मंदी से मांझा कारीगर उदास

आप जब बरेली के सीबीगंज से क़िले की ओर बढ़ेंगे, तो जीटी रोड के दोनों ओर कुछ लोगों को बड़ी तेज़ी में हाथ में कुछ रंग-बिरंगा सा लिए हुए एक रगड़ के साथ आगे बढ़ते हुए पाएँगे। वास्तव में ये मांझा कारीगर हैं। इनके हाथ में काँच (शीशे) के बुरादे, रंग तथा साबूदाने या चावल की लुगदी होती है। ये लुगदी अत्यंत खुरदरी होती है, जिसे धागे पर रगड़ते समय हाथ कट जाते हैं। जो धागा मांझा बनाने के काम में लिया जाता है, उसे सद्दी कहते हैं। ये एक प्रकार से कच्चा धागा होता है। वैसे तो सद्दी उस धागे को कहते हैं, जो पतंग को बड़ी ऊँचाई तक आकाश में ले जाने के लिए मांझे के बाद बाँधी जाती है। इससे हाथ नहीं कटते और यह मांझे से सस्ती मिलती है। चर्खी में 90 से 95 फ़ीसदी यही सद्दी होती है। हालाँकि इस सद्दी में मोम लगा होता है, ताकि उलझे नहीं एवं आसानी से ऊँगलियों से पास हो सके यानी सरकता रहे।

सीबीगंज से क़िले तक जीटी रोड के दोनों ओर इसी सद्दी से मांझा बनाते हैं, जिसमें काँच युक्त लुगदी की रगड़ के कारण मांझा बनाने वाले इन कारीगरों के हाथ घायल ही रहते हैं। पूरा दिन ये लोग इसी तरह 100-200 मीटर की दूरी पर लगी बल्लियों के चारों ओर दौड़ते रहते हैं। इन बल्लियों को थूनी कहते हैं। इन थूनियों की संख्या 50-60 से अधिक होगी तथा हर थूनी पर एक से तीन कारीगर तक लगे होते हैं। इसी प्रकार बाकरगंज के हुसैन बाग़ में दर्ज़नों मांझा कारीगर हाथों में लुगदी लेकर सद्दी में लपेटकर सद्दी को रगड़ देते हुए दौड़ते दिखायी देंगे। एक कारीगर ने बताया कि 15-20 साल पहले बरेली में 1,000 से 1,500 कारीगर मांझा बनाने का काम करते थे। अब तो आधे भी नहीं रहे।

मांझे के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध बरेली में मांझा बनाने का यह कार्य वैसे तो पूरे वर्ष चलता है; मगर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा मकर संक्रांति के आने से दो-तीन महीने पहले से इसमें तेज़ी आ जाती है। मगर चीन का जानलेवा तथा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से घातक मांझे की बाज़ार में भरमार होने से विश्व भर में प्रसिद्ध बरेली के मांझे की बिक्री पर विकट विपरीत प्रभाव पड़ा है। मगर बीते तीन वर्षों से मांझा बनाने वाले कुछ अन्य संकटों से जूझ रहे हैं।

चीनी मांझे ने किया निराश
बाकरगंज में मांझा मज़दूर कल्याण समिति के एक सदस्य ने बताया कि लगभग सात-आठ साल से उनके काम में लगातार मंदी आती जा रही है। इसकी सबसे बड़ा तथा पहला कारण बाज़ार में चीन के मांझे की आवक है। यह बात सब जानते हैं कि चीन का मांझा हर तरह से घटिया तथा नुक़सान पहुँचाने वाला होता है। मगर फिर भी अधिक लोग उसे ख़रीदते हैं, क्योंकि वो हमारे मांझे से सस्ता होता है। दुकानदारों को भी उसमें बचत अधिक है, सो वे भी उसे ही पहले तथा अधिक मात्रा में बेचने की कोशिश करते हैं। मगर वो मांझा पतंगबाज़ी में जल्दी कट जाता है, हाथ भी काट देता है। अगर किसी के गले में फँस जाए, तो जानलेवा साबित होता है। पहले बरेली में मांझे में फँसकर पक्षी नहीं मरते थे, मगर अब चीन का मांझा जबसे आया है, पक्षियों के मरने की घटनाएँ होने लगी हैं। दु:ख की बात यह है कि अब बरेली में भी चीन का मांझा धड़ल्ले से बिक रहा है। जिस बरेली का मांझा पूरे विश्व के लोग माँगते हैं, विदेशों में इस मांझे की विकट माँग रही है, उसी मांझे के शहर बरेली में आज दुकानदारों और सरकारों के निजी स्वार्थ के चलते धाक जमा ली है। मगर उन लोगों को सोचना चाहिए कि इससे शहर के आम लोगों को तो हानि हो ही रही है, हम कारीगरों का रोज़गार भी छिन रहा है। इससे किसी को क्या मिलेगा। यह तो कारीगरों के पेट पर लात मारना ही हुआ ना।

बरेली का बता बेच रहे चीनी मांझा
इस बातचीत के बीच एक कारीगर ने कहा कि भैया, आप बाज़ार में किसी मांझे की दुकान पर जाकर बरेली का मांझा माँगना, वो आपको चीन का मांझा पकड़ा देगा। अगर आपको जानकारी नहीं होगी, तो आप ठगे जाओगे। दुकानदार बरेली के मांझे के नाम पर ग्राहकों को चीन का मांझा बेच रहे हैं। हम लोग तथा मांझा मज़दूर कल्याण समिति इसका कई बार विरोध कर चुकी है, मगर कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि प्रशासन इस ओर कोई ध्यान ही नहीं देता। चीन का अधिकतर मांझा नाइलोन का होता है, जिसे और मजबूत करने के लिए वो लोग घातक पदार्थों का उपयोग करते हैं।