भारत सरकार और आरबीआई में क्या वाकई है तकरार?

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कुछ समय से जनता के बीच यह खबर घूमती  रही कि सरकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कानून की धारा 7 के तहत सेंट्रल बैंक से यह कहने को है कि यह आपने सरप्लस रिजर्व में से एक हिस्सा ज़्यादा उत्पादक इस्तेमाल के लिए दे दे। यह मामला अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बोर्ड के पास है।

ढेर सारी सही गलत सूचनाएं इन दिनों मीडिया में चल रही हैं।

सरकार का मौद्रिक गणित पूरी तौर पर ठीक-ठाक है। इसकी कोई मांग नहीं है कि यह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) से 3.6 या कि लाख करोड़ रुपए की मांग करे। कहते हैं सुभाष चंद्र गर्ग जो डिपार्टमेंट ऑफ इकॉनॉमिक अफेयर्स के सचिव हैं, उन्हें नौ नवंबर के मौद्रिक घाटे का लक्ष्य भी हासिल कर लेने का भरोसा है। उन्होंने कहा कि इसे 3.6 लाख करोड़ रुपए आरबीआई से लेने की ज़रूरत नहीं है।  बातचीत के दौरान एकमात्र प्रस्ताव यही है कि सेंट्रल बैंक की आर्थिक पूंजी के उपयुक्त फ्रेमवर्क तैयार किया जाए। मौद्रिक तौर पर सरकार यही चाहेगी कि चालू वित्तीय वर्ष में मौद्रिक घाटे का लक्ष्य 3.3 फीसद है।

सरकार की एफडी (फिक्सड डिपॉजिट) वित्तीय वर्ष 2013-14 में 5.1 फीसद थी। यह 2014-15 से आगे सरकार इसे कम करने में कामयाब रही। हम वित्तीय वर्ष 2018-19 में एफडी को 3.3 फीसद पर ले आएंगे।

सरकार काफी हद तक इस पर नियंत्रण पा चुकी है। दरअसल सरकार इस साल बजट के 70 हजार करोड़ पहले ही बाजार से ले चुकी है। गर्ग ने आगे बताया कि एकमात्र प्रस्ताव जिस पर चर्चा होनी है वह है कि आरबीआई के लिए आर्थिक पूंजी का उपयुक्त फ्रेमवर्क क्या हो। इसे तय कर दिया जाए। यह सफाई तब आई जब से खबरें छपने लगी कि सरकार रिजर्व बैंक के 9.6 करोड़ रिजर्व कोष से कम से कम एक तिहाई चाहती है। जो आरबीआई को लाभांश के तौर पर मिलता है।

19 नवंबर की बैठक

सरकारी अधिकारी मानते हैं कि ‘फिलहाल आरबीआई की पंूजी को ज़रूरत है कि इसे 27 फीसद मिले जबकि ज़्यादातर बैंकों की यह राशि 14 फीसद है। यह रुपए 3.6 लाख करोड़ तक हो सकती है। आरबीआई बोर्ड कैपिटल फ्रेमवर्क और दूसरे मुद्दों पर 19 नवंबर को बातचीत करेगा।

सरकार की मांग पर आरबीआई के साथ और तनाव बढ़ सकता है । जो हर उस कदम को पीछे करता रहा है जिससे बैंक की आजादी कम हो। इसकी एक वजह तो रुखाई की है जिसके कारण आरबीआई और वित्त मंत्रालय के बीच तनावपूर्ण संवाद रहे हैं। आरबीआई के विरल आचार्य के अनुसार यदि केंद्र सरकार कोई कोशिश करती है तो इसकी कीमत उसे अदा करनी होगी। इसका दिया हुआ संदर्भ है आरबीआई एक्ट 1934 की धारा सात। जिसके चलते केंद्र सरकार सेंट्रल बैंक पर हावी हो सकती है।

सरकार का नज़रिया यह जान पड़ता है कि पूरी दुनिया में सेंट्रल बैंक 13 से 14 फीसद अपनी पूंजी को बतौर रिजर्व रखते हैं। यह काफी कम है रिजर्व बैंक के 27 फीसद से । इस संबंध में एक संकेत तो आर्थिक सर्वे से मिले। इससे पता लगा कि आरबीआई काफी बड़ी पूंजी पर बैठा है। पिछले साल आरबीआई ने दस हजार करोड़ रुपए अंतरिम डिविडेंट के तौर पर दिए थे जिसका गवर्नर उर्जित पटेल ने विरोध किया था।

सरकार यह भी चाहती है कि आरबीआई पूंजी के नियमों के लिहाज से थोड़ा सहज हो। अधिकारी के अनुसार कजऱ् देने वालों के लिए जो मानक हैं वे वैश्विक लिहाज से काफी कड़े हैं। यदि इसका समाधान नहीं हुआ तो वित्तीय कंपनियों पर प्रभाव पडेगा और विकास पर असर होगा। सरकार चाहती है कि कुछ ‘स्टरिकचरÓ सरल किए जाएं जिससे बैंक कजऱ् देने में उदार हो और अगले साल आम चुनाव के पहले आर्थिक विकास हो।

आरबीआई क्या स्ट्रिक्ट है?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कुछ समय से इस बात के लिए काफी आलोचना सुनी है कि यह बहुंत ज़्यादा स्ट्रिन्जेंट हैं जब तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने होते हैं। तो बैंकों के लिए ज़रूरी है। यह स्थिति बहुत ही गंभीर है, नाजुक है जिसके बहुत  ही अजब गजब स्वरूप भारतीय आर्थिक परिदृश्य में दिखते हैं। जो पहले कभी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के इतिहास में भी नहीं जब से धारा सात बनी तो भी कभी केंद्र सरकार ने कभी सेंट्रल बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को ऐसा निर्देश दिया।

जो ऊहापोह सरकार को लेकर उठा वह एक बयान था कि आखिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सरकार के बीच किस बात को लेकर संकट है। जनता के बीच यह संदेश गया कि सरकार चाहती है कि आरबीआई अपने 9.59 लाख करोड़ में से 3.6 लाख करोड़ दे दे। यह रकम रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से केंद्र सरकार को दी जाए। इससे देश में मैक्रोइकॉनॉमिक स्थायित्व आएगा।

सेंट्रल बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से विदेशी और भारतीय निवेशकों को यह विश्वास जाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और इसमें वह फंडामेंटल है जिसके कारण हम भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कहते हैं।

जब भी ऐेसे कदम सरकारें लेती हैं तो काफी नुकसान होता है। अर्जेटीना में 6.6 बिलियन डालर सेंट्रल बैंक से नेशनल ट्रेजरी को दिए गए। इसके बाद ही सबसे खराब संवैधानिक संकट वहां खड़ा हुआ। आखिर में अर्जेंटीना को इंटर नेशनल मोनेटरी फंड (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) से 50 बिलियन डालर का कजऱ् लेना पड़ा और अर्जेंटीना की मुद्रा एकदम अवमूल्य चैपट हो गई।

भारत में जो आर्थिक डाटा वित्त मंत्रालय द्वारा उपलब्ध है उसके अनुसार मौद्रिक घाटा और वर्तमान खाते का घाटा दैनिक आधार पर बैठ रहा है। यह 2018-19 की पहली तिमाही में 15.8 बिलियन डालर था जो सकल धरेलू उत्पाद का लगभग 2.4 फीसद था और यह लगातार बढ़ रहा है। जबकि सरकारी रेवेन्यू उस तरह नहीं बढ़ रहे क्योंकि अर्थव्यवस्था सिकुड गई है। उस मौद्रिक घाटे की भरपाई के लिए सरकार की नजऱ अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पर है।

लेकिन भारत में आज मोनेटरी फिस्कल कोआर्डिनेशन की बजाए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार यह जता रही है कि वे एक साथ नहीं हैं। आरबीआई जता रही है कि इसकी आजादी छिन  रही है जबकि सरकार

अर्थव्यवस्था के लिहाज से अपनी दखलआजी को उचित ठहरा रही है।