भाषा में एक हो जाती है सच्चाई और सपना

0
818

कविता के सिलसिले में सच्चाई और सपनों के बीच उतनी दूरी नहीं होती जितनी कि सामान्य जीवन में हम प्राय: मानते बरतते हैं। कविता में सच्चाई की डोर सपने में बंधी होती है और अक्सर सपने ही सच्चाई में बदलते हैं। कविता के बुनियादी तत्व स्मृति और कल्पना कभी कविता को अकेला नहीं छोड़ते। सच्चाई, सपने, स्मृति और कल्पना ही फिर कविता को जांचने-परखने के आधार बन जाते हैं।

नीलिमकुमार की असमिया कविता कई कई सपनों के बरामदों से पार होती रहती है। कभी हमें वह सपने से सच्चाई की ओर और कभी सच्चाई से सपने की ओर ठेलती है। इस कविता में आत्मविश्वास है पर अपनी विडंबना का तीखा अहसास भी। उसके भूगोल में बहुत सारी चीजें हैं- बारिश, धूप, नींद, दोपहर, जायदाद, दरवाजा, खाली घर, सुअर, अजगर, नदी, पेड़, आईना, आकाश, गाड़ी, मां, टूटा गिलास, खाने की मेज, जंगल, बगीचा, अतिथि, साथी, तारा शिलांग, समंदर, मात्रा, बटन, फुटपाथ, मोनोपॉज आदि। यह कविता हमें अपने आसपास और पड़ोसी की वे चीजें दिखा रही है जिन्हें हम अक्सर ध्यान नहीं देते। भाषा जिस मुकाम पर पलभर थामती हैं। वह ऐसी जगह है जहां सच्चाई और सपना एक हो जाते हैं। कविता जगह होती हैं। हमें उसमें ठहर, रम सकते हैं। वहां से दुनिया को अलग कोण से देख-महसूस कर सकते हैं। अपनी सच्चाई को बिछा कर उस पर स्मृति और सपने ओढ़ कर आराम कर सकते हैं। भागदौड़ और आपा-धापी में कुछ बिलंब सकते हैें।

कविता कम से कम नीलिम कुमार की कविता निपट लौकिकता में सनी-बंधी कविता है। वह हमारे समय और संसार से हमें कोई मुक्ति नहीं देती है पर अपनी स्थानीयता, लालित्य और सूक्ष्मता से हमें उनमें रमने, गृहस्थ होने का अवकाश देती है। वह अनुरोध करती है तुमसे तुम्हारे कंधे पर हाथ रख कर साथ चलने के लिए। वह सहचर कविता है। उसके होने से हमें लगता है कि हम साथ हैं और हैं, दूसरे हंै जैसे धूप दर-दर भटकती है। वैसे ही यह कविता भटकती है संग साथ की तलाश में।

हिंदी अनुवाद में धौली बुक्स से प्रकाशित नीलिम कुमार के इस संचयन का आना, हिंदी में हमारे समय के एक भारतीय कवि का हमारी भाषा में आगमन है जिसके लिए अनुवादक मित्रों का कृतज्ञ हुआ जा सकता है।

भारत भवन: समकालीन को समेटने की कोशिश

अमेरिका की रजर्स यूनिवर्सिटी में अध्यायन करने वाली अंजलि नर्लेकर ने मराठी-अंग्रेजी कवि अरूण कोलटक पर एक बहुत दिलचस्प पुस्तक लिखी है, ‘बांबे माडर्न: अरूण कोलटकर एंड बाइलिंगुएल लिटररी कल्चरÓ इसे भारत में स्पीकिंग टाइगर ने प्रकाशित किया है पुस्तक में साठोत्तरी कविता, छोटी पत्रिकाओं की भूमिका छोटे प्रकाशकों, अनुवाद लोकल और ग्लोवल पर अरूण की कविता और जीवन पर गहराई और समझ सहानुभूति से विचार किया गया है। ऐसी कोई आलोचना या अध्ययन हिंदी में किसी कवि या प्रवृति को लेकर लिखा गया हो, यह मेरे ध्यान में नहीं है।

अरूण कोलटकर का भारत भवन से अच्छा संबंध था। उसके विश्वकविता समारोह में उन छह भारतीय कवियों में से थे जिन्हें आमंत्रित किया गया था और जिन्होंने उसमें भाग लिया था। वे वहां के कवि भारती और एशिया कविता समारोह में भी आए थे। भारतीय समारोह के तहत अमेरिका में आयोजित भारतीय कविता समारोह और स्वीडन में हुए भारतीय साहित्य समारोह मेें भी वे शामिल हुए थे। अंजलि जी को, जो मुझसे भारत भवन के संबंध में मिलीं, यह याद था कि अमेरिकी कवि द्वय एलेन गिंसबर्ग और एन वाल्डमैन द्वारा चलाए जा रहे नरोपा इंस्टीच्यूट में अरूण, केदारनाथ सिंह और मैनें काव्यपाठ किया था।

अंजलि यह समझना चाह रही थीं कि उस समय भारत भवन में इतनी सारी भाषाओं के लेखकों से संपर्क, आवाजाही अनुवाद आदि किस दृष्टि से संभव हुए थे। उन्हें यह तो पता था कि साठोकिरी कविता की प्रवृति सिर्फ मराठी तक सीमित नहीं थी। मैंने उन्हें यह बताने की कोशिश की कि साठोत्तरी कविता लगभग अखिल भारतीय प्रवृति थी जो हिंदी बांग्ला, कन्नड़, मलयालम आदि अनेक भाषाओं में देखी जा सकती है। चूंकि भारत भवन की, मेरे कारण कविता में विशेष रु चि और सक्रियता थी उसे वहां एक बड़ा मंच भी मिल गया था।

फोर्ड फाउंडेशन की एक ग्रांट के अंतर्गत हमने कवियों और अनुवादकों को साथ बैठा कर उनके हिंदी अनुवाद कराए थे। इनमें बांग्ला के शंख घोष, और शक्ति चट्टोपाध्याय, मराठी के दिलीप चित्रे और मलयालम के सच्चिदान दन शामिल हुए थे। उनकी कविताओं के अनुवाद उस समय राजकमल से प्रकाशित भी हुए थे।

भारत भवन की आकांक्षा भारत की समकालीनों को उसकी सारी बहुलता, जीवतता, साहसिकता वैचारिक सुदृढ़ता प्रश्नवाचकता, प्रश्नवाचकता में समेटते और प्रस्तुत करने की थी। उसने लोक और शास्त्र के बीच की दूरी और अलगाव, विद्वत्ता और सृजन, भाषाओं आदि के बीच अलगाव को दूर करने की आयोजनात्मक कोशिश की। उसे तब इस प्रयत्न में व्यापक समर्थन मिला था। हिंदी के वामपंथियों में भारतभवन को लेकर मतभेद थे। हालांकि उनके सबसे महत्वपूर्ण सहर्ष आते थे। अन्य भाषाओं के वामपंथी इस पहल का मुखर-सक्रिय समर्थन करते थे। स्थानीय मीडिया का अधिकांश तो विरोध और लांछन में ही व्यस्त रहता था। अंजलि अभी भारतभवन पर एक लंबा अध्याय अपनी नई पुस्तक में लिखने जा रही है। पर कोई पुस्तक उस पर लिखी जाए इससे वे सहमत हैं। खास कर उस दौर पर।

मराठी कविता का समकाल

समकालीन 62 मराठी कवियों में जिनमेें अधिकांश युवा हैं पर जिनमें नामदेव ढसाल, मलिका अमर शेष आदि भी शामिल हैं। एक पुस्तक प्रकाश भातम्ब्रकर के संपादक और अनुवाद में हिंदी में विजयाबुक्स ने प्रकाशित की है। भाषा, दृष्टि, शैली आदि की जैसी विविधता ऐसे किसी संचयन में हिंदी में होगी वैसी ही मराठी में भी है। यह बात बार-बार दुहराने की है कि प्राय: हर भाषा में कविता अब आंदोलन मुक्त-वाद-मुक्त हो चुकी है। उसकी प्रासंगिकता और जीवंतता का यह एक प्रमुख आधार है।

प्रकाश खरात की कविता समाप्त होती है इन पंक्तियों से

न मैं रात का प्रतिनिधि हूं न दिन का दरवेश

फिर क्यों उजीचता रहूं अंधेरे को?

सान पर क्यों चढ़ा दूं तेग को?

भीतरी कशमकश का पुरजोश अब धीमा पड़ गया है

और पारा उतर गया है पुरकाशिश खालिश लम्हों का

टूट कर गिर चुका है पूर्ण चंद्र का झाडिफ़ानूस……

जन्म-मृत्यु की अफरा-तफरी में

बदजात जमाने के बरक्स

मैं छितर बिखर रहा हूं अब

हेमंत दिवते पूछते हैं

बासी बुसी सुखेड़ी खाए

भूखे बच्चे की भाषा का क्या हुआ?

आम बच्चों की भाषा का क्या हुआ?

खेल-खेल में टायर को

गांव के ओर-छोर घुमाने वाले

बच्चों की भाषा का क्या हुआ?

कंचे, अपड़ा-थपड़ी खेलने वाले

दिनकर मनवर की पंक्तियां हैं-

पानी स्पृश्य है या अस्पृश्य?

पानी पहले या कि ब्रहम?

पानी ब्राहमण है या कि क्षत्रिय या वैश्य

पानी शूद्र होता है या अति शूद्र

पानी सिर्फ पानी ही बना रह सकता

इस वर्तमान में।