मर्ज कुछ इलाज कुछ

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बीते महीने के पहले पखवाड़े झारखंड की राजधानी रांची से 125 किलोमीटर दूर लातेहार जिले में माओवादियों ने तीन ग्रामीणों समेत 10 जवानों को मार डाला. यह घटना प्रमंडल जोन के जिस इलाके में घटी वह घने जंगलों के फैलाव वाला दुरूह इलाका है जहां गरीबी-बेरोजगारी चरम पर है. पिछले कुछ समय में माओवादियों ने यहां कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है. इस बार माओवादियों ने न सिर्फ पुलिस को निशाने पर लिया बल्कि ग्रामीणों को भी उड़ाया और एक पुलिसकर्मी के शव को पेट से चीरकर उसमें बम लगा दिया. फिर महीना खत्म होते-होते 28 जनवरी को उन्होंने लातेहार जिले के ही पल्हैया गांव में दिन दहाड़े हथियार लूटने की कोशिश की. हथियारों से लैस करीब 60 माओवादियों का इरादा भाजपा विधायक हरिकृष्ण सिंह और उनके अंगरक्षकों से हथियार लूटने का था, लेकिन विधायक के सही समय पर वहां से निकल जाने के चलते वे कामयाब नहीं हो सके. 20 दिन के अंदर एक ही इलाके में हुई दो घटनाएं बताती हैं कि माओवादियों के मन में पुलिस का खौफ नहीं है और वे उसकी चेतावनियों को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे.

अब सवाल यह है कि झारखंड में माओवादी क्यों पुलिस से बेखौफ हैं. पुलिस क्यों पूरी तैयारी के बाद भी लातेहार में उनसे मात खा गई? झारखंड के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ कहते हैं, ‘माओवादियों को बाहर से समर्थन मिल रहा है, इसलिए वे मजबूत हो रहे हैं और उनके पास अत्याधुनिक हथियार पहुंच रहे हैं.’

हो सकता है रथ सही कह रहे हों, लेकिन यह भी सच है कि माओवादियों को जितनी मजबूती बाहरी समर्थन से मिल रही है, उतनी ही पुलिस की रणनीतिक चूक से भी. पहला सवाल तो यही है कि यदि माओवादी अत्याधुनिक हथियारों से मजबूत होकर पुलिस से मोर्चा लेने को तैयार बैठे हैं तो इसकी सूचना पुलिस को पहले क्यों नहीं मिल पाती. आखिर माओवादियों की सूचनाएं जुटाने के लिए तो पुलिस ने अपने खुफिया विभाग के पदाधिकारियों के अलावा पूरे राज्य में करीब 3,500 से ज्यादा विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त कर रखे हैं. राज्य के पूर्व सुरक्षा सलाहकार और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी डीएन गौतम कहते हैं, ‘कई बार सूचनाएं मिल भी जाती हैं तो वक्त रहते कदम नहीं उठाया जाता, क्योंकि पुलिस में ऊपरी स्तर पर संवादहीनता ज्यादा है.’

खुफिया तंत्र की चूक और संवादहीनता का फायदा माओवादी उठाते हैं लेकिन कुछ और वजहें भी साफ दिखती हैं जो माओवादियों को दुस्साहसी बना रही हैं. दरअसल झारखंड में माओवादियों से पार पाने के लिए पुलिस अक्सर मर्ज कुछ, इलाज कुछ की तर्ज पर चलती दिखती है. हाल का ही उदाहरण लें. दस जवानों-ग्रामीणों के मारे जाने के तुरंत बाद समीक्षा बैठक हुई. दो-तीन दिन बाद ही रांची में जर्मन शेपर्ड कुत्तों की ट्रेनिंग शुरू हो गई. कहा गया कि ये कुत्ते बम तक पहुंचेंगे, माओवादियों तक पहुंचेंगे. यह सच है कि माओवादियों से लड़ने के लिए और पुलिस को सहयोग करने के लिए खुफिया व खोजी कुत्तों की दरकार है, लेकिन सच यह भी है कि उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए उसके पास ड्राइवर नहीं हैं.

पुलिस में ऊपर के स्तर पर संवाद, समन्वय व सहयोग का अभाव राज्य में माओवादियों को भारी पड़ने का मौका दे रहा है

उल्लेखनीय है कि पिछले 12 साल में राज्य में 4,100 से ज्यादा नक्सली घटनाएं घटी हैं. इन घटनाओं में 417 पुलिसवाले शहीद हुए हैं, जबकि कुल 1,076 लोगों की जान गई है. राज्य में 17 उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में करीब 2700 नक्सली हैं. पिछले कुछ समय की बात करें तो तीन दिसंबर, 2011 को लोकसभा सांसद इंदर सिंह नामधारी के काफिले पर लातेहार के ही गारू इलाके में माओवादियों ने हमला किया था. नामधारी तो बच गए थे लेकिन 11 जवानों को जान गंवानी पड़ी थी. कुछ दिनों बाद जनवरी, 2012 में गढ़वा जिले के भंडरिया में माओवादियों ने उतने ही जवानों को घेरकर मार डाला था, एक बीडीओ को जिंदा जला दिया था और पुलिस के सारे हथियार भी अपने कब्जे में कर लिए थे. लातेहार में ही चार मार्च को जब जवानों की रसद पहुंचाने के लिए पुलिस हेलिकॉप्टर पहुंचा तो माओवादियों ने उस पर भी गोलीबारी की थी. इन घटनाओं के जिक्र का आशय यह है कि पलामू के अलग-अलग हिस्से में माओवादी इतनी बड़ी घटनाओं को अंजाम देते रहे लेकिन पुलिस की तैयारी उस स्तर पर नहीं हो सकी.

अब भी जिस ढर्रे पर काम हो रहा है उससे खास उम्मीदें नहीं जगतीं. पुलिस ने जब इस बार की घटना के बाद जर्मन शेपर्ड कुत्तों की ट्रेनिंग शुरू करवाई तो सवाल उठा कि कुत्ते गंतव्य का पता तो पुलिसवालों को बता देंगे लेकिन वहां तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित ड्राइवरों की राज्य में जो कमी है उसका क्या होगा. पुलिस सूत्र बताते हैं कि झारखंड में एनएसजी यानी नेशनल सिक्योरिटी गार्ड से प्रशिक्षण प्राप्त ड्राइवरों की संख्या 10 से भी कम है. इनमें से एक तो हमेशा मुख्यमंत्री के काफिले में ही शामिल रहता है. शेष की ड्यूटी कहां लगाई गई है, यह बताने को कोई तैयार नहीं होता. झारखंड के 24 जिलों में से 18 जिले नक्सल प्रभावित हैं और यहां तकरीबन 500 प्रशिक्षित ड्राइवरों की दरकार है लेकिन ड्राइवरों की कमी झेल रहा राज्य अपने चालकों को एनएसजी कैंप में ट्रेनिंग के लिए नहीं भेज पाता. एनएसजी का ट्रेनिंग कैंप हरियाणा के मानेसर में है और वहां ड्राइवरों को तीन सप्ताह का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. लेकिन राज्य अपने यहां के ड्राइवरों को तीन सप्ताह के प्रशिक्षण के लिए भेजने की स्थिति में नहीं है. प्रशिक्षण आईजी प्रशांत कुमार का कहना है, ‘ड्राइवरों को एनएसजी ट्रेनिंग सेंटर, मानेसर के मानदंडों के अनुसार उनके सहयोग से राज्य में ही कैसे प्रशिक्षण दिया जाए, इस पर विचार चल रहा है.’

समस्या सिर्फ ड्राइवरों के प्रशिक्षण की नहीं है.  लातेहार में हुई मुठभेड़ के दौरान यह बात उभरी कि जो जवान माओवादियों के खिलाफ अभियान में गए थे वे सुरक्षा उपकरणों से लैस नहीं थे. उनके पास बुलेट प्रूफ जैकेट और हेडगेयर (इससे सिर चोट से बचा रहता है) भी पर्याप्त संख्या में नहीं थे. पुलिस प्रवक्ता आईजी एसएन प्रधान कहते हैं कि इस वक्त राज्य में 40 हजार पुलिसकर्मी नक्सल विरोधी अभियान में अलग-अलग जगहों पर लगे हुए हैं, जबकि बुलेट प्रूफ जैकेट महज पांच हजार हैं. जानकारी के मुताबिक 2010 के बाद से बुलेट प्रूफ जैकेटों की खरीदारी राज्य में बंद है. जो जैकेट हैं, उनमें से अधिकतर एनआइजे थ्री श्रेणी के हैं  जो एके-47 की गोली और 7.62 कैलिबर की गोली को झेल सकने में सक्षम नहीं होते. इसका वजन भी आठ किलोग्राम तक होता है जिसे पहनकर लड़ना सुविधाजनक नहीं होता. इस बारे में बात करने पर आईजी प्रोवीजन आरके मलिक कहते हैं, ‘फंड तो है लेकिन ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) के गाइडलाइन नहीं मिलने के कारण खरीद नहीं हो पा रही.’

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एक मूल समस्या पुलिस बल की भारी कमी भी है. खुद राज्य के पुलिस महानिदेशक जीएस रथ कह चुके हैं कि राज्य में करीब 16 हजार पुलिसकर्मियों की कमी है. यह संख्या कांस्टेबल से लेकर आईपीएस अधिकारियों तक की है. राज्य में 35 आईपीएस अधिकारियों, चार हजार असिस्टेंट सब इंस्पेक्टरों, दो हजार सब इंस्पेक्टरों, उपाधीक्षकों और करीब 10 हजार कांस्टेबलों की कमी है.

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