मराठा आरक्षण की आग में झुलसता महाराष्ट्र

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अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है’ आम तौर पर जुलूसों और प्रदर्शनों में लगने वाला यह उद्घोष मराठा क्रांति मोर्चा के आंदोलन पर सटीक और प्रासंगिक बैठता है। मराठों को आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर पिछले दिनों समूचा महाराष्ट्र आंदोलित रहा। वैसे तो यह आंदोलन शांतिपूर्ण चल रहा था पर औरंगाबाद में एक युवक द्वारा गोदावरी नदी में छलांग लगाकर खुदकुशी करने के बाद मराठा आंदोलनकारी हिंसक हो गए और उन्होंने पूरे राज्य को हिंसा में झोंक दिया। राज्य की देवेंद्र फड़णवीस सरकार की चूलें हिल गईं। पूरे महाराष्ट्र बंद के बाद आखिर में राजधानी मुंबई, ठाणे और आसपास के इलाकों में बंद रखा गया। मराठा समाज ने लाखों की तादाद में जुलूस, मोर्चे निकाले। ये जुलूस यानी शांतिपूर्ण जन आंदोलन कैसा होता है, उसकी एक मिसाल था। इन 58 मोर्चों, जुलूसों ने दुनिया के सामने एक आदर्श स्थापित किया। आंदोलन के दूसरे चरण में मराठा क्रांति मोर्चा ने बंद का आह्वान किया था, मराठों का आक्रोश तो उबाल पर था ही पर फडणवीस सरकार के उदासीन रवैये के चलते वो और भड़क गया।

चुनाव के मद्देनजर भड़की आग

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 72 हजार सरकारी नौकरियों में मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा के बाद भी आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। 2019 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वहीं माना जा रहा है कि महाराष्ट्र में भी अगले साल चुनाव हो सकते हैं, ऐसे में भाजपा के लिए मराठा आंदोलन एक चुनौती बन गया है।

क्या है मराठों की मुय मांगें?

सरकारी नौकरियों के साथ ही कॉलेजों में आरक्षण मराठों की मुख्य मांग हैं। 2014 में एनसीपी-कांग्रेस की गठबंधन सरकार ने मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया था। उसके लिए पहली बार आर्थिक रूप से पिछड़ों की कम्युनिटी बनाई गई थी। उस कारण कुल आरक्षण 51 प्रतिशत से अधिक हो जाने से अदालत ने इस आरक्षण को रद्द कर दिया था।

कोर्ट रद्द न कर सके, ऐसा आरक्षण चाहिए

अदालत ने कहा था कि मराठों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता, जबकि मराठा चाहते हैं कि सरकार उन्हें ऐसा आरक्षण दे जिसे अदालत रद्द न कर सके। इस मामले में आखिरी फैसला न आए तब तक राज्य में होने वाली 72 हजार से अधिक भर्तियां रोक दी जाएं।

कुल आबादी में मराठों की संया 33 फीसदी

महाराष्ट्र की कुल आबादी में मराठों की तादाद 33 फीसदी है। यह समुदाय राज्य में होने वाले किसी भी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम है। 1960 में महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद से अब तक कुल 17 मुख्यमंत्रियों से 10 मुख्यमंत्री तो मराठा रहे हैं। इतना ही नहीं करीब आधे विधायक मराठा ही हैं। 288 सदस्यीय विधानसभा में 145 विधायक मराठा हैं। ये विधायक सभी प्रमुख दलों कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में हैं। महाराष्ट्र की करीब 50 शैक्षणिक संस्थाओं पर मराठों का नियंत्रण है।

राज्य की अर्थव्यवस्था पर मराठों का दबदबा

महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में शक्कर मिलों का बड़ा महत्व है। गुजरात में जैसे तेलिया राजा होते हैं वैसे ही महाराष्ट्र में ‘सुगर किंग।’ राज्य की 200 में से 168 शक्कर मिलों पर मराठों का आधिपत्य है। इसी तरह, 70 प्रतिशत सहकारी बंैक भी मराठों के नियंत्रण में है। अब तक मराठों का आरक्षण आंदोलन एकदम शांतिपूर्वक चल रहा था। वे विशाल रैलियां निकाल रहे थे। जबकि कोपर्डी रेप केस और अब एक युवक द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर आत्महत्या करने से यह आंदोलन उग्र और हिंसक हो गया है।

क्रांति दिवस यानि नौ अगस्त को तीसरा चरण शुरू करना भी तय हुआ है। मराठों के इस पूरे आंदोलन के पीछे मुख्य मांग आरक्षण की है और वह फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है। न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा है। भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रतिशत तय है, वह 50 प्रतिशत है। मराठा समाज की मांग 16 प्रतिशत है। यदि वह मंजूर होती है तो कुल आरक्षण 68 प्रतिशत हो जाएगा। अन्य पिछड़े वर्ग अर्थात ओबीसी को हासिल आरक्षण के साथ छेड़छाड़ न करते हुए मराठों का आरक्षण देना सरकार के लिए बेहद जटिल है। तमिलनाडु में जयललिता अपने मुख्यमंत्रित्व काल में आरक्षण को 69 प्रतिशत ले गई। वह आज भी जस की तस है, इसलिए महाराष्ट्र सरकार को भी मराठा आरक्षण मंजूर है।

सवाल, केवल आरक्षण का नहीं है, मराठा समाज मुख्य रूप से कृषक समाज है और कृषि के साथ ही डेयरी व अन्य पूरक कृषि उद्योग आज संकट में हैं। मराठा समाज का जीवन संघर्ष ऐसा बहुआयामी है। उसे गंभीरतापूर्वक समझने के लिए उदार मन ज़रूरी है, अन्यथा आत्महत्या करने वाले सर्वाधिक किसान मराठा समाज के हैं, यह कहने की नौबत मराठा आंदोलनकारियों पर नहीं आती। मराठा आंदोलनकारियों से शांति बनाये रखने की अपील करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 602 पाठ्यक्रमों के दो लाख छात्रों को शिक्षा शुल्क का 50 प्रतिशत वापस देने की बात कही है। वैसे ही प्रत्येक जिले में होने वाले छात्रावासों में से दो पूर्ण होने का भी उल्लेख किया है। युवा उद्यमियों को प्रोत्साहन देने के लिए अण्णा साहेब पाटील महामंडल के काम करने का उल्लेख मुख्यमंत्री ने किया है। मुख्यमंत्री ने मराठा समाज की अन्य मांगों पर सरकार के गंभीरतापूर्वक काम करने का आश्वासन भी दिया है पर मराठा क्रांति मोर्चा का कहना है कि एक मजबूत व्यवस्था बनाई जाए और इस व्यवस्था पर नजर रखने के लिए विधायक दबाव प्रशासन पर रखा जाए।

मुख्यमंत्री के बयान के बाद मराठा समाज के गणमान्य वरिष्ठों ने भी उस पर अत्यंत संतुलित व दूरदृष्टिपूर्ण प्रतिक्रिया दी। वे भी स्वागतयोग्य हैं। एनडी पाटील और न्यायमूर्ति बीएन देशमुख ने छत्रपति शिवाजी के वंशजों से आत्महत्या या जलसमाधि न करने की अपील करते हुए शांतिपूर्वक कानूनी लड़ाई लडऩे की बात कही। उन्होंने सरकार से भी अपील की कि वे आंदोलनकारियों की भावना समझें। उन्होंने यह भी कहा कि हिंसक आंदोलन से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उससे मूल एजेंडा एक तरफ रह जाता है और मूल मुद्दे बाजू में रह जाते हैं।

आंदोलन की बलि चढ़े 3 युवक

मराठा आरक्षण आंदोलन में अब तक कुल 3 युवक बलि चढ़ चुके हैं। औरंगाबाद की मुकुंदवाड़ी के प्रमोद पाटील (उम्र 31) ने रविवार, 29 जुलाई की रात्रि 9 और 10 के बीच रेल्वे के सामने छलांग लगाकर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली। प्रमोद पाटील ने रविवार को दोपहरढ़ाई बजे फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर अपने फैसले की जानकारी दे दी थी। उसने अपनी पोस्ट में लिखा कि चलो आज एक और मराठा जा रहा है…पर कुछ करिये मराठा आरक्षण के लिए…जय जीजाऊ…आपका प्रमोद पाटील। उसके बाद उसने पौने पांच बजे एक और पोस्ट की। यह पोस्ट उसने रेल पटरी पर सेल्फी लेते हुए डाली थी। उसमें लिखा था…’मराठा आरक्षण जान जाएगीÓ इस पोस्ट के बाद उसके मित्र परिवार सभी ने विनती की थी कि ‘भाऊ, ऐसा कुछ मत कर…प्लीज ऐसा कुछ मत करो…मुझे कॉल करो…आदि। इसके बाद उसने रात्रि 9 और 10 बजे के बीच रेल्वे के सामने छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।

मराठा आंदोलन के दौरान औरंगाबाद जिले में आत्महत्या यह तीसरा तीसरा मामला है। इसके पहले 23 जुलाई को काकासाहब शिंदे ने गोदावरी नदी में छलांग लगाकर जान दे दी थी। उसके दूसरे दिन जगन्नाथ सोनवणे ने जहर खाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया था। प्रमोद की खुदकुशी के बाद उसके परिजन आहत हैं। उसके माता पिता ने साफ कहा है कि जब तक मराठा आरक्षण के बारे में सरकार ठोस निर्णय नहीं लेती तब तक उसका शव नहीं लेंगे। मराठा आंदोलन में अब तक हुई तीन मौतों के कारण मराठा आंदोलनकारियों में बेहद गुस्सा है। सरकार के खिलाफ उनमें आक्रोश है और मराठा आरक्षण आंदोलन कब खत्म होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

बंद का ऐलान वापस

शिक्षा और नौकरी में आरक्षण की मांग कर रहे मराठा क्रांति मोर्चा के संयोजकों ने मुंबई बंद वापस की घोषणा करते हुए कहा कि पिछले दो सालों से मराठा समाज को झूठे आश्वासन देकर बहलाया जा रहा था जिसके चलते मूक (मौन) मोर्चा के बदले ठोक मोर्चा का रास्ता अपनाना पड़ा। आयोजकों ने सहयोगी संगठनों का आभार जताया और शांति बनाए रखने की अपील की। मुंबई, ठाणे और नवी मुंबई में बंद वापसी की घोषणा के बाद स्थिति सामान्य होने की ओर है।

हालांकि मराठा क्रांति मोर्चा ने महाराष्ट्र बंद के ऐलान के वक्त ही इसे हिंसक न होने देने की ताकीद दी थी लेकिन सोमवार को काका साहेब शिंदे नामक आंदोलनकारी के जलसमाधि की घटना के बाद इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया और वह राज्य भर में फैल गया।

पहली बार मराठा समाज का मोर्चा आक्रामक दिखाई दिया। हाइवे जाम कर दिया गया। आटो रिक्शा, बस, गाडिय़ों की तोड़ फोड़ की गई। आगजनी की घटनाएं हुईं। पुलिस पर पथराव किया गया, आंदोलनकारी और पुलिस आमने-सामने आ गए। सबसे ज्यादा परेशानी स्टुडेंट्स को हुई। सुबह-सुबह छात्र स्कूल, कॉलेज पहुंच गए नौ दस बजे से आंदोलनकारियों ने रोड़ जाम करना शुरू कर दिया था। शैक्षणिक संस्थान दुविधा में रहे और स्टुडेंटस के अभिभावकों को उन्हें वापस घर लाने में बड़ी दिक्कतें हुईं।

मराठा क्रांति मोर्चा के वीरेंद्र पवार ने कहा, ‘हम मराठा हैं, हमारा मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था। हमारा बंद कामयाब रहा। बच्चों और महिलाओं के सड़कों पर होने और बढ़ती हिंसा की वजह से हमें अपना बंद वापस लेना पड़ा है। हम भी सामान्य नौकरी पेशा हैं, हमें विश्वास था कि किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। हम पता लगाएंगे कि हिंसा कहां से शुरू हुई? असामाजिक तत्वों का समावेश हो सकता है इस हिंसा में।

संविधान में संशोधन से हो सकता है निराकरण: शरद पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को मराठों की पार्टी माना जाता है, उसका आधार भी मराठा ही हैं। इसी कारण वो महाराष्ट्र की चार प्रमुख पार्टियों—भाजपा, कांग्रेस और शिवसेना के मुकाबले खड़ी है। एनसीपी यानि राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो शरद पवार का कहना है कि भारतीय संविधान के विशेष अनुच्छेद में संशोधन से मराठा आरक्षण की मांग का हल निकल सकता है। शरद पवार ने कोल्हापुर में कहा कि महाराष्ट्र और केंद्र में भाजपा सत्ता में है, उन्हें संशोधन करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो भी अन्य विरोधी दलों के समर्थन की जिम्मेदारी मैं लेता हूं।

पवार ने कहा कि संविधान में संशोधन के कारण दूसरे राज्यों की जातियों को भी न्याय मिलेगा। यदि किसी ने सकल मराठा समाज के आंदोलन में फूट डालने की कोशिश की तो उसे कंकर जैसा बाहर निकाल फेंके। उन्होंने मराठा समाज को एकजुट रहने की सलाह देते हुए कहा कि इस बारे में उन्होंने देश के प्रमुख वकीलों से भी चर्चा की है। संविधान में संशोधन से ही इसका रास्ता निकल सकता है। उसके लिए लोकसभा में आवश्यक बहुमत लगेगा, जो मौजूदा सरकार के पास है।