मंच पर लंपट

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इन दिनों देश और धर्म के लिए मुचैटा लेने वालों की भरमार हो गई है. यह वैसा बोलना नहीं है जैसा किसी लोकतांत्रिक समाज में होता है. यह गालियों और धमकियों से लदी भाषा है जो अपने से इतर नजरिया रखने वाले को थप्पड़ मारने के लिए मचल रही है. असहिष्णुता (जो एक नाकाफी शब्द है) के प्रश्न पर सबसे संयमित प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर देखने में आ रही हैं क्योंकि वहां सब कुछ ‘ऑन रिकॉर्ड’ है जिसके कारण कार्रवाई का वास्तविकता को छूता काल्पनिक खटका लगा रहता है. सड़कों और गलियों में परिदृश्य खौफनाक है क्योंकि वहां सब कुछ एक नितांत भिन्न शक्ति संतुलन से संचालित होता है जो कानून की पकड़ में नहीं आ पाता. अगर आ भी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि भारी भरकम मानक शब्दों के पीछे छिपे कानून बनाने और लागू करने वाले वही सड़क वाला ही खेल खेलने लगते हैं. इसे इस कदर साधा जा चुका है कि कानून भीतर से ताकतवरों के पक्ष में बदल चुका है जबकि बाहर से कमजोरों को न्याय का न्योता देता हुआ आकर्षक बना हुआ है.

उदाहरण के लिए मोहल्ले की पान की दुकान पर कोई देश के बनैले होते माहौल पर चिंता जताता है या गाय से पहले अपनी मां का ख्याल रखने पर जोर देता है तो जवाब में उसे हाथ-पैर तोड़ने की धमकी दी जाती है या पाकिस्तान चले जाने को कहा जाता है. वह अपमानित आदमी थाने जाकर एफआईआर दर्ज कराना चाहता है तभी धमकाने वाला गिरोह ठहाकों के बीच कहता है… आप भी हंसी मजाक की बात में थाना-पुलिस ले आए, क्या पुलिस हिंदू नहीं है और न भी हो तो क्या उखाड़ लेगी. क्या यह काफी सहिष्णुता नहीं है कि अब भी आपका मुंह पान खाने लायक बचा हुआ है?

इस लचीलेपन के साथ गालियों और धमकियों का घेरा हर दिन उस आदमी के गिर्द और कसता जाता है. यह लचीलापन लंपटता की खास पहचान है जो इन दिनों देशभक्ति के बहाने कोई पुराना हिसाब बराबर कर लेना चाहती है. धार्मिक और जातीय घृणा को पोसने वाला कोई भाजपाई मंत्री या सांसद जब किसी कानूनी फंसान वाले अपने बयान को मीडिया द्वारा तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाना बताता है तब भी इस लचक को उसकी आंखों में कंपकंपाता देखा जा सकता है. हाल के दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पांचजन्य को अपना मुखपत्र मानने से इंकार लंपटता का एक यादगार नमूना है.

लंपटता कांग्रेस के राज में भी भरपूर थी जिसके सर्वोच्च प्रतीक संजय गांधी बन कर उभरे. प्रधानमंत्री के बेटे के पास देश के विकास के लिए बीस सूत्री कार्यक्रम था और विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए लंपटों की फौज, जो उसके खानदान की बिरूदावली गाकर सत्ता से शक्ति और कानून से संरक्षण पाती थी. तब से इस मिलिशिया का निरंतर नवीनीकरण और विस्तार होता गया जिसका इस्तेमाल हर किस्म के दंगे प्रायोजित करने के लिए किया जाता रहा है. अब सत्ता की पार्टी भाजपा एक आदमी का चारणगान करते हुए पूछ रही है चौरासी में सिखों के संहार के वक्त सहिष्णुता कहां थी. खुद को न्यायसंगत ठहराने के लिए यही उसका सबसे ढीठ तर्क है जैसे कि मतदाताओं ने 2014 में मोदी को जनादेश उससे बड़े नरसंहार प्रायोजित करने और अपने से भिन्न विचार रखने वालों को ठिकाने लगाने के लिए ही दिया था.

कांग्रेस ने लंपटों को बढ़ावा अपने सामंती तासीर वाले राजनीतिक वर्चस्व और भ्रष्टाचार को अबाध जारी रखने के लिए दिया था लेकिन भाजपा ने कहीं अधिक खतरनाक खेल शुरू कर दिया है. अब निम्न मध्यवर्ग और दरिद्र तबके के युवाओं का अपराधीकरण देश और हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर किया जा रहा है जिसके लिए कच्चा माल उनके दिमागों में पहले से गश्त करते धार्मिक अंधविश्वासों, रूढ़ियों, कुरीतियों और मनगढ़ंत कहानियों के रूप में विपुल मात्रा में मौजूद है. बेरोजगारी की हताशा और हर तरह की संकीर्णता (खासतौर से विपरीत सेक्स से दूरी) के कारण पैदा हुई कुंठाओं के कारण वे हिंसा के जरिए खुद को साबित करने का मौका खोजते ही रहते हैं और अपराध की ओर मुड़ना उनके लिए सबसे सहज है. सत्ता से संरक्षण पाए भाजपा के सहयोगी तमाम तथाकथित हिंदू नामधारी संगठनों ने हीनता और कुंठा को अपने राजनीतिक स्वार्थ से जोड़ दिया है जिसका नतीजा ‘विधर्मियों’ को सबक सिखाने और विरोधियों पर हिंदू आतंक कायम करने के रूप में सामने आ रहा है.

लंपटों को पालने का एक और फायदा भी है जिसके कारण वे सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को भाने लगे हैं. पहले विचारधारा में थोड़ा बहुत प्रशिक्षित कार्यकर्ता हुआ करते थे जो नेतृत्व की गलतियों पर टोकते थे, विरोध करने की हद तक जा सकते थे लेकिन लंपटों की एकमात्र विचारधारा अवसरवाद होती है. वे सवाल नहीं उठाते सिर्फ हुक्म की तामील करते हैं.