं हम? और ये कुछ लोग जो खुद को नैतिक चरित्र का पञ्च मान रहे हैं ये कौन है ? क्या इन लोगों ने अपना सारा ब्लैक एंड व्हाईट घोषित कर दिया है? किस तथ्य की बात की जा रही है यहाँ? समीक्षक ये साबित करे कि ये लेखिकाएं सम्पादकों के इशारे पर लिखती है! मुंह उठा कर इलज़ाम लगा देने से ही हो गया सब सबित?दूसरे अगर सम्पादकों के इशारे पर लिखते हैं तो वे किन सम्पादकों के इशारे पर लिख रही हैं? झाड़ू चलनेवाले इस बात की भी फिक्र करें की एक दिन ये झाड़ू उनके मुंह पर भो फिर सकता है। सब केजरीवाल की तरह सेल्फ proclaimed honest और moral बने फिर रहे हैं!

  • Welcome to Shalini Mathur’s articl of disgust! I remember the lovely proverb ” the dogs bark but the caravan passes on “

  • !” Article of disgust “

  • Namaskar. Shalini ji ke is lekh par mujhe filhal is comment men kuchh nahin kahna. is par charcha fir kabhi. parantu unhone mujhe 75-varsheeya premchand sahajwala kaha hai jo galat hai. mera janm 18 Dec 1945 ko hua so main to abhi 70 ka bhi nahin hua. Behtar hota ki lekhika ya t fb se ya mujhse meree sahee umr jaan letee.

  • Fair criticism offers opportunity to learn,to motivate to do better but this article of Shalini Mathur is only put down, attack, lies, no one deservs such onslaughts. There is a a huge difference between someone who’s critical and someone who’s a bully! Shalini Mathur seems to suffer from psychotic or manic episode. She should learn something about herself, and know her limits.It’s totally unacceptable.I highly agree with Purnima Prasun, Aditya.S and Sunita Mohan..you all are very right..very well said.

  • Gandegi faylane ki ada dekhe koi, bahut hi ghatiya lekh likha hai Shalini Mathur ne, tauba tauba, had se gujar gayi. Unhe pata hona chahiye ki kicher jo wo uchaali hain..khud hi gandi ho gayi… Wah! wah! wah! kya Shandar aur muhthor jawab diya hai ye behtareen logo ne ..Nilanjan Amritji, Purnima Prasunji, Suresh Mishraji, Rakesh Nayakji,Sunita Mohanji Madhuri Sharmaji..aap logo ko koti koti naman.

  • शालिनी माथुर के लेख की बड़ी चर्चा सुन रहा था। अब पढ़ पाया। यह एक बहुत सुन्दर सुचिंतित सुविचारित लेख है। इसने पिछले तीन दशक से विचारों पर पड़ी धूल को पोंछ दिया। आज पूरा हिन्दी संसार इसकी ध्वनि से गूंज रहा है। जिसने पढ़ा उसी ने सराहा। मुझे आपकी पत्रिका नहीं मिली फोटॉकोपी पढ़ पाया।
    इतना लम्बा लेख एक ही सांस में पढ़ लिया। मैं दावे से कह सकता हूँ कि यह एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का लेख है जिसमें लोकतंत्र में समकक्षता के सवाल की पड़ताल की गयी है। जहां तक गद्य की बात है ऐसा गद्य दुर्लभ है। उत्कृष्ट विचार और प्रांजल गद्य। विषय इतना गंभीर पर ऐसी भाषा ऐसी कि कई जगह मुस्कराये बिना न रह सका। विचारशील व्यक्तित्व और निर्भीक लेखनी को प्रणाम।बेहतरीन।

  • पहिले तो लगा था की तहलका नाम कि पत्रिका ने कोई बौद्धिक विमर्श चलाया है। मैने भी भाग प्रतिभागी की तरह दो एक टिप्पणिया भी दी, लेकिन अब तो एक तरह कि प्रायोजित गाली-गलोज चल गयी है। असहमति को कुचलने का बर्बर तरीका साहित्य की दुनिया में भी चल रहा है — ।असहमत को पागल ही क़रार दो… उसको मानसिक रोगी घोषित कर दो…। अंतर्विरोध तो यह कि जो रचनात्मकता साफ़ तौर पर रचना में विकृति को आस्वाद में ढालने की चतुराई बरती जा रही है है वोह सम्माननीय और शिरोधार्य है … और जो उस को जस का तस रख कर पाठकों को बता रही है।वो पागल और मानसिक रोगी। । नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में हिंदी सहित कि इसी प्रवृति को देख कर ठीक ही भर्त्सना कि थी

    जानता हूँ अब नेहरू जी कि यहाँ लानत मलामत होना शु रू हो जायेगी।

  • Pretty dull..dull.. dull.. is the article of Shalini Mathur.It’s utter stupidity, ridiculous and unrealistic. A massive out pouring of disgust and outrage.What a shame!

  • कई दिनों बाद आज फिर इस लेख को पढ़ा। प्रतिक्रियाओं को देख कर विस्मित हूँ. पहले आई प्रतिक्रियाओं के बाद अचानक नहले पर दहला की तर्ज़ पर उन प्रतिक्रियाओं के विरुद्ध एक साथ ऐसी प्रतिक्रियाएं आने लगीं वे भी इतनी अभद्र भाषा में की गंभीर पाठक प्रतिक्रिया देना बंद ही कर दे। ये खोटे सिक्कों का करतब है।सट्टेबाज़ी की अर्थव्यवस्था में हिन्दी के विचार का बाज़ार भी खोटे सिक्कों से भर गया है।

    वैसे शालिनी को इस बात की तसल्ली होनी चाहिये की जिसे समीक्षक ही नहीं माना जा रहा था उसकी एक ही समीक्षा से इन तमाम महिमा मंडित कृतियों के ढहने का खतरा पैदा हो गया और हिन्दी में दंगे और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो गयी। इस बदहवासी ने साहित्य के गंभीर अध्येता को आश्वस्त ही किया है कि जिन कृतियों का स्थापत्य कमज़ोर था वे मौसम की पहली बारिश में ढह गईं । यह कृतित्व चट्टानों का नहीं मिट्टी का था, कच्चा।

    पाठकों ने इस लेख का बहुत स्वागत किया है। शालिनी माथुर को पाठकों के नीर क्षीर विवेक का भरोसा करना चाहिये। । सम्पादकों ने अखबरों पत्रिकाओं में इसे तहलका से साभार ले कर आदर पूर्वक छापा है। इतने अच्छे अंक के गंभीर लेख पर ऐसी अभद्र गाली गलौज की भाषा में दी गई कच्ची समझ की कच्ची टिप्पणिओं की एक साथ आई बाढ़ देख कर थोडा दुख हुआ। । बस यही कहा जा सकता है कि जिन्हें कीचड में लोटने का शौक है उन्हें कीचड तय्यार करके उसमें स्नान करने का आनंद लेने दिया जाये।

  • साधना जी की टिप्पणी पढ़कर लगा कि
    यहाँ किसी भी किस्म की गम्भीर सहमति या असहमति
    व्यक्त करने वाले के लिए यह जगह नहीं रह गयी है , इसलिए
    जो भी ऐसी इच्छा के साथ यहाँ आना चाहता है। उसे आना ही नहीं चाहिए। ।
    मेरा निवेदन है कि वह रूक जाए। । क्योंकि तुरंत उसे अभद्र भाषा में
    कोई बात कही जायेगी। ।य फिर से शालिनी को उल्टा-सुलटा कहा जाएगा
    साधना जी ने ठीक कहा है कि अब कीचड स्नान ऐसा रमी रहने वाली
    ज़मात जमा हो रही। … वहाँ वैचारिक सुगंध के उठने की कोई उम्मीद शेष नहीं
    रही है। ।

  • इस विस्तृत आलेख में सच को बयान किया गया है किन्तु आधे सच को और वह भी जैसे जान बूझकर प्रगतिशीलता और जनवाद को बदनाम करने के उद्देश्य से। जनवाद में अनेक तरह के लोग शामिल हैं केवल ये ही नहीं , जिनकी गिनती यहाँ कराई गयी है। जनवादी वह है जो जनतंत्र को सही मायने में लाने की भूमिका में रहता है। जो जनवादी नहीं होता वह निरंकुशता के लिए किसी न किसी बहाने से जमीन तौयार करता रहता है।
    पवित्रता का बोध कराना सही है किन्तु उसकी आड़ में किसी तरह के शोषण-उत्पीड़न के लिए रास्ता बनाना पवित्रता का क्षद्म होगा। और यदि वह जिंदगी के सच पर आवरण डालता है तो वह पवित्रता नहीं कलुषता है। ताली दोनों हाथों से बजा करती है। यह सच है कि पितृसत्ता वाले समाजों में हमेशा स्त्री-शरीर का शोषण -उत्पीड़न सबसे ज्यादा हुआ है और आज भी हो रहा है। किन्तु आज स्थितियों में परिवर्तन तेजी से हुआ है। उच्च और उच्चमध्य वर्ग की स्त्रियां आज पहले समयों की तुलना में ज्यादा मुक्त हैं , वे सोचती-विचारती और अपनी आकांक्षाओं को व्यक्त भी कर रही हैं। वे अपने मन के भीतर के यथार्थ को व्यक्त करने का साहस भी जुटा रही हैं। यह उस पितृ-सत्ता का प्रतिरोध भी है ,जिसकी जकड़बंदी में वे रहती आई हैं। जैसे स्त्री शरीर बेचने की परिस्थितियां ,व्यवस्था ने बनाई हैं वैसे ही आज के घनघोर बाज़ारवाद के युग में पुरुष भी अपने शरीर को बेचने लगा है और वर्ग-विशेष की स्त्रियां अपनी कामना-पूर्ति के लिए उसे खरीद रही हैं । इसमें बहुत सी विकृतियां भी आती हैं। लेकिन जब कोई समाज बंधनों को तोड़ता हुआ मुक्ति-पथ पर चलेगा तो कई तरह के विचलन भी होंगे। जब नदी में बाढ़ आती है तो वह कगारों को तोड़ती चली जाती है।
    आज सरप्लस पूंजी का जो अकूत खजाना एक वर्ग-विशेष के पास इकट्ठा होता जा रहा है वह भी अपने लिए यौन-क्रिया को बाज़ार की तरह बनाता जाता है। वह बिकने और खरीदने की वस्तु बनती चली जाती है।इस प्रक्रिया में स्त्री ही नहीं , पुरुष भी वस्तु बनाता जाता है। यह मानव स्वभाव की गति-दुर्गति दोनों है। यह मार्क्सवाद नहीं फ्रायडवाद है। मार्क्सवाद में स्त्री भोग की वस्तु नहीं होती , वह आज जैसे पूंजी के बाज़ार में होती है। मार्क्सवाद में स्त्री का दर्ज़ा पुरुष की बराबरी का है। वहाँ किसी तरह की उंच-नीच नहीं। यौन वहाँ एक यथार्थ और प्राकृतिक क्रिया है, जिसकी जितनी जरूरत पुरुष को है ,उतनी ही स्त्री को भी। प्रकृति ने संतुलन पैदा किया है और इसके स्वरुप को द्वंद्वात्मक बनाया है। बहरहाल , संदर्भित कहानियों की व्याख्या-विश्लेषण एक पक्ष को बहुत उभारकर किया गया है , जिससे संतुलन गड़बड़ा गया है।

  • बड़े दिनों से चर्चा सुन रही थी पत्रिका तो नहीं मिली नेट पर लेख पढ़ा। शालिनी जी आलोचना के क्षेत्र में एक बिल्कुल नवीन ढंग ले कर आई हैं। कविता पर उनका लेख पढ़ा था। यह लेख तो गज़ब का है।बहुत बारीकी से देख पढ़ कर लिखा है। लेख वास्तव में सामाजिक सरोकारों के कारण ही लिखा गया है।

    देखने की बात यह है कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले गरीब देश में स्त्री लेखन के नाम पर ऐसी प्रवृत्तियाँ प्रोत्साहित की जा रही हैं जिन का समाज से कोई सम्बंध ही नहीं। समाज में ऐसा होता होगा जैसा जयश्री जी ने लिखा है मगर क्या वह जनवादी है। यह उद्धरण बताते हैं कि यह कहानियाँ मसाला फिल्मों की तरह हैं।

    आत्ममुग्धता के कारण जयश्री रॉय ने इसे अपने विषय में लिखा लेख मान कर अपनी कृत्रिम भाषा में प्रतिवाद लिखा है . स्पष्ट है वे लेख को समझ ही नहीं सकीं. पूरे समकालीन परिदृश्य पर लिखे गये लेख पर विचारहीन बात कह कर उन्होंने प्रकट कर दिया की वे समाज से कट कर झूठी दुनियाँ में रह रही हैं। प्रतिवाद में लेखिका के स्त्री होने पर भी बहुत भद्दी बात कही गयी है।शालिनी जी के लेखन को पाठक कई साल से पढ़ रहे हैं , मंचों से उन्हें सुन रहे हैं और उनसे फोन पर बात करते रहे हैं।२५-३० रचनाओं में से २-३ आलोच्य रचनाएँ यदि जयश्री जी की उद्धृत हो गईं तो क्या हो गया। छद्म जनवादी ही नहीं छद्म लेखिकाएं भी हैं। शीर्षक बिल्कुल सटीक है। यह खेल समाप्त तो होना ही था।स्त्री लेखन के नाम पर हो रहा लेखन स्त्रीवादी तो नहीं है।

    बहरहाल तहलका में छपे शालिनी जी के लेख ने तहलका ही नहीं मचाया कीचड़ साफ करने की शुरुआत कर दी। आलोचना का इतिहास तहलका में छपे शालिनी माथुर के लेख की चर्चा के बिना नहीं लिखा जा सकेगा।

    वैशाली सारस्वत

  • This essay is piece of crap as usual by Shalimi Mathur

  • मुझे नहीं लगता कि मैंने इतना विचारोत्तेजक लेख पिछले एक दशक से कहीं पढ़ा होगा. स्त्री लेखन के नाम पर चल रहे खेला का पर्दफाश करता हुआ बहुत गंभीर लेख है.
    लेख छद्म जनवाद पर भी तंज करता है. यह हमारे समय का विचार योग्य विषय है. देख् कर बहुत अच्छा लगा कि सम्पाकीय में संपादक ने भी इसका अलग से उल्लेख किया. लेखिका बधाई की पात्र हैं.

  • उक्त लेख की चर्चा दक्षिण में भी हो रही थी। कबसे पढने का मन था , आज मौका मिला, लेख तथा कॉमेंटेस् दोनों पढें। जो लिख गया वह आई ओपनर लगा। अब संभवतः स्त्री लेखन की ओर देखने मे एक नया एंगेल भी जूड जाय। उक्त लेख सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर ही लिखा गया हो। इसलिए अधिक उपयुक्त लगा।

  • very good. congratulation for your article.

  • stree vimarsh ka bajar ab kafi ashleel ho chala hai….

  • शालिनी माथुर जी धन्यवाद
    आपकी समीक्षा पढ कर आपकी नैतिक जिम्मेदारी के प्रति सजगता का एहसास स्वयं ही हो जाता है। समीक्षा में आये लेखकों का नैतिक पतन इस स्तर तक हो गया कि इनके साहित्यिक लेखों को समाज का दर्पण न कहकर अनैतिक कृत्यों का दर्पण कहा जा सकता है। ऐसे लेखक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में समाज को घोर नैतिक पतन की ओर ले जा रहे हैं।

  • शालिनी माथुर का बहुचर्चित लेख और उसपर जयश्री रॉय का प्रतिवाद पढ़ा.स्वयम अधिक कहे बिना मैं वृद्ध परमानंद कि समीक्षा पेश कर रहा हूँ. इस से पुष्ट होता है कि यह देह के पार की कहानी है या देह वाद की. रस्मसाते नितंबों और जाँघों को एक मात्र गन्तव्य बताने वालों को आनंद देने वाली कहानी के प्रशंसक कम नहीं हैं.
    ´ युवा कवि-कथाकार जयश्री राय की दुनिया प्रेम की, देह-राग की, नींद की, रात की, रतजगे की दुनिया है। उनकी कथा भाषा निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, गीतांजलि श्री के आसपास है। ‘औरत जो एक नदी है’ जैसे एक लम्बी कविता है। जयश्री कहती हैं : ‘ये असहाय सी औरतें दर असल कितनी सक्षम होती हैं-मर्दों को आंकठ लेती हैं, स्वयं में उतरने देती है। …पुरुष उसकी देह की कई इंचें नापकर विजय उत्सव मना लेता है। प्रेम और किसे कहते हैं-मैं उसके गुदाज सीने में चेहरा धंसा देता-’इन वादियों में मेरा द्घर है-नर्म मुलायम कबूतरों-सी हरारत भरी और ये तुम्हारी जांद्घें-मेरे एक मात्रा गंतव्य की ओर जाने वाली उजली चिकनी सड़कें।’ मैं तुम पर पूरी तरह से खत्म हो जाना चाहती हूं, तुम मुझे लेते क्यों नहीं।’
    जयश्री ‘औरत जो नदी है’-में कहती हैं-’हर मर्द मानो मछली था, और वह पानी थी! नील तिलिस्म-भरा जाल थी-खुद में सुलझी, दूसरों को बेतरह उलझाती’। वर्जनाओं को पीछे छोड़कर वे ‘उत्तर समय’ तक जा पहुंची हैं। ये कहानियां आत्म और देह के तिलिस्म में प्रवेश करती हैं और वर्जनामुक्त स्त्राी-पुरुष संबंधों को उजागर करती हैं। जयश्री राय का जीवट सराहनीय है, जिससे ‘औरत जो नदी है’ सरीखी कहानियां संभव हुईं। भाषा ऐसी ऐन्द्रिक-’देहलता में उत्तेजना के सुर्ख गुलाब उगाए, रसमसाते नितंबों में इंगितों का माताल ज्वार उठाये वह अपनी राह चलती रही।’

    परमानंद श्रीवास्तव बी-१०, आवास विकास कॉलोनी, सूरजकुंड, गोरखपुर
    अनकही> जयश्री राय शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली मूल्य : १५० रुपये

    विनीत

  • मर्यादा के साथ शिवत्व की कामना ‘सुरसरि सम सुब कँह हित होई’ सद्साहित्य का मूल उद्देश्य होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की समाज के भविष्य के दिशा निर्धारण मे भूमिका के बीच एक सामंजस्य अवश्य होना चाहिये ।
    डॉ अनिल मिश्र, लखनऊ

  • pooraa padha………… stabdh hoon

  • आपने ने गज़ब विश्लेषण किया है देह का और पुरुष का अदभुत…

  • Garm roti ki mahak pagal bana deti mujhe,tthootth me bhi sex Ka ahsas leker kya karen—-(gondvi)

  • ye to pata tha ki angreji racnayo me aise non-vej ansh hote hai ,lekin aaj to pata chala ki hindi sahitya me bhi aise racnayo ko jagah hi nahi balki purushkar bhi mil rahe hai ,Aise me to Jo thoda bahut hindi bhashiyo me Sanskriti (lok-lajja) bachi hai vah bhi gai samjho /

  • LEKHAK NE BAHUT KUCHH SACH DIKHAYA HAI

    RAJNITI KA BHI……..

  • great… excellent … wow….

    no words………..aapki himmat ko salaam,,

    kushalchandra raigar advocate
    pali rajasthan india mobile 9414244616

  • सही कहा शालिनी आज का नारीवाद देह से शुरू होकर देह पर ख़त्म हो रहा है।

  • बहुत उम्दा क्या कहने ….काफी दिनों बाद कोई लेख पूरा पढ़ा बिना रुके ।

  • अच्छा लेख है जो लोगोको वास्तविक स्थितिको अवगत करेगा । और जीवन में आजतलक जो बदलाव आये है उनको काफी अछि तरह समजने के लिए कारगर साबित होगा ।