पिछले मंगलवार को ज़मीन के बदले नौकरी मामले में सीबीआई की एक टीम ने पहले पटना में राबड़ी देवी और उसके बाद राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव से उनकी पुत्री मीसा भारती के दिल्ली स्थित आवास पर पूछताछ की। ज़ाहिर है कि चंद रोज़ पहले ही लालू सिंगापुर में किडनी का इलाज कराने के बाद दिल्ली लौटे हैं। ऐसे में सीबीआई की टीम के घंटों पूछताछ करने को विपक्षी दलों ने तमाम विपक्षी दलों के नेताओं साथ सियासी साज़िश और विपक्ष को ख़त्म करने की मुहिम बताया है। दरअसल आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया को उप मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार के नाम पर गिरफ़्तार करना विपक्षी पार्टियों के लिए यह साफ़ संकेत है कि उन्हें राजनीति से दूर हो जाना चाहिए। केंद्र की मोदी सरकार का यह संकेत सभी विपक्षी दल समझ भी रहे हैं; लेकिन दुर्भाग्य से एकजुट होकर इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। कोई एकाध विरोध का सुर उठ भी रहा है, तो उसका असर सरकार पर नहीं हो रहा है।
विपक्षी दलों के कई नेताओं का कहना है कि भ्रष्टाचार ख़त्म करने के नाम पर विपक्षियों और विरोधियों पर इस तरह की कार्रवाई से पता चलता है कि सरकार भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि विपक्ष को समाप्त कर देना चाहती है। क्योंकि भाजपा के मोदी सरकार के नौ साल के कार्यकाल में देखा गया है कि जो विपक्षी पार्टी या नेता भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हुए भी भाजपा में शामिल हो जाता है, उसके ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं होती है। क्या भाजपा के पास कोई ऐसा साबुन है, जो एक ही झटके में तमाम दाग़ों को धोकर एकदम साफ़ कर देता है? इसका मतलब भाजपा की मोदी सरकार के पास भ्रष्टाचारियों के लिए दो क़ानून हैं, एक यह कि अगर विरोधी पार्टी या कोई विपक्षी नेता भाजपा के सुर में सुर नहीं मिलाता है, तो उसके ख़िलाफ़ सीबीआई, ईडी और आईटी के अलावा पुलिस कार्रवाई भी कभी भी हो सकती है; लेकिन अगर वही पार्टी या नेता भाजपा में आ जाए, तो उसके सारे पाप धुल जाते हैं और उसके ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई नहीं होती।
बहरहाल अगर मनीष सिसोदिया की बात करें, तो उन पर अभी तक सीबीआई कोई भ्रष्टाचार साबित नहीं कर सकी है। बस उसके पास एक ही बहाना है कि सिसोदिया जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सीबीआई जाँच में जितना सहयोग मनीष सिसोदिया ने किया है, कोई नेता नहीं करता है। सीबीआई दूसरी बात यह कह रही है कि कुछ गवाहों से सिसोदिया का सामना कराना है। मनीष सिसोदिया के वकीलों का कहना है कि कथित शराब घोटाले में अभी तक सीबीआई ने एक भी गवाह का नाम दर्ज नहीं किया है, तो फिर वह गवाह कहाँ से खोजकर लाएगी और किसे खड़ा करेगी? क्या यह सब कुछ फ़र्ज़ीवाड़ा नहीं चल रहा है? फ़िलहाल उच्चतम न्यायालय ने भी सरकार की मंशा के अनुरूप काम करना शुरू कर दिया है और सिसोदिया मामले में सीबीआई की इच्छा को ही प्राथमिकता दी है। देखने वाली बात यह है कि सिसोदिया की गिरफ़्तारी के दौरान से लेकर अब तक जिस तरह से पुलिस, सेना के जवान तैनात किये गये, जैसे मानों कोई बड़ा इंटरनेशनल आतंकवादी पकड़ रखा हो।
अगर नयी शराब नीति की बात करें, तो दिल्ली की आप सरकार ने जिस प्रकार से नयी शराब नीति का ड्राफ्ट तैयार किया और उपराज्यपाल से पास कराकर लागू किया, उसी शराब नीति में अगर सिसोदिया को गिरफ़्तार किया जा सकता है, तो नयी शराब नीति को कुछ सुझावों के साथ मंज़ूरी देने वाले उपराज्यपाल को दोषी क्यों नहीं माना जा रहा?
बहरहाल सिसोदिया को 20 मार्च तक के लिए जेल भेज दिया गया है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि मनीष सिसोदिया राजनीति का शिकार हुए हैं। कहा जा रहा है कि सिसोसिया को पहले भी गिरफ़्तार किया जा सकता था; लेकिन इतना समय इसलिए लगाया गया है, ताकि उन्हें भाजपा में जाने के लिए मनाया जा सके। सिसोदिया ने पिछली पूछताछ के दौरान सीबीआई पर साफ़ आरोप लगाया था कि सीबीआई ने ख़ुद उन्हें भाजपा में जाने की सलाह दी और दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का ऑफर किया।
दरअसल मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी से पहले दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ़्तार कर लिया गया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि मोदी सरकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के गिरेबान तक पहुँचने की तैयारी कर रही है। इतना ही नहीं, वह पंजाब में भी आम आदमी पार्टी की सरकार को ध्वस्त करने की तैयारी कर चुकी है। इसका मतलब यही हुआ कि देश में सबसे तेज़ी से अपना राजनीतिक क़द बढ़ा रही आम आदमी पार्टी से भाजपा के शीर्ष नेताओं को ख़तरा महसूस हो रहा है। कांग्रेस को काफ़ी हद तक ठिकाने लगा चुकी मोदी सरकार किसी भी विरोधी पार्टी को अपने बराबर खड़े नहीं रहने देना चाहती। यही वजह है कि केंद्र की मोदी सरकार विपक्षी पार्टियों के नेताओं को साफ़ संदेश देना चाहती है कि वे ख़ामोश रहें और चुनावों में जीत की मंशा को त्यागकर सरेंडर कर दें, नहीं तो वे कितने भी ईमानदार क्यों न हों, उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डालना सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं है।
राजनीति के जानकार तो यहाँ तक कह रहे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव जीतने के लिए केंद्र की मोदी सरकार कई मज़बूत विरोधियों को जेल भेजने की तैयारी कर चुकी है, जिसके लिए उनकी फाइल बहुत पहले ही तैयार हो चुकी है। कहा जा रहा है कि इस कड़ी में कई दिग्गज हैं।
राजनीति के जानकारों का दावा है कि 2024 के चुनाव से पहले कम-से-कम एक दर्ज़न विपक्षी नेता जेल में होंगे। लालू प्रसाद यावद पर दोबारा से बड़ी कार्रवाई करना विरोधियों पर कार्रवाई का दूसरा बड़ा संकेत है। कहा जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव ही नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर मज़बूत 22 और नेताओं और राजनीति को प्रभावित करने की सामथ्र्य रखने वाले 54 और नेताओं के सीबीआई और ईडी की फाइलों में जाँच के लिए दर्ज हो चुके हैं, जिसमें लालू प्रसाद यादव के पूरे परिवार का नाम बताया जा रहा है। यानी भाजपा की केंद्र की मोदी सरकार बिहार में हर उस विपक्षी को 2024 से पहले जेल में भेज देना चाहती है, जो भाजपा को हराने में सक्षम है। नीतीश के द्वारा भाजपा का साथ छोडक़र महागठबंधन की सरकार बना लेने से बौखलाये भाजपा नेतृत्व ने बिहार में वापसी की जो तैयारी की है, उसे नैतिक तो नहीं कहा जा सकता।